Moon in the 6th House

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वैदिक ज्योतिष में, चंद्रमा को Chandra [Moon] और छठे भाव को Shashta Bhava [Sixth House] कहा जाता है। छठा भाव मुख्य रूप से शत्रुओं (Shatru), ऋण (Rina), रोग (Roga), और सेवा (Seva) का प्रतिनिधित्व करता है, जबकि चंद्रमा मन (Manas), माता (Matri), और भावनाओं (Bhavana) का कारक (Karaka) है। जब मन और भावनाओं का यह संवेदनशील ग्रह छठे भाव में स्थित होता है, तो यह जातक के मानसिक स्वास्थ्य, स्वास्थ्य संबंधी चिंताओं, और सेवा-उन्मुख कार्यों में गहरी रुचि को जन्म देता है। यह संयोजन सामान्यतः जीवन में उतार-चढ़ाव, स्वास्थ्य के प्रति संवेदनशीलता और शत्रुओं या विरोधियों से निपटने की आवश्यकता को दर्शाता है, हालांकि चंद्रमा की गरिमा और उस पर पड़ने वाले शुभ या अशुभ ग्रहों के प्रभाव ही अंतिम परिणाम का निर्धारण करते हैं। पाठकों को यह ध्यान रखना चाहिए कि शास्त्रीय ग्रंथ अक्सर परिणामों को अत्यंत कठोर और पूर्ण शब्दों में प्रस्तुत करते हैं; कुंडली में किसी एक ग्रह की स्थिति को अलग करके नहीं देखा जाना चाहिए, और ऐसे गंभीर परिणाम केवल तभी प्रकट होते हैं जब संपूर्ण कुंडली में कई प्रतिकूल प्रभाव एक साथ मौजूद हों।

Classical Position

शास्त्रीय ज्योतिषीय परंपराओं में इस बात पर व्यापक सहमति है कि छठे भाव में चंद्रमा की स्थिति जातक के स्वास्थ्य और जीवन के विभिन्न पहलुओं को गहराई से प्रभावित करती है। प्रामाणिक ग्रंथों में यह स्पष्ट रूप से स्वीकार किया गया है कि यदि Lagna [Ascendant] का स्वामी या Chandra छठे, आठवें (Ashta Bhava), या बारहवें (Dvadasha Bhava) भाव में स्थित हो, तो यह जातक के लिए संभावित अस्वस्थता और शारीरिक कष्टों का संकेत देता है। यह सिद्धांत PAC DARES kn rao और KN-RAO-S-Astrology-Lessons जैसी आधुनिक प्रामाणिक कृतियों में भी समान रूप से पुष्ट है।

इसके अतिरिक्त, यदि Chandra और Surya [Sun] क्रमशः बारहवें और छठे भाव में स्थित हों, तो परंपरा के अनुसार जातक और उसकी जीवनसाथी दोनों के नेत्रों में दोष (विशेष रूप से एक आंख से कमजोर होना) उत्पन्न हो सकता है। यह योग Saravali और पराशरीय परंपराओं में समान रूप से पुष्ट है। शास्त्रीय ग्रंथों के अनुसार, छठे भाव में चंद्रमा की उपस्थिति जातक को शत्रुओं से घिरे रहने और शारीरिक रूप से संवेदनशील होने की ओर प्रवृत्त करती है, जिससे जीवन में निरंतर संघर्ष की स्थिति बनी रहती है।

Variant Readings

विभिन्न शास्त्रीय और नाड़ी ग्रंथों में छठे भाव में चंद्रमा की स्थिति को लेकर कई विशिष्ट और भिन्न दृष्टिकोण प्रस्तुत किए गए हैं। इन आचार्यों के मतों को निम्नलिखित श्रेणियों में विभाजित किया जा सकता है:

Physical Appearance and Health

  • कमजोर पाचन और नाजुक शरीर: Jataka Parijata के अनुसार, छठे भाव में स्थित चंद्रमा जातक को एक नाजुक शारीरिक बनावट और कमजोर पाचन शक्ति प्रदान करता है।
  • वात संबंधी विकार: Sarvartha Chintamani JN Bhasin के अनुसार, यदि चंद्रमा छठे भाव में किसी पापी ग्रह के साथ हो, पापी ग्रह द्वारा देखा जाता हो, और पाप Navamsha [nine-fold division] में स्थित हो, तो जातक को वात रोग का सामना करना पड़ता है।
  • नेत्रहीनता के गंभीर योग: Jataka Parijata के अनुसार, यदि चंद्रमा छठे भाव में हो, सूर्य आठवें में, शनि बारहवें में, और मंगल दूसरे भाव में स्थित हो, तो जातक नेत्रहीन हो सकता है। इसी प्रकार, यदि चंद्रमा छठे, आठवें या बारहवें भाव में हो और शनि व मंगल की युति हो, तो भी दृष्टिहीनता की संभावना बनती है।
  • असाध्य रोग और विष का प्रभाव: Prasna Arudhaphala के अनुसार, यदि प्रश्न काल के समय चंद्रमा या राहु उदय लग्न, छठे या आठवें भाव में स्थित हो, तो विष या तंत्र-मंत्र के कारण उत्पन्न रोग आसानी से ठीक नहीं होते हैं।
  • अल्पायु और अरिष्ट योग: Scientific Hindu Astrology के अनुसार, यदि चंद्रमा छठे या आठवें भाव में शुभ राशि या नक्षत्र में हो लेकिन पाप ग्रहों से दृष्ट हो, तो शिशु की शीघ्र मृत्यु हो सकती है। हालांकि, यदि शुभ ग्रह भी इसे देखते हों, तो वह कम से कम आठ वर्ष तक जीवित रहता है। Jataka Parijata के अनुसार, यदि चंद्रमा छठे या आठवें भाव में हो और उस पर शुभ व अशुभ दोनों ग्रहों की दृष्टि हो, तो आयु चार वर्ष होती है।
  • नासिका रोग: 300 Important Combinations और Jataka tattvam Kadalangudi के अनुसार, यदि चंद्रमा छठे भाव में हो, शनि आठवें में हो, कोई पापी ग्रह बारहवें भाव में हो, और लग्नेश पाप Navamsha में हो, तो जातक को साइनस या नासिका संबंधी गंभीर रोग हो सकते हैं।

Temperament and Mental State

  • आलस्य और कठोरता: Jataka Parijata के अनुसार, छठे भाव का चंद्रमा जातक के स्वभाव में कुछ कठोरता और आलस्य उत्पन्न कर सकता है।
  • कमजोर कामेच्छा: इसी ग्रंथ के अनुसार, इस स्थिति के कारण जातक की यौन इच्छा या कामुकता कमजोर हो सकती है।
  • मानसिक अशांति और चिंता: Brihat Parashara Hora Shastra-Santhanam-Vol-2 के अनुसार, यदि चंद्रमा अपने दशा स्वामी या किसी पापी ग्रह से छठे, आठवें या बारहवें भाव में स्थित हो, तो यह जातक के मन में अत्यधिक चिंता, भटकाव और धन की हानि का कारण बनता है।

