Mars in the 7th House

48 min read · Drawn from 44 classical and modern works · Updated August 2026

वैदिक ज्योतिष में, मंगल (Mangal) को एक उग्र, साहसी और ऊर्जावान ग्रह माना जाता है, जिसे संस्कृत में भौम या कुज भी कहा जाता है। जब यह ग्रह कुंडली के सप्तम भाव (Saptam Bhava) में स्थित होता है, जो मुख्य रूप से विवाह, जीवनसाथी, साझेदारी, व्यापार और सार्वजनिक संबंधों को नियंत्रित करता है, तो यह एक अत्यंत प्रभावशाली और संवेदनशील स्थिति का निर्माण करता है। मंगल (Mangal) ऊर्जा, साहस, आक्रामकता और शारीरिक शक्ति का कारक (Karaka) है। इस भाव में मंगल (Mangal) की उपस्थिति आमतौर पर वैवाहिक जीवन में घर्षण, साझेदारी में तीव्रता और व्यापारिक संबंधों में साहसिक निर्णय लेने की प्रवृत्ति उत्पन्न करती है। हालांकि, इस स्थिति का अंतिम परिणाम पूरी तरह से इस बात पर निर्भर करता है कि ग्रह किस राशि (Rashi) में स्थित है, उसकी गरिमा क्या है, और उस पर किन शुभ या अशुभ ग्रहों की दृष्टि (Drishti) पड़ रही है। यह ध्यान रखना अत्यंत आवश्यक है कि शास्त्रीय ज्योतिष ग्रंथ अक्सर परिणामों को अत्यंत निरपेक्ष और गंभीर शब्दों में प्रस्तुत करते हैं; कुंडली में कोई भी एकल स्थिति अलगाव में काम नहीं करती है, और किसी भी गंभीर परिणाम के घटित होने के लिए संपूर्ण chart में कई पुष्टिकारक और गंभीर दोषों का होना अनिवार्य है।

Classical Position

शास्त्रीय ग्रंथों में सप्तम भाव में मंगल (Mangal) की स्थिति को वैवाहिक सुख के लिए एक बड़ी चुनौती माना गया है। Saravali के अनुसार, सप्तम भाव में स्थित मंगल (Mangal) जातक को पत्नी से रहित (या वैवाहिक सुख से वंचित) बना सकता है। इसके अतिरिक्त, यदि इस भाव में स्थित मंगल (Mangal) पर शनि (Saturn) की पूर्ण दृष्टि (Drishti) हो, तो जातक की पत्नी की मृत्यु होने की प्रबल संभावना होती है। Jataka Parijata और आधुनिक व्याख्यात्मक ग्रंथों जैसे How to Judge a Horoscope, Volume 2 में भी इस बात की पुष्टि की गई है कि यदि सप्तम भाव में शुक्र (Venus) और मंगल (Mangal) की युति हो, तो जातक पत्नी सुख से वंचित हो सकता है। यह संयोजन वैवाहिक जीवन में अत्यधिक तनाव और अलगाव की स्थितियों को जन्म देता है।

Variant Readings

विभिन्न शास्त्रीय और नाड़ी ग्रंथों में सप्तम भाव में मंगल (Mangal) की स्थिति के कारण जीवन के विभिन्न क्षेत्रों पर पड़ने वाले प्रभावों के बारे में कई भिन्न और विशिष्ट दृष्टिकोण मिलते हैं। इन मतों को निम्नलिखित श्रेणियों में विभाजित किया जा सकता है:

Physical Appearance and Health

नेत्र विकार: Jataka Alankara के अनुसार, यदि चंद्रमा (Moon) सिंह राशि (Rashi) में होकर सप्तम भाव में स्थित मंगल (Mangal) को देखता है, या सूर्य (Sun) कर्क राशि (Rashi) में होकर सप्तम भाव के मंगल (Mangal) को देखता है, और नवमेश (Navamesh) मेष, सिंह, वृश्चिक या मकर राशि (Rashi) में हो, तो जातक एक आंख से विकृत (एक-नेत्र) हो सकता है। शारीरिक शल्य चिकित्सा: Medical Astrology के अनुसार, यदि मंगल (Mangal) सप्तम भाव को प्रभावित करता है और उस पर बृहस्पति (Jupiter) की सुरक्षात्मक दृष्टि (Drishti) नहीं होती है, तो जातक के पेट के निचले हिस्से में शल्य चिकित्सा (सर्जरी) होने की संभावना रहती है। गुप्तांगों के रोग: Brihat Parashara Hora Shastra के अनुसार, यदि सप्तम भाव मंगल (Mangal) के नवमांश (Navamsha) में हो, तो स्त्री जातक को गुप्तांगों से संबंधित रोग होने की संभावना रहती है। शारीरिक कष्ट और ज्वर: Brihat Parashara Hora Shastra और The Encyclopedia of Vedic Astrological Dasha Systems के अनुसार, जब मंगल (Mangal) द्वितीय या सप्तम भाव का स्वामी होकर कमजोर होता है, तो यह जातक के लिए उच्च ज्वर, विष से खतरा, और अकाल मृत्यु का भय उत्पन्न कर सकता है।

Temperament and Mental State

बुद्धि का अभाव: Jataka Alankara के अनुसार, यदि मंगल (Mangal) और चंद्रमा (Moon) लग्न (Lagna) में हों और बुध (Mercury) सप्तम भाव में स्थित हो, तो जातक में बुद्धि और विवेक की कमी हो सकती है। मानसिक अस्थिरता: Sarvartha Chintamani के अनुसार, यदि शनि (Saturn) लग्न (Lagna) में हो और मंगल (Mangal) सप्तम भाव या त्रिकोण भाव में स्थित हो, तो जातक को मानसिक मतिभ्रम या उन्माद का सामना करना पड़ सकता है। उन्माद योग (Unmada Yoga): Vimshottari and Udu Dashas के अनुसार, यदि शनि (Saturn) और मंगल (Mangal) परस्पर प्रथम और सप्तम भाव में स्थित हों, तो यह मानसिक असंतुलन का कारण बनता है। दुर्भावनापूर्ण स्वभाव: Scientific Hindu Astrology के अनुसार, यदि चंद्रमा (Moon) और मंगल (Mangal) की सप्तम भाव में युति हो, तो जातक नीच प्रवृत्ति का, दूसरों के धन का लालची, घमंडी, ईर्ष्यालु और असत्य बोलने वाला हो सकता है।