Wealth, Status and Life Events

  • शत्रुओं की अधिकता: Jataka Parijata के अनुसार, छठे भाव में चंद्रमा होने से जातक के कई शत्रु होते हैं, जो उसे समय-समय पर परेशान करते हैं।
  • Chandra Adhi Yoga: Saravali और Uttara-kalamrita के अनुसार, यदि चंद्रमा से छठे, सातवें और आठवें भाव में केवल शुभ ग्रह (बुध, गुरु, शुक्र) स्थित हों और कोई पापी ग्रह न हो, तो एक अत्यंत शक्तिशाली Chandra Adhi Yoga [lunar adhi yoga] का निर्माण होता है। यह योग जातक को सेनापति, मंत्री या राजा के समान समृद्ध, दीर्घायु, और शत्रुओं पर विजय प्राप्त करने वाला बनाता है।
  • माता को कष्ट या हानि: Jataka-Parijata के अनुसार, यदि क्षीण चंद्रमा किसी पापी ग्रह के साथ छठे, आठवें या बारहवें भाव में हो और चतुर्थ भाव में भी पापी ग्रह स्थित हो, तो जातक की माता की शीघ्र मृत्यु या हानि हो सकती है। Doctrines of Suka Nadi के अनुसार, यदि तृतीयेश चंद्रमा के साथ युति करके छठे, आठवें या बारहवें भाव में हो, तो जन्म के कुछ ही दिनों के भीतर माता का देहांत हो सकता है।
  • राजसी प्रतीकों की चिंता: Jatak Alankaar के अनुसार, छठे भाव में चंद्रमा या शुक्र की उपस्थिति राजसी प्रतीकों जैसे छत्र और चामर के संबंध में चिंताएं या कमी उत्पन्न करती है।
  • संतान हानि का श्राप: 300 Important Combinations के अनुसार, यदि अष्टमेश पंचम भाव में हो, पंचमेश अष्टम भाव में हो, और चंद्रमा व चतुर्थेश छठे भाव में युति कर रहे हों, तो माता के श्राप के कारण संतान की हानि हो सकती है।

Aspect and Directional Strength

वैदिक ज्योतिष के नियमों के अनुसार, छठे भाव में स्थित कोई भी ग्रह अपने स्थान से सातवें भाव पर पूर्ण Drishti [aspect] डालता है। इस प्रकार, छठे भाव से चंद्रमा अपनी पूर्ण दृष्टि बारहवें भाव (Dvadasha Bhava) पर डालता है, जो व्यय, मोक्ष, और विदेशी भूमि का भाव है। चूंकि चंद्रमा एक सौम्य ग्रह है (यदि वह शुक्ल पक्ष का हो), इसलिए उसकी दृष्टि बारहवें भाव के शुभ परिणामों को बढ़ाती है, जिससे जातक का झुकाव आध्यात्मिक व्यय और दान की ओर होता है।

हालांकि, यदि चंद्रमा कृष्ण पक्ष का और क्षीण हो, तो वह एक Krura [fierce] ग्रह की तरह व्यवहार करता है, जिससे बारहवें भाव पर दबाव बढ़ता है और अनिद्रा या व्यर्थ के खर्चों में वृद्धि हो सकती है। दिशात्मक बल या Digbala [directional strength] की बात करें तो चंद्रमा चतुर्थ भाव (Chaturtha Bhava) में सबसे मजबूत होता है, जहां उसे पूर्ण Digbala प्राप्त होता है। छठे भाव में चंद्रमा की स्थिति चतुर्थ भाव से ठीक तीसरे भाव में होती है, जिसके कारण चंद्रमा अपने पूर्ण दिशात्मक बल से वंचित हो जाता है। इस कमी के कारण जातक को मानसिक शांति बनाए रखने और घरेलू सुख प्राप्त करने में अधिक संघर्ष करना पड़ता है।

The Placement Across the Twelve Rashis

चंद्रमा की छठे भाव में स्थिति बारह अलग-अलग राशियों में अत्यंत विविध परिणाम उत्पन्न करती है। प्रत्येक राशि के स्वामी, चंद्रमा की गरिमा और विशिष्ट नाड़ी या शास्त्रीय सिद्धांतों के आधार पर इसके प्रभावों का विश्लेषण नीचे दिया गया है:

Aries (Mesha)

छठे भाव में Chandra in Aries होने पर यह मंगल की राशि में 'तटस्थ' (Neutral) गरिमा में होता है। यह स्थिति वृश्चिक लग्न का निर्माण करती है, जहां चंद्रमा नवम भाव (Navama Bhava) का स्वामी होकर छठे भाव में स्थित होता है। नवमेश का छठे भाव में जाना यह दर्शाता है कि जातक के भाग्य और पिता के जीवन में कुछ संघर्ष या ऋण की स्थितियां आ सकती हैं। नाड़ी ग्रंथ ChandraKala Nadi के अनुसार, यदि चंद्रमा मेष Navamsha में हो, तो जातक के जीवन में 28वें वर्ष में महत्वपूर्ण घटनाएं घटित होती हैं। इसके अतिरिक्त, मंगलवार के दिन जब चंद्रमा मेष राशि में हो और मृगशिरा, चित्रा, अनुराधा या धनिष्ठा नक्षत्र चल रहा हो, तो यह मूंगा (Coral) रत्न खरीदने या धारण करने के लिए अत्यंत शुभ समय माना जाता है।