Wealth, Status and Life Events

भूमि और संपत्ति से हानि: The Essence of Nadi Astrology के अनुसार, यदि शनि (Saturn), मंगल (Mangal) और केतु (Ketu) का संबंध (7-3-9 भावों के माध्यम से) बनता है, तो जातक मशीनरी और भूमि संपत्तियों में उत्कृष्ट प्रदर्शन करता है, लेकिन उसका सप्तम भाव दूषित हो जाता है। वह दृढ़ संकल्प की कमी, शिक्षा में रुकावटों, और रिश्तेदारों को प्रताड़ित करने के पूर्व कर्मों के कारण संचित धन की हानि का सामना करता है। अवैध संबंध: Satyajatakam Dhruva Nadi के अनुसार, यदि तृतीयेश (Tritiyesh) सप्तम भाव में किसी स्त्री राशि (Rashi), नवमांश (Navamsha) या नक्षत्र में स्थित हो और वह शनि (Saturn) तथा मंगल (Mangal) के बीच पापकर्तरी योग (Papakartari Yoga) में फंसा हो, तो जातक के अपने भाई की पत्नी के साथ अवैध संबंध हो सकते हैं। जीवनसाथी का चरित्र: Sarvartha Chintamani के अनुसार, यदि सप्तमेश (Saptamesh) मंगल (Mangal) होकर बलहीन हो, और वह क्रूर षष्ट्यंश (Shashtiamsha), नीच राशि (Rashi), शत्रु राशि (Rashi) में हो या सूर्य (Sun) द्वारा अस्त (Astangata) हो, तो जीवनसाथी का चरित्र संदेहास्पद हो सकता है। विवाह विच्छेद और पुनर्विवाह: Doctrines of Suka Nadi के अनुसार, यदि द्वितीय भाव में कोई पापी ग्रह हो और सप्तम भाव पर मंगल (Mangal) तथा किसी अन्य पापी ग्रह की दृष्टि (Drishti) हो, तो जातक अपनी पत्नी पर दोषारोपण करके उसे त्याग देता है और दूसरा विवाह करता है। अकाल मृत्यु के योग: Jataka Parijata के अनुसार, यदि सप्तम भाव में मंगल (Mangal) हो और लग्न (Lagna) में शनि (Saturn), चंद्रमा (Moon) और सूर्य (Sun) स्थित हों, तो जातक की मृत्यु किसी मशीनरी के पास दुर्घटना के कारण हो सकती है।

Aspect and Directional Strength

सप्तम भाव में स्थित होकर, मंगल (Mangal) अपनी पूर्ण चतुर्थ, सप्तम और अष्टम दृष्टि (Drishti) क्रमशः दशम भाव, प्रथम भाव (लग्न) और द्वितीय भाव पर डालता है। चूंकि मंगल (Mangal) एक क्रूर (Krura) ग्रह है, इसलिए इसकी दृष्टि (Drishti) जिन भावों पर पड़ती है, वहां यह अत्यधिक ऊर्जा, दबाव और कभी-कभी संघर्ष की स्थिति उत्पन्न करता है। लग्न (Lagna) पर मंगल (Mangal) की सप्तम दृष्टि (Drishti) जातक के व्यक्तित्व को अत्यधिक साहसी, आक्रामक और अधीर बनाती है। यदि लग्न (Lagna) पर शुभ ग्रहों का प्रभाव न हो, तो यह दृष्टि (Drishti) जातक के स्वभाव में क्रोध और जिद को बढ़ा सकती है। दशम भाव पर इसकी चतुर्थ दृष्टि (Drishti) जातक को अपने कार्यक्षेत्र में अत्यधिक प्रतिस्पर्धी और ऊर्जावान बनाती है, जिससे वह प्रशासनिक या तकनीकी क्षेत्रों में सफलता प्राप्त कर सकता है। द्वितीय भाव पर इसकी अष्टम दृष्टि (Drishti) संचित धन और पारिवारिक संबंधों में उतार-चढ़ाव ला सकती है। दिशात्मक बल या दिग्बल (Digbala) की बात करें, तो मंगल (Mangal) कुंडली के दशम भाव (Dasham Bhava) में होने पर पूर्ण दिग्बल (Digbala) प्राप्त करता है। सप्तम भाव में होने के कारण, यह अपने दिग्बल (Digbala) स्थान से ठीक विपरीत दिशा में होता है, जिससे इसके सकारात्मक और रचनात्मक दिशात्मक बल में कमी आती है। हालांकि, एक केंद्र (Kendra) भाव में होने के कारण इसकी शक्ति और प्रभावशीलता बनी रहती है, लेकिन यह ऊर्जा अक्सर निर्माण के बजाय संघर्ष और नियंत्रण की ओर मुड़ जाती है।

The Placement Across the Twelve Rashis

Aries (Mesha)

मेष राशि (Rashi) में मंगल (Mangal) अपनी मूलत्रिकोण (Moolatrikona) राशि (Rashi) में होता है, जिसका स्वामी स्वयं मंगल (Mangal) है। यह स्थिति तुला लग्न (Lagna) का निर्माण करती है, जहां मंगल (Mangal) द्वितीय और सप्तम भाव का स्वामी होकर सप्तम भाव में ही स्थित होता है। Saravali के अनुसार, मेष राशि (Rashi) का मंगल (Mangal) जातक को तेजस्वी, सत्यवादी, पराक्रमी, राजा के समान, युद्धप्रिय और साहसी कार्यों में रुचि रखने वाला बनाता है। वह सेना या किसी बड़े समूह का नेतृत्व कर सकता है। Scientific Hindu Astrology के अनुसार, यह जातक को अत्यधिक मुखर, आक्रामक, ऊर्जावान और उदार बनाता है। चूंकि मंगल (Mangal) यहां अत्यंत बलवान है, इसलिए यह वैवाहिक जीवन में आक्रामकता तो देता है, लेकिन जातक को समाज में उच्च पद और प्रतिष्ठा भी प्रदान करता है।

Taurus (Vrishabha)

वृषभ राशि (Rashi) में मंगल (Mangal) एक तटस्थ गरिमा में होता है, जिसका स्वामी शुक्र (Venus) है। यह स्थिति वृश्चिक लग्न (Lagna) का निर्माण करती है, जहां मंगल (Mangal) प्रथम (लग्न) और छठे भाव का स्वामी होकर सप्तम भाव में स्थित होता है। Western Astrology Planets in Signs and Houses के अनुसार, वृषभ राशि (Rashi) में मंगल (Mangal) जातक को सीधे संघर्ष से बचने वाला लेकिन अत्यधिक जिद्दी और दृढ़ निश्चयी बनाता है। Scientific Hindu Astrology के अनुसार, ऐसा जातक विपरीत लिंग के प्रति अत्यधिक आकर्षित और कामुक हो सकता है। The Encyclopedia of Vedic Astrological Dasha Systems के अनुसार, मंगल (Mangal) की दशा (Dasha) के दौरान जातक में धार्मिक सुधार और आध्यात्मिक गतिविधियों के प्रति रुचि जागृत होती है। यह स्थिति दर्शाती है कि जातक का जीवनसाथी जिद्दी स्वभाव का हो सकता है, जिससे वैवाहिक जीवन में सामंजस्य बिठाने के लिए धैर्य की आवश्यकता होगी।

Gemini (Mithuna)

मिथुन राशि (Rashi) में मंगल (Mangal) अपने शत्रु बुध (Mercury) की राशि (Rashi) में स्थित होता है। यह स्थिति धनु लग्न (Lagna) का निर्माण करती है, जहां मंगल (Mangal) पंचम और द्वादश भाव का स्वामी होकर सप्तम भाव में बैठता है। Scientific Hindu Astrology के अनुसार, मिथुन राशि (Rashi) का मंगल (Mangal) जातक को कलात्मक और वैज्ञानिक अभिरुचि, महत्वाकांक्षा और साहसिक कार्यों की ओर प्रवृत्त करता है, लेकिन वह स्वभाव से बातूनी और कभी-कभी अविवेकी हो सकता है। Yashodhar Mehta’s Research in Astrology के अनुसार, यदि शनि (Saturn) कुंडली में मजबूत न हो, तो जातक में दृढ़ता की कमी और आलस्य देखा जा सकता है। इसकी दशा (Dasha) के दौरान जातक को यात्राएं, कलात्मक विकास और अत्यधिक खर्चों का सामना करना पड़ता है। यह स्थिति वैवाहिक संबंधों में वैचारिक मतभेद और संवादहीनता को दर्शाती है।

Cancer (Karka)

कर्क राशि (Rashi) में मंगल (Mangal) अपनी नीच (Neecha) अवस्था में होता है, जिसका स्वामी चंद्रमा (Moon) है। यह स्थिति मकर लग्न (Lagna) का निर्माण करती है, जहां मंगल (Mangal) चतुर्थ और एकादश भाव का स्वामी होकर सप्तम भाव में स्थित होता है। Scientific Hindu Astrology के अनुसार, कर्क राशि (Rashi) में मंगल (Mangal) अपनी स्वाभाविक शक्ति खो देता है और जातक को अत्यधिक संवेदनशील, भावुक और चिड़चिड़ा बनाता है। वह अपने परिवार और घर के लिए कार्य करने के लिए उत्सुक रहता है। K.P. Reader III के अनुसार, नीच का होने के बावजूद, कर्क या मकर का मंगल (Mangal) जातक को धन संचय करने में सहायता कर सकता है। हालांकि, वैवाहिक दृष्टिकोण से यह स्थिति अत्यंत संवेदनशील है, क्योंकि यह जीवनसाथी के स्वास्थ्य में गिरावट या वैवाहिक सुख में कमी ला सकती है।

Leo (Simha)

सिंह राशि (Rashi) में मंगल (Mangal) अपने मित्र सूर्य (Sun) की राशि (Rashi) में स्थित होता है। यह स्थिति कुंभ लग्न (Lagna) का निर्माण करती है, जहां मंगल (Mangal) तृतीय और दशम भाव का स्वामी होकर सप्तम भाव में बैठता है। How to Judge a Horoscope, Volume 2 के अनुसार, सिंह राशि (Rashi) में मंगल (Mangal) होने पर कुज दोष (Kuja Dosha) का प्रभाव निष्प्रभावी हो जाता है। Scientific Hindu Astrology के अनुसार, यह जातक को गणित, खगोल विज्ञान और गुप्त विद्याओं में रुचि प्रदान करता है। जातक बड़ों का सम्मान करने वाला, कुलीन और दृढ़ संकल्पी होता है। K.P. Reader III के अनुसार, यदि मंगल (Mangal) सिंह राशि (Rashi) के अंतिम अंशों में हो, तो जातक का स्वभाव अत्यधिक उग्र और महत्वाकांक्षी हो सकता है। यह एक शुभ स्थिति है जो जातक को साझेदारी के माध्यम से व्यावसायिक सफलता और अधिकार प्रदान करती है।

Virgo (Kanya)

कन्या राशि (Rashi) में मंगल (Mangal) अपने शत्रु बुध (Mercury) की राशि (Rashi) में स्थित होता है। यह स्थिति मीन लग्न (Lagna) का निर्माण करती है, जहां मंगल (Mangal) द्वितीय और नवम भाव का स्वामी होकर सप्तम भाव में बैठता है। Scientific Hindu Astrology के अनुसार, कन्या राशि (Rashi) का मंगल (Mangal) जातक को हर छोटी से छोटी बात पर ध्यान देने वाला, आत्म-अभिमानी, प्रतिशोधी और दिखावा करने वाला बनाता है। Doctrines of Suka Nadi के अनुसार, यदि सप्तम भाव में कन्या राशि (Rashi) का मंगल (Mangal) हो और उस पर शनि (Saturn) की दृष्टि (Drishti) हो, तथा राहु (Rahu) नवम भाव से कन्या राशि (Rashi) को देख रहा हो, तो जातक की पत्नी के सम्मान को ठेस पहुंचने की संभावना रहती है। यह स्थिति वैवाहिक जीवन में अत्यधिक आलोचनात्मक दृष्टिकोण और असंतोष को दर्शाती है।

Libra (Tula)