Taurus (Vrishabha)

छठे भाव में Chandra in Taurus होने पर चंद्रमा अपनी 'उच्च' (Exalted) गरिमा प्राप्त करता है, जिसका स्वामी शुक्र है। यह स्थिति धनु लग्न का निर्माण करती है, जहां चंद्रमा अष्टम भाव (Ashta Bhava) का स्वामी होकर छठे भाव में उच्च का होता है। अष्टमेश का छठे भाव में उच्च का होना एक विपरीत राजयोग जैसी स्थिति बना सकता है, लेकिन स्वास्थ्य के दृष्टिकोण से यह संवेदनशील है। Jatak Alankaar के अनुसार, यदि केंद्र में शुभ ग्रह हों, चंद्रमा वृषभ राशि में हो और लग्नेश लग्न में मजबूत हो, तो जातक की आयु 60 वर्ष होती है। हालांकि, Saravali के अनुसार, यदि राशि संधि पर पापी ग्रह हों और वृषभ का चंद्रमा मंगल, शनि और सूर्य से दृष्ट हो, तो जातक मूक या गूंगा हो सकता है। वृषभ राशि का चंद्रमा यदि सूर्य से दृष्ट हो, तो जातक एक मेहनती किसान, नौकरों से युक्त और ब्याज पर धन देने वाला होता है। यदि मंगल इसे देखे, तो जातक कामुक होता है और माता के लिए यह स्थिति प्रतिकूल होती है।

Gemini (Mithuna)

छठे भाव में Chandra in Gemini होने पर यह बुध की राशि में 'मित्र' (Friendly) गरिमा में होता है। यह स्थिति मकर लग्न का निर्माण करती है, जहां चंद्रमा सप्तम भाव (Saptama Bhava) का स्वामी होकर छठे भाव में स्थित होता है। सप्तमेश का छठे भाव में जाना वैवाहिक जीवन में विवाद, जीवनसाथी के स्वास्थ्य में उतार-चढ़ाव या साझेदारी में ऋण की स्थिति को दर्शाता है। नाड़ी ग्रंथ ChandraKala Nadi के अनुसार, यदि चंद्रमा मिथुन Navamsha में हो, तो जातक का विवाह या कोई बड़ी घटना 30वें वर्ष में होती है। Saravali के अनुसार, यदि मिथुन राशि के चंद्रमा पर सूर्य की दृष्टि हो, तो जातक विद्वान और परोपकारी तो होता है, लेकिन वह दुखी और निर्धन रह सकता है। यदि इस पर मंगल की दृष्टि हो, तो यह जातक की समृद्धि के लिए अनुकूल मानी जाती है।

Cancer (Karka)

छठे भाव में Chandra in Cancer होने पर यह अपनी 'स्वराशि' (Own Sign) में होता है। यह स्थिति कुंभ लग्न का निर्माण करती है, जहां चंद्रमा स्वयं छठे भाव का स्वामी होकर वहीं स्थित होता है। छठे भाव के स्वामी का स्वराशि में होना शत्रुओं का नाश करने और रोगों से लड़ने की अद्भुत क्षमता प्रदान करता है। Saravali के अनुसार, यदि कर्क राशि के चंद्रमा पर बुध की दृष्टि हो, तो जातक बुद्धिमान, उत्साही, धनी और मंत्री बनता है। यदि गुरु की दृष्टि हो, तो जातक राजा के समान सुखी, विनम्र और वीर होता है। शुक्र की दृष्टि जातक को अत्यधिक धनी और विलासी बनाती है, जबकि शनि की दृष्टि जातक को भटकाव, गरीबी और दुख की ओर ले जाती है।

Leo (Simha)