तुला राशि (Rashi) में मंगल (Mangal) एक तटस्थ गरिमा में होता है, जिसका स्वामी शुक्र (Venus) है। यह स्थिति मेष लग्न (Lagna) का निर्माण करती है, जहां मंगल (Mangal) प्रथम (लग्न) और अष्टम भाव का स्वामी होकर सप्तम भाव में बैठता है। Scientific Hindu Astrology के अनुसार, तुला राशि (Rashi) का मंगल (Mangal) जातक को महत्वाकांक्षी, आत्मविश्वासी और तीव्र अवलोकन शक्ति वाला बनाता है। वह अपने परिवार से गहरा प्रेम करता है, लेकिन महिलाओं द्वारा धोखा खाने की संभावना भी रहती है। The Encyclopedia of Vedic Astrological Dasha Systems के अनुसार, इसकी दशा (Dasha) विवाह और करियर के लिए अनुकूल होती है, लेकिन शारीरिक रोग प्रतिरोधक क्षमता को कम कर सकती है। Predictive Jyotish के अनुसार, यदि मंगल (Mangal) तुला राशि (Rashi) में होकर द्वितीय और सप्तम भाव का स्वामी हो, तो यह पत्नी के कारण मानसिक कष्ट या प्रथम पत्नी की हानि का कारण बन सकता है।

Scorpio (Vrischika)

वृश्चिक राशि (Rashi) में मंगल (Mangal) अपने स्वक्षेत्र (Swakshetra) में होता है, जिसका स्वामी स्वयं मंगल (Mangal) है। यह स्थिति वृषभ लग्न (Lagna) का निर्माण करती है, जहां मंगल (Mangal) सप्तम और द्वादश भाव का स्वामी होकर सप्तम भाव में ही स्थित होता है। Scientific Hindu Astrology के अनुसार, वृश्चिक राशि (Rashi) का मंगल (Mangal) जातक को अत्यधिक गहरी भावनाएं, तीव्र इच्छाएं, प्रतिशोध की भावना और एक राजनयिक (डिप्लोमैट) जैसा व्यवहार प्रदान करता है। NADI ASTROLOGICAL RESEARCHES GROUP-II के अनुसार, यह स्थिति जातक के जीवन में किसी शल्य चिकित्सा (सर्जरी) की संभावना को बढ़ाती है। चूंकि मंगल (Mangal) यहां अपने ही घर में है, इसलिए यह एक शक्तिशाली रुचक योग (Ruchaka Yoga) का निर्माण करता है, जो जातक को भूमि, कृषि और व्यावसायिक संपत्तियों से अत्यधिक लाभ प्रदान करता है, हालांकि वैवाहिक जीवन में तीव्रता बनी रहती है।

Sagittarius (Dhanu)

धनु राशि (Rashi) में मंगल (Mangal) अपने मित्र बृहस्पति (Jupiter) की राशि (Rashi) में स्थित होता है। यह स्थिति मिथुन लग्न (Lagna) का निर्माण करती है, जहां मंगल (Mangal) एकादश और छठे भाव का स्वामी होकर सप्तम भाव में बैठता है। Scientific Hindu Astrology के अनुसार, धनु राशि (Rashi) का मंगल (Mangal) जातक को भद्र, स्पष्टवादी, अधीर और कभी-कभी तर्क-वितर्क में कटु बनाता है। जातक को जीवन में कड़े संघर्ष के बाद ही सुख प्राप्त होता है। Predictive Jyotish by M.N. Kedaar के अनुसार, यदि मंगल (Mangal) धनु राशि (Rashi) में होकर शुभ भावों में हो, तो यह अत्यंत शुभ परिणाम देता है, लेकिन यदि यह पीड़ित हो, तो शत्रुओं पर विजय प्राप्त करने में कठिनाई होती है। यह स्थिति दर्शाती है कि जातक का जीवनसाथी धार्मिक और स्वतंत्र विचारों वाला होगा, लेकिन दोनों के बीच वैचारिक मतभेद हो सकते हैं।

Capricorn (Makara)

मकर राशि (Rashi) में मंगल (Mangal) अपनी उच्च (Exalted) अवस्था में होता है, जिसका स्वामी शनि (Saturn) है। यह स्थिति कर्क लग्न (Lagna) का निर्माण करती है, जहां मंगल (Mangal) पंचम और दशम भाव का स्वामी होकर सप्तम भाव में बैठता है। Saravali के अनुसार, मकर राशि (Rashi) में स्थित मंगल (Mangal) जातक को अत्यंत धनवान, प्रसिद्ध, सफल और उच्च ऊर्जा से युक्त बनाता है। The Encyclopedia of Vedic Astrological Dasha Systems के अनुसार, मकर राशि (Rashi) के मंगल (Mangal) की दशा (Dasha) नए उद्यमों, पदोन्नति और कानूनी मामलों में सफलता के लिए अत्यंत भाग्यशाली और समृद्ध साबित होती है। चूंकि मंगल (Mangal) यहां उच्च का होकर केंद्र (Kendra) में स्थित है, इसलिए यह एक अत्यंत शक्तिशाली रुचक योग (Ruchaka Yoga) बनाता है, जो जातक को समाज में असाधारण मान-सम्मान, अधिकार और वैवाहिक जीवन में एक मजबूत और सफल जीवनसाथी प्रदान करता है।

Aquarius (Kumbha)

कुंभ राशि (Rashi) में मंगल (Mangal) एक तटस्थ गरिमा में होता है, जिसका स्वामी शनि (Saturn) है। यह स्थिति सिंह लग्न (Lagna) का निर्माण करती है, जहां मंगल (Mangal) चतुर्थ और नवम भाव का स्वामी होकर सप्तम भाव में बैठता है। How to Judge a Horoscope, Volume 2 के अनुसार, कुंभ राशि (Rashi) में मंगल (Mangal) की उपस्थिति कुज दोष (Kuja Dosha) के नकारात्मक प्रभावों को समाप्त कर देती है। Bhrigu Nandi Nadi के अनुसार, कुंभ राशि (Rashi) का मंगल (Mangal) जातक को आयुर्वेद के अभ्यास या गुरु की सेवा की ओर प्रवृत्त कर सकता है। The Encyclopedia of Vedic Astrological Dasha Systems के अनुसार, इसकी दशा (Dasha) जातक के वित्तीय और घरेलू जीवन को गहराई से प्रभावित करती है। चूंकि मंगल (Mangal) सिंह लग्न (Lagna) के लिए एक योगकारक (Yogakaraka) ग्रह है, इसलिए सप्तम भाव में इसकी स्थिति जातक को भाग्यशाली और संपत्तिवान बनाती है।

Pisces (Meena)

मीन राशि (Rashi) में मंगल (Mangal) अपने मित्र बृहस्पति (Jupiter) की राशि (Rashi) में स्थित होता है। यह स्थिति कन्या लग्न (Lagna) का निर्माण करती है, जहां मंगल (Mangal) तृतीय और अष्टम भाव का स्वामी होकर सप्तम भाव में बैठता है। Scientific Hindu Astrology के अनुसार, मीन राशि (Rashi) का मंगल (Mangal) जातक को शारीरिक रूप से कमजोर, कम संतान वाला, विदेश में भटकने वाला, रिश्तेदारों द्वारा उपेक्षित और धोखे से धन गंवाने वाला बना सकता है। Phaladeepika और Jataka Parijata के अनुसार, सप्तम भाव में मीन राशि (Rashi) का मंगल (Mangal) जीवनसाथी की शीघ्र मृत्यु या गंभीर स्वास्थ्य समस्याओं का कारण बन सकता है। हालांकि, Bhrigu Nandi Nadi के अनुसार, यह स्थिति जातक को भूमि के माध्यम से वित्तीय लाभ भी प्रदान कर सकती है। यह एक अत्यंत संवेदनशील स्थिति है जो वैवाहिक जीवन में अस्थिरता को दर्शाती है।

Conjunctions in This House

Sun

सप्तम भाव में Sun with Mars की युति जातक के वैवाहिक जीवन में अत्यधिक अहंकार और टकराव की स्थिति उत्पन्न करती है। My Experiences in Astrology के अनुसार, यदि सप्तमेश मंगल (Mangal) सूर्य (Sun) के साथ हो, उस पर शनि (Saturn) की दृष्टि (Drishti) हो और केतु (Ketu) सप्तम भाव को पीड़ित कर रहा हो, तो यह गंभीर वैवाहिक समस्याओं को जन्म देता है। यह युति जीवनसाथी के साथ सत्ता के संघर्ष और अलगाव का कारण बन सकती है, क्योंकि दोनों ही ग्रह उग्र प्रकृति के हैं।

Moon

सप्तम भाव में Moon with Mars की युति को शास्त्रीय रूप से अनुकूल नहीं माना गया है। Scientific Hindu Astrology के अनुसार, यह युति जातक को स्वार्थी, दूसरों के धन का लालची, घमंडी, दुर्भावना से भरा हुआ और असत्य बोलने वाला बना सकती है। इसके अतिरिक्त, यदि इस युति पर शनि (Saturn) का भी प्रभाव हो, तो जातक और उसका जीवनसाथी दोनों ही अनैतिक आचरण की ओर प्रवृत्त हो सकते हैं, जिससे वैवाहिक जीवन पूरी तरह से नष्ट हो जाता है।

Mercury

सप्तम भाव में Mercury with Mars की युति जातक की तार्किक क्षमता को तो बढ़ाती है, लेकिन यह वैवाहिक संबंधों में कटुता और तीखे वाद-विवाद का कारण बनती है। Doctrines of Suka Nadi के अनुसार, यदि द्वितीय और सप्तम भाव पापी ग्रहों से युक्त हों, और मंगल (Mangal) तथा बुध (Mercury) दोनों ही बलहीन हों, तो यह जीवनसाथी के चरित्र पर प्रतिकूल प्रभाव डाल सकता है। यह युति व्यावसायिक साझेदारी में भी मतभेद उत्पन्न करती है।

Jupiter

सप्तम भाव में Jupiter with Mars की युति जातक को साहसी और धार्मिक बनाती है, लेकिन वैवाहिक सुख के मामले में यह मिश्रित परिणाम देती है। Scientific Hindu Astrology के अनुसार, यह युति जातक को घूमने-फिरने का शौकीन, अच्छे रिश्तेदारों वाला और साहसी बनाती है, लेकिन कई बार यह जातक को जीवनसाथी के सुख से वंचित भी कर सकती है। बृहस्पति (Jupiter) की उपस्थिति मंगल (Mangal) की उग्रता को शांत करने का प्रयास करती है, जिससे गंभीर दोषों में कमी आती है।

Venus

सप्तम भाव में Venus with Mars की युति कामुकता और वासना को अत्यधिक बढ़ा देती है। Saravali के अनुसार, यदि शुक्र (Venus) और मंगल (Mangal) सप्तम, पंचम या नवम भाव में एक साथ हों, तो जातक को शारीरिक रूप से कमजोर या विकृत जीवनसाथी मिल सकता है। Doctrines of Suka Nadi के अनुसार, यह युति जातक को अनैतिक संबंधों की ओर ले जा सकती है। हालांकि, यदि यह युति वृषभ राशि (Rashi) में हो और वृश्चिक लग्न (Lagna) हो, तो यह एक सुखी वैवाहिक जीवन और आपसी स्नेह प्रदान करती है।

Saturn

सप्तम भाव में Saturn with Mars की युति को ज्योतिष में अत्यंत विस्फोटक और विनाशकारी माना गया है। Jataka Parijata के अनुसार, यदि मंगल (Mangal) और शनि (Saturn) सप्तम भाव में एक साथ हों और उन पर किसी शुभ ग्रह की दृष्टि (Drishti) न हो, तो जातक को संतान गोद लेनी पड़ सकती है या वैवाहिक जीवन में गंभीर त्रासदी का सामना करना पड़ सकता है। हालांकि, यदि यह युति कर्क राशि (Rashi) में हो, तो जातक को एक सुंदर और अच्छे चरित्र वाली पत्नी प्राप्त होती है।

Rahu

सप्तम भाव में Rahu with Mars की युति जातक के वैवाहिक जीवन में अचानक और अप्रत्याशित तूफान लाती है। Roots of Nadi के अनुसार, द्वितीय, सप्तम या अष्टम भाव में मंगल (Mangal) और राहु (Rahu) का संबंध जातक के जीवनसाथी के लिए गंभीर संकट या अकाल मृत्यु का कारण बन सकता है। How to Judge a Horoscope, Volume 2 के अनुसार, यदि राहु (Rahu) और चंद्रमा (Moon) सप्तम भाव में हों और मंगल (Mangal) तथा शनि (Saturn) उन्हें पीड़ित कर रहे हों, तो यह जीवनसाथी के विवाहेतर संबंधों और अलगाव का कारण बनता है।