छठे भाव में Chandra in Leo होने पर यह सूर्य की राशि में 'मित्र' (Friendly) गरिमा में होता है। यह स्थिति मीन लग्न का निर्माण करती है, जहां चंद्रमा पंचम भाव (Pancha Bhava) का स्वामी होकर छठे भाव में स्थित होता है। पंचमेश का छठे भाव में जाना संतान संबंधी चिंताएं या शिक्षा में रुकावटें दे सकता है, लेकिन यह जातक को एक उत्कृष्ट विश्लेषक भी बनाता है। Saravali के अनुसार, सिंह राशि के चंद्रमा पर यदि सूर्य की दृष्टि हो, तो जातक राजा के समान तेजस्वी, गंभीर आवाज वाला और प्रसिद्ध होता है। यदि मंगल की दृष्टि हो, तो जातक सेनापति बनता है और उसे उत्तम पत्नी व धन प्राप्त होता है। बुध की दृष्टि जातक में कुछ स्त्रैण गुण और विलासिता लाती है, जबकि गुरु की दृष्टि उसे समाज में अत्यंत सम्मानित और गुणी बनाती है।

Virgo (Kanya)

छठे भाव में Chandra in Virgo होने पर यह बुध की राशि में 'मित्र' (Friendly) गरिमा में होता है। यह स्थिति मेष लग्न का निर्माण करती है, जहां चंद्रमा चतुर्थ भाव (Chaturtha Bhava) का स्वामी होकर छठे भाव में स्थित होता है। चतुर्थेश का छठे भाव में जाना माता के स्वास्थ्य में कमजोरी और घरेलू सुख में कमी का संकेत देता है। Saravali के अनुसार, कन्या राशि के चंद्रमा पर यदि सूर्य की दृष्टि हो, तो यह जातक के करियर और प्रतिष्ठा के लिए अनुकूल होती है। यदि बुध की दृष्टि हो, तो जातक ज्योतिष और साहित्य में निपुण होता है और विवादों में विजयी रहता है। गुरु की दृष्टि जातक को सामाजिक प्रतिष्ठा और धन प्रदान करती है, जबकि शुक्र की दृष्टि जातक को कई सुख-साधन और समृद्धि देती है। हालांकि, यदि कन्या राशि का चंद्रमा पापी ग्रहों के प्रभाव में हो, तो जातक को अपेंडिसाइटिस (Appendicitis) जैसी बीमारी का खतरा रहता है।

Libra (Tula)

छठे भाव में Chandra in Libra होने पर यह शुक्र की राशि में 'तटस्थ' (Neutral) गरिमा में होता है। यह स्थिति वृषभ लग्न का निर्माण करती है, जहां चंद्रमा तृतीय भाव (Tritiya Bhava) का स्वामी होकर छठे भाव में स्थित होता है। तृतीयेश का छठे भाव में जाना भाई-बहनों के साथ विवाद या यात्राओं में कठिनाइयों को दर्शाता है। Saravali के अनुसार, तुला राशि के चंद्रमा पर यदि मंगल की दृष्टि हो, तो जातक चतुर लेकिन कुछ अनैतिक प्रवृत्तियों वाला हो सकता है और उसे नेत्र रोग हो सकते हैं। बुध की दृष्टि जातक को कलाओं में कुशल, धनी और एक प्रभावशाली वक्ता बनाती है। शनि की दृष्टि जातक को समृद्ध और मधुर भाषी बनाती है, लेकिन वह आंतरिक रूप से दुखी रह सकता है।

Scorpio (Vrischika)

छठे भाव में Chandra in Scorpio होने पर चंद्रमा अपनी 'नीच' (Debilitated) गरिमा में होता है, जिसका स्वामी मंगल है। यह स्थिति मिथुन लग्न का निर्माण करती है, जहां चंद्रमा द्वितीय भाव (Dvitiya Bhava) का स्वामी होकर छठे भाव में नीच का होता है। द्वितीयेश का छठे भाव में नीच का होना गंभीर वित्तीय अस्थिरता, संचित धन की हानि और परिवार के साथ वैचारिक मतभेद पैदा करता है। Saravali के अनुसार, वृश्चिक राशि के चंद्रमा पर यदि सूर्य की दृष्टि हो, तो यह जातक के संघर्षों को बढ़ाती है। यदि मंगल की दृष्टि हो, तो जातक को अत्यधिक साहस और धन प्राप्त होता है। बुध की दृष्टि जातक को कठोर भाषी और चालाक बनाती है, जबकि गुरु की दृष्टि जातक को अपने कर्तव्यों के प्रति समर्पित और सुंदर बनाती है। शनि की दृष्टि जातक को रोगी, गरीब और असत्यवादी बना सकती है।

Sagittarius (Dhanu)

छठे भाव में Chandra in Sagittarius होने पर यह गुरु की राशि में 'तटस्थ' (Neutral) गरिमा में होता है। यह स्थिति कर्क लग्न का निर्माण करती है, जहां चंद्रमा स्वयं लग्न भाव (Lagna Bhava) का स्वामी होकर छठे भाव में स्थित होता है। लग्नेश का छठे भाव में जाना जातक को संघर्षशील और स्वास्थ्य के प्रति संवेदनशील बनाता है। Saravali के अनुसार, धनु राशि के चंद्रमा पर यदि सूर्य की दृष्टि हो, तो जातक राजा के समान सुखी और समृद्ध होता है। यदि मंगल की दृष्टि हो, तो जातक सेना प्रमुख और अत्यंत पराक्रमी होता है। बुध की दृष्टि जातक को ज्योतिष, कला और नृत्य में निपुण बनाती है, जबकि गुरु की दृष्टि जातक को एक आकर्षक व्यक्तित्व, मंत्री पद और अपार सुख-संपत्ति प्रदान करती है।

Capricorn (Makara)

छठे भाव में Chandra in Capricorn होने पर यह शनि की राशि में 'तटस्थ' (Neutral) गरिमा में होता. है। यह स्थिति सिंह लग्न का निर्माण करती है, जहां चंद्रमा द्वादश भाव (Dvadasha Bhava) का स्वामी होकर छठे भाव में स्थित होता है। द्वादशेश का छठे भाव में जाना एक प्रकार का 'सरल विपरीत राजयोग' बनाता है, जो जातक को शत्रुओं पर विजय और ऋणों से मुक्ति दिलाने में सहायक होता है। हालांकि, मानसिक रूप से जातक अपनी भावनाओं को छिपाने वाला और कुछ हद तक ठंडा या भावनाहीन व्यवहार करने वाला हो सकता है। Saravali के अनुसार, मकर राशि के चंद्रमा पर यदि शुक्र की दृष्टि हो, तो यह जातक के सुखों को बढ़ाती है, जबकि शनि की दृष्टि जातक को गंभीर और अनुशासित बनाती है।

Aquarius (Kumbha)

छठे भाव में Chandra in Aquarius होने पर यह शनि की राशि में 'तटस्थ' (Neutral) गरिमा में होता है। यह स्थिति कन्या लग्न का निर्माण करती है, जहां चंद्रमा एकादश भाव (Ekadasha Bhava) का स्वामी होकर छठे भाव में स्थित होता है। एकादशेश का छठे भाव में जाना आय के स्रोतों में उतार-चढ़ाव और बड़े भाई-बहनों के साथ मतभेद का संकेत देता है। Horasara के अनुसार, यदि कुंभ राशि का चंद्रमा छठे भाव में हो और उसकी दशा चल रही हो, तो जातक को हृदय रोग होने की संभावना रहती है। Saravali के अनुसार, यदि कुंभ राशि के चंद्रमा पर सूर्य की दृष्टि हो, तो यह जातक के जीवन में संघर्ष बढ़ाती है। यदि इस पर मंगल की दृष्टि हो, तो जातक माता के सुख से वंचित और निर्धन हो सकता है।

Pisces (Meena)