Ketu

सप्तम भाव में Ketu with Mars की युति वैवाहिक जीवन में अचानक अलगाव, उदासीनता और असंतोष की भावना पैदा करती है। The Essence of Nadi Astrology के अनुसार, यदि शनि (Saturn), मंगल (Mangal) और केतु (Ketu) का संबंध बनता है, तो यह सप्तम भाव को पूरी तरह से दूषित कर देता है, जिससे जातक को वैवाहिक सुख प्राप्त करने में अत्यधिक कठिनाई होती है। जातक का जीवनसाथी आध्यात्मिक या अत्यंत क्रोधी स्वभाव का हो सकता है।

Aspects Received

Jupiter

बृहस्पति (Jupiter) की दृष्टि (Drishti) को ज्योतिष में सबसे अधिक कल्याणकारी और सुरक्षात्मक माना गया है। जब सप्तम भाव में स्थित मंगल (Mangal) पर बृहस्पति (Jupiter) की शुभ दृष्टि (Drishti) पड़ती है, तो यह मंगल (Mangal) के सभी नकारात्मक प्रभावों और कुज दोष (Kuja Dosha) को पूरी तरह से शांत कर देती है। यह दृष्टि (Drishti) वैवाहिक जीवन में आने वाले संकटों को टालती है, जीवनसाथी को धार्मिक और समझदार बनाती है, और जातक को समाज में मान-सम्मान प्रदान करती है।

Saturn

शनि (Saturn) की दृष्टि (Drishti) सप्तम भाव के मंगल (Mangal) पर पड़ने से वैवाहिक जीवन में अत्यधिक देरी, नीरसता और गंभीर संकट उत्पन्न होते हैं। Saravali के अनुसार, यदि सप्तम भाव में स्थित मंगल (Mangal) पर केवल शनि (Saturn) की दृष्टि (Drishti) हो, तो जीवनसाथी की मृत्यु निश्चित होती है। यह दृष्टि (Drishti) जातक के वैवाहिक जीवन को एक बोझ बना सकती है, जहां आपसी समझ और प्रेम का पूरी तरह से अभाव होता है।

Mars

चूंकि मंगल (Mangal) स्वयं सप्तम भाव में स्थित है, इसलिए वह स्वयं को सीधे तौर पर नहीं देख सकता। हालांकि, यदि किसी अन्य भाव से मंगल (Mangal) की दृष्टि (Drishti) सप्तम भाव पर पड़ रही हो (जैसे चतुर्थ या द्वादश भाव से), तो यह वैवाहिक जीवन में अत्यधिक तनाव, कलह और जीवनसाथी के स्वास्थ्य में गिरावट का कारण बनती है।

Rahu

राहु (Rahu) की दृष्टि (Drishti) सप्तम भाव के मंगल (Mangal) पर पड़ने से वैवाहिक जीवन में अविश्वास, धोखा और अचानक अलगाव की स्थितियां उत्पन्न होती हैं। Doctrines of Suka Nadi के अनुसार, यदि पंचमेश और सप्तमेश नीच राशि (Rashi) में हों और सप्तम भाव में स्थित मंगल (Mangal) पर राहु (Rahu) की दृष्टि (Drishti) हो, तो यह पारिवारिक प्रतिष्ठा को गंभीर ठेस पहुंचाता है। यह दृष्टि (Drishti) जातक को अनैतिक और गुप्त संबंधों की ओर धकेल सकती है।

Ketu

केतु (Ketu) की दृष्टि (Drishti) सप्तम भाव के मंगल (Mangal) पर पड़ने से वैवाहिक जीवन में विरक्ति और उदासीनता आती है। यह जातक को अपने जीवनसाथी से मानसिक रूप से दूर कर देती है। जातक को ऐसा महसूस हो सकता है कि वह एक निरर्थक संबंध में बंधा हुआ है, जिससे अंततः तलाक या स्थायी अलगाव की स्थिति उत्पन्न हो सकती है।

Strength and Condition

Baladi Avastha

0° - 6° (बाल अवस्था - Bala): विषम राशियों में मंगल (Mangal) कमजोर होता है, जबकि सम राशियों में यह मृत (Mrita) अवस्था में होता है। 6° - 12° (कुमार अवस्था - Kumara): मंगल (Mangal) मध्यम बल के साथ परिणाम देता है। 12° - 18° (युवा अवस्था - Yuva): मंगल (Mangal) अपने पूर्ण बल के साथ परिणाम देता है, चाहे वे शुभ हों या अशुभ। 18° - 24° (वृद्ध अवस्था - Vridha): मंगल (Mangal) का प्रभाव अत्यंत क्षीण हो जाता है। 24° - 30° (मृत अवस्था - Mrita): विषम राशियों में मंगल (Mangal) पूरी तरह से निष्प्रभावी हो जाता है, जबकि सम राशियों में यह बाल (Bala) अवस्था में होता है। यह ध्यान रखना अत्यंत महत्वपूर्ण है कि यह अनुक्रम विषम राशियों (मेष, मिथुन, सिंह, तुला, धनु, कुंभ) में सामान्य रूप से चलता है, लेकिन सम राशियों (वृषभ, कर्क, कन्या, वृश्चिक, मकर, मीन) में यह अनुक्रम पूरी तरह से उलट जाता है। मंगल (Mangal) की अपनी राशियां मेष (विषम) और वृश्चिक (सम) हैं।

Ashtakavarga

अष्टकवर्ग (Ashtakavarga) प्रणाली में सप्तम भाव को मिलने वाले बिंदु (Bindu) इस placement के वास्तविक परिणाम को निर्धारित करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। यदि सप्तम भाव में मंगल (Mangal) को 5 या उससे अधिक बिंदु (Bindu) प्राप्त होते हैं, तो यह मंगल (Mangal) के नकारात्मक प्रभावों को बहुत हद तक कम कर देता है और जातक को साझेदारी तथा व्यापार में सफलता प्रदान करता है। इसके विपरीत, यदि बिंदु (Bindu) 28 से कम (विशेष रूप से इस भाव में 3 से कम) हों, तो मंगल (Mangal) का नकारात्मक प्रभाव अत्यधिक बढ़ जाता है, जिससे वैवाहिक जीवन में गंभीर अशांति उत्पन्न होती है।

Nakshatra

सप्तम भाव में मंगल (Mangal) जिस नक्षत्र में स्थित होता है, उस नक्षत्र का स्वामी मंगल (Mangal) के परिणामों को गहराई से प्रभावित करता है। यदि मंगल (Mangal) अपने मित्र ग्रहों (जैसे सूर्य, चंद्रमा, बृहस्पति) के नक्षत्र में हो, तो परिणाम अधिक सकारात्मक होते हैं। इसके विपरीत, यदि यह शत्रु ग्रहों (जैसे बुध, राहु) के नक्षत्र में स्थित हो, तो यह वैवाहिक जीवन में अत्यधिक कलह, मानसिक तनाव और स्वास्थ्य संबंधी समस्याएं उत्पन्न करता है।

Navamsha

नवमांश (Navamsha) कुंडली (D9) जन्म कुंडली के वादों की पुष्टि या उन्हें रद्द करने का कार्य करती है। Jataka Parijata के अनुसार, यदि मंगल (Mangal) नवमांश (Navamsha) में शुक्र (Venus) की राशि (Rashi) में स्थित हो और उस पर किसी शुभ ग्रह की दृष्टि (Drishti) हो, तो स्त्री जातक अपने पति की अत्यंत प्रिय होती है। इसके विपरीत, यदि मंगल (Mangal) नवमांश (Navamsha) में सप्तम भाव की राशि (Rashi) में हो और उस पर शनि (Saturn) की दृष्टि (Drishti) हो, तो जातक को अपने जीवनसाथी द्वारा उपेक्षित होना पड़ता है।

Condition of the Lord of the 7th House

सप्तम भाव के अधिपति (सप्तमेश - Saptamesh) की स्थिति इस भाव में स्थित मंगल (Mangal) के परिणामों को अंतिम रूप देती है। यदि सप्तमेश (Saptamesh) बलवान, शुभ भावों में और शुभ ग्रहों से दृष्ट हो, तो वह सप्तम भाव में स्थित मंगल (Mangal) की उग्रता को नियंत्रित कर लेता है और विवाह को सुरक्षित रखता है। इसके विपरीत, यदि सप्तमेश (Saptamesh) स्वयं नीच का हो, शत्रु राशि (Rashi) में हो, या अस्त (Astangata) हो, तो सप्तम भाव का मंगल (Mangal) पूरी तरह से अनियंत्रित हो जाता है और वैवाहिक जीवन में गंभीर तबाही मचा सकता है।

In the KP System

कृष्णमूर्ति पद्धति (KP System) में, किसी भी भाव के परिणामों का सटीक निर्णय उस भाव के कस्पल सब-लॉर्ड (Cuspal Sub-Lord) द्वारा किया जाता है। सप्तम भाव का सब-लॉर्ड यह तय करता है कि जातक का विवाह होगा या नहीं, और वैवाहिक जीवन कैसा रहेगा। विवाह के संकेतक: यदि सप्तम भाव का सब-लॉर्ड या मंगल (Mangal) कुंडली के 2, 7 और 11वें भावों का कार्येश (Significator) बनता है, और वह छठे भाव (जो विवाह का बाधक भाव है) को दृढ़ता से संकेत नहीं करता, तो जातक का विवाह समय पर और सफल होता है। संचार और यात्राएं: यदि तृतीय भाव का सब-लॉर्ड बुध (Mercury) के नक्षत्र में हो और मंगल (Mangal) उस नक्षत्र के माध्यम से गोचर करता है, तो जातक अपने व्यावसायिक भागीदारों या जीवनसाथी के साथ अत्यंत लाभदायक संचार और यात्राएं करता है। माता द्वारा त्याग: K.P. Reader III के अनुसार, यदि चंद्रमा (Moon) सप्तम भाव में स्थित होकर मंगल (Mangal) और शनि (Saturn) से त्रिकोण संबंध बनाता है और उस पर बृहस्पति (Jupiter) की कोई दृष्टि (Drishti) नहीं होती, तो जातक को बचपन में उसकी माता द्वारा त्याग दिया जाता है।

Practical Significations

वैवाहिक जीवन और जीवनसाथी

तीव्रता और घर्षण: वैवाहिक जीवन में अत्यधिक ऊर्जा, जुनून और साथ ही बार-बार वैचारिक मतभेद और क्रोध की स्थितियां उत्पन्न होती हैं। मांगलिक दोष (Mangalik Dosha): सप्तम भाव का मंगल (Mangal) एक मजबूत मांगलिक दोष का निर्माण करता है, जिसके कारण विवाह में देरी या जीवनसाथी के साथ गंभीर तालमेल की कमी हो सकती है। जीवनसाथी का स्वभाव: जातक का जीवनसाथी साहसी, स्वतंत्र विचारों वाला, शारीरिक रूप से मजबूत और कभी-कभी अत्यधिक क्रोधी या जिद्दी हो सकता है।

साझेदारी और व्यापार

जोखिम लेने की प्रवृत्ति: जातक व्यापारिक साझेदारी में त्वरित और साहसिक निर्णय लेता है, जिससे उसे भारी लाभ या अचानक हानि हो सकती है। साझेदारों के साथ विवाद: व्यापारिक भागीदारों के साथ नियंत्रण और अधिकार को लेकर बार-बार विवाद होने की संभावना रहती है। तकनीकी और भूमि संबंधी व्यापार: जातक को भूमि, भवन निर्माण, मशीनरी, धातु और रक्षा संबंधी क्षेत्रों में व्यापार करने से सफलता प्राप्त होती है।