छठे भाव में Chandra in Pisces होने पर यह गुरु की राशि में 'तटस्थ' (Neutral) गरिमा में होता है। यह स्थिति तुला लग्न का निर्माण करती है, जहां चंद्रमा दशम भाव (Dashama Bhava) का स्वामी होकर छठे भाव में स्थित होता है। दशमेश का छठे भाव में जाना करियर में बार-बार बदलाव, नौकरी में सेवा-उन्मुख कार्य और सहकर्मियों के साथ विवादों को दर्शाता है। Saravali के अनुसार, मीन राशि के चंद्रमा पर यदि सूर्य की दृष्टि हो, तो यह जातक को समाज में प्रतिष्ठित बनाती है। यदि मंगल की दृष्टि हो, तो जातक साहसी होता है। बुध की दृष्टि जातक को बुद्धिमान और सुखी बनाती है, जबकि गुरु की दृष्टि जातक को शारीरिक रूप से आकर्षक, धनी और सुखी बनाती है। यदि शुक्र की दृष्टि हो, तो जातक कला, संगीत और नृत्य में अत्यधिक कुशल होता है।

Conjunctions in This House

छठे भाव में चंद्रमा के साथ अन्य ग्रहों की युति जातक के जीवन के विभिन्न क्षेत्रों में महत्वपूर्ण बदलाव लाती है। इन युतियों का शास्त्रीय विश्लेषण निम्नलिखित है:

Sun with Moon

छठे भाव में Sun with Moon की युति होने से अमावस्या योग का निर्माण होता है। यदि इस युति पर शुभ ग्रहों की दृष्टि हो, तो यह जातक को उद्योगों और श्रम संबंधों में सफलता दिलाती है। हालांकि, यदि इस युति पर पापी ग्रहों का प्रभाव हो, तो यह जातक को गंभीर नेत्र विकार, सरकार से परेशानी और शारीरिक कमजोरी प्रदान करती है। इस स्थिति में चंद्रमा पूरी तरह से अस्त (Astangata) हो जाता है, जिससे जातक का मानसिक बल कमजोर होता है।

Mars with Moon

छठे भाव में Mars with Moon की युति जातक को अत्यधिक साहसी और शत्रुओं पर विजय प्राप्त करने वाला बनाती है। हालांकि, Saravali के अनुसार, यदि चंद्रमा मंगल के साथ युति करता है, तो यह योग सामान्यतः अशुभ माना जाता है (दशम भाव को छोड़कर)। छठे भाव में यह युति जातक को रक्त संबंधी विकार, दुर्घटनाओं का भय और माता के स्वास्थ्य के लिए गंभीर चिंताएं प्रदान कर सकती है।

Mercury with Moon

छठे भाव में Mercury with Moon की युति जातक को एक विश्लेषणात्मक और खोजी दिमाग प्रदान करती है। जातक अपने शत्रुओं को अपनी बुद्धि और कूटनीति से परास्त करने में सक्षम होता है। हालांकि, यदि बुध और चंद्रमा दोनों पर पापी ग्रहों का प्रभाव हो, तो यह जातक को त्वचा रोग, तंत्रिका तंत्र की कमजोरी और मानसिक अस्थिरता दे सकता है।

Jupiter with Moon

छठे भाव में Jupiter with Moon की युति होने से 'गजकेसरी योग' जैसी स्थिति बनती है, लेकिन छठे भाव में होने के कारण इसके शुभ प्रभावों में कुछ कमी आती है। यह युति जातक को शत्रुओं पर विजय, धार्मिक झुकाव और सेवा कार्यों के माध्यम से समाज में सम्मान दिलाती है। हालांकि, जातक को कफ और पेट से संबंधित बीमारियों का सामना करना पड़ सकता है।

Venus with Moon

छठे भाव में Venus with Moon की युति जातक को कलात्मक और संवेदनशील बनाती है। हालांकि, छठे भाव में शुक्र और चंद्रमा दोनों की उपस्थिति मूत्र संबंधी विकारों, गुप्त रोगों और महिलाओं के कारण जीवन में विवाद या बदनामी का कारण बन सकती है। जातक को अपने सुख-साधनों को बनाए रखने के लिए अत्यधिक खर्च करना पड़ सकता है।