Frequently Asked Questions

क्या सप्तम भाव में मंगल हमेशा वैवाहिक जीवन को नष्ट करता है?
नहीं, सप्तम भाव में मंगल (Mangal) हमेशा वैवाहिक जीवन को नष्ट नहीं करता है। यदि मंगल (Mangal) अपनी स्वराशि (मेष, वृश्चिक) या उच्च राशि (मकर) में हो, या उस पर बृहस्पति (Jupiter) जैसे शुभ ग्रहों की दृष्टि (Drishti) हो, तो वैवाहिक जीवन में आक्रामकता के बावजूद स्थिरता बनी रहती है और जातक को एक सफल जीवनसाथी प्राप्त होता है।
क्या सप्तम भाव में मंगल होने पर जीवनसाथी की मृत्यु निश्चित है?
नहीं, जीवनसाथी की मृत्यु केवल सप्तम भाव में मंगल (Mangal) होने से नहीं होती। शास्त्रीय ग्रंथों के अनुसार, यह स्थिति तभी बनती है जब मंगल (Mangal) अत्यंत पीड़ित हो, उस पर केवल शनि (Saturn) की पापी दृष्टि (Drishti) हो, और सप्तमेश (Saptamesh) तथा कारक शुक्र (Venus) भी पूरी तरह से बलहीन या दूषित हों।
सप्तम भाव में मंगल के लिए कौन सी राशि सबसे अच्छी मानी जाती है?
मकर राशि (Rashi) को सप्तम भाव में मंगल (Mangal) के लिए सबसे अच्छा माना जाता है, क्योंकि यहां मंगल (Mangal) उच्च (Exalted) का होता है और एक शक्तिशाली रुचक योग (Ruchaka Yoga) बनाता है। इसके अलावा मेष, वृश्चिक और धनु राशियां भी मंगल (Mangal) के लिए अनुकूल परिणाम देती हैं।
क्या सप्तम भाव का मंगल 'मांगलिक दोष' बनाता है?
हां, सप्तम भाव में मंगल (Mangal) की उपस्थिति को ज्योतिष में एक प्रमुख मांगलिक दोष (Mangalik Dosha) माना जाता है। यह दोष वैवाहिक जीवन में सामंजस्य की कमी और संघर्ष को दर्शाता है। हालांकि, सिंह और कुंभ जैसी राशियों में यह दोष स्वतः ही निष्प्रभावी हो जाता है।
क्या सप्तम भाव में मंगल और शनि की युति हमेशा हानिकारक होती है?
सप्तम भाव में मंगल (Mangal) और शनि (Saturn) की युति को आम तौर पर वैवाहिक जीवन के लिए अत्यंत कष्टकारी माना जाता है। लेकिन यदि यह युति कर्क राशि (Rashi) में हो, तो शास्त्रीय ग्रंथों के अनुसार जातक को एक सुंदर और अच्छे चरित्र वाला जीवनसाथी प्राप्त होता है।
सप्तम भाव में मंगल होने पर साझेदारी के व्यवसाय में क्या सावधानी रखनी चाहिए?
सप्तम भाव में मंगल (Mangal) होने पर जातक को साझेदारी के व्यवसाय में अत्यधिक सावधानी रखनी चाहिए। उसे किसी भी दस्तावेज पर बिना सोचे-समझे हस्ताक्षर नहीं करने चाहिए और अपने भागीदारों के साथ स्पष्ट और पारदर्शी संबंध बनाए रखने चाहिए, क्योंकि यहां मंगल (Mangal) अचानक विवाद और अलगाव करा सकता है।

Remedial Measures

दान और पूजा: The Essence of Nadi Astrology के अनुसार, यदि शनि (Saturn), मंगल (Mangal) और केतु (Ketu) का अशुभ योग बन रहा हो, तो जातक को नियमित रूप से मंदिर में पूजा-अर्चना और दान कार्य करने चाहिए। इससे व्यावसायिक उन्नति, संतान सुख और आध्यात्मिक प्रगति प्राप्त होती है। हनुमान जी की आराधना: मंगल (Mangal) के अशुभ प्रभावों को शांत करने के लिए नियमित रूप से हनुमान चालीसा या बजरंग बाण का पाठ करना अत्यंत लाभकारी माना गया है।

Standard Remedies for Mars

आध्यात्मिक उपाय: प्रत्येक मंगलवार को तांबे के पात्र से सूर्य देव और मंगल देव को लाल चंदन मिश्रित जल से अर्घ्य (Arghya) दें। इसके साथ ही मंगल स्तोत्र (Stotra) या मंगल मंत्र (Mantra) - "ॐ क्रां क्रीं क्रौं सः भौमाय नमः" का 108 बार जाप करें। व्यवहारिक उपाय: अपने छोटे भाइयों और भाई समान व्यक्तियों के साथ संबंध मधुर रखें। उनके साथ किसी भी प्रकार के विवाद से बचें और यथासंभव उनकी आर्थिक या शारीरिक रूप से सहायता करें, क्योंकि मंगल (Mangal) भाई का कारक (Karaka) है। दान कार्य: मंगलवार के दिन लाल मसूर की दाल, तांबा, लाल वस्त्र, गुड़, या गेहूं का दान किसी जरूरतमंद व्यक्ति या मंदिर में करें। मंगलवार के दिन रक्तदान करना भी मंगल (Mangal) के अशुभ प्रभावों को कम करने का एक अचूक उपाय है। रत्न धारण (चेतावनी): मंगल (Mangal) का मुख्य रत्न मूंगा (Red Coral) है। विशेष चेतावनी: मूंगा रत्न केवल तभी धारण करना चाहिए जब मंगल (Mangal) जातक की कुंडली के लिए एक कार्यात्मक शुभ ग्रह (Functional Benefic) हो, जैसे मेष, कर्क, सिंह, वृश्चिक, धनु और मीन लग्न (Lagna) के जातकों के लिए। वृषभ, मिथुन, कन्या, तुला, मकर और कुंभ लग्न (Lagna) के जातकों के लिए मंगल (Mangal) एक कार्यात्मक पापी ग्रह (Functional Malefic) होता है, इसलिए उन्हें मूंगा धारण करने से बचना चाहिए, अन्यथा यह उनके कष्टों को और अधिक बढ़ा सकता है। अपनी कुंडली में सप्तम भाव में स्थित मंगल (Mangal) के प्रभावों का सटीक विश्लेषण करने के लिए, जातक को केवल इस एक स्थिति को देखकर किसी निष्कर्ष पर नहीं पहुंचना चाहिए। उसे लग्न कुंडली के साथ-साथ नवमांश (Navamsha) चक्र, अष्टकवर्ग (Ashtakavarga) बिंदु, और वर्तमान में चल रही दशा (Dasha) और भुक्ति (Bhukti) का भी समग्र रूप से अध्ययन करना चाहिए, क्योंकि अंतिम परिणाम इन सभी कारकों के संयुक्त प्रभाव से ही प्रकट होता है।

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Sources consulted

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