Saturn with Moon

छठे भाव में Saturn with Moon की युति को 'विष योग' कहा जाता है। यह युति जातक को अत्यधिक मानसिक तनाव, अवसाद, आलस्य और जीवन में निरंतर संघर्ष प्रदान करती है। जातक को पुरानी बीमारियों और वात रोगों का सामना करना पड़ सकता है। माता के साथ संबंध भी तनावपूर्ण या दूरी वाले हो सकते हैं।

Rahu with Moon

छठे भाव में Rahu with Moon की युति होने से 'ग्रहण योग' बनता है। यह युति जातक के मन में अज्ञात भय, भ्रम और मानसिक अशांति पैदा करती है। जातक को शत्रुओं द्वारा गुप्त षड्यंत्रों का सामना करना पड़ सकता है। नाड़ी ग्रंथों के अनुसार, यदि राहु और चंद्रमा कुंभ राशि में हों, तो जातक तरल पदार्थों या जड़ी-बूटियों से बनी दवाओं के निर्माण या चिकित्सा क्षेत्र में कार्य कर सकता है।

Ketu with Moon

छठे भाव में Ketu with Moon की युति जातक को अत्यधिक आध्यात्मिक और वैरागी प्रवृत्ति का बनाती है। जातक का मन भौतिक सुखों से दूर भागता है। हालांकि, यह युति जातक को पेट के कीड़े, रहस्यमयी बीमारियां और मानसिक भ्रम भी दे सकती है। नाड़ी ज्योतिष के अनुसार, यदि यह युति मिथुन राशि में हो, तो जातक सिलाई या दर्जी के कार्य में संलग्न हो सकता है।

जब छठे भाव में तीन या अधिक ग्रहों की युति होती है, तो जातक का पूरा जीवन छठे भाव के मामलों जैसे सेवा, संघर्ष, और चिकित्सा के इर्द-गिर्द केंद्रित हो जाता है। यदि इस भारी जमावड़े पर शनि का प्रभाव हो, तो यह जातक में पूर्ण वैराग्य और संन्यास (Sanyasa) की प्रवृत्ति को जन्म दे सकता है।

Aspects Received

छठे भाव में स्थित चंद्रमा पर जब अन्य ग्रहों की दृष्टि पड़ती है, तो इसके परिणामों में निम्नलिखित परिवर्तन आते हैं:

Jupiter's Aspect

गुरु की दृष्टि चंद्रमा पर होना अत्यंत शुभ माना जाता है। यह दृष्टि जातक को गहन आध्यात्मिकता, मानसिक शांति और कठिन परिस्थितियों से उबरने का बल प्रदान करती है। गुरु की अमृतमयी दृष्टि छठे भाव के दोषों को कम करती है और जातक को शत्रुओं पर नैतिक विजय दिलाती है।

Saturn's Aspect

शनि की दृष्टि चंद्रमा पर होने से जातक को मानसिक अवसाद, कार्यों में देरी और अत्यधिक जिम्मेदारी का अहसास होता है। यह दृष्टि जातक को गंभीर और अनुशासित बनाती है, लेकिन उसे माता के स्नेह से वंचित कर सकती है और पुरानी बीमारियों की ओर धकेल सकती है।

Mars's Aspect

मंगल की दृष्टि चंद्रमा पर होने से जातक का स्वभाव अत्यधिक भावुक, क्रोधी और आक्रामक हो जाता है। यह दृष्टि जातक को दुर्घटनाओं, शल्य चिकित्सा और रक्त संबंधी विकारों के प्रति संवेदनशील बनाती है, हालांकि यह शत्रुओं से मुकाबला करने का साहस भी देती है।

Rahu's Aspect

राहु की दृष्टि चंद्रमा पर पड़ने से जातक के मन में भ्रम, अनिद्रा और अज्ञात भय उत्पन्न होता है। जातक को त्वचा रोग या एलर्जी का सामना करना पड़ सकता है और वह शत्रुओं के गुप्त षड्यंत्रों का शिकार हो सकता है।

Ketu's Aspect

केतु की दृष्टि चंद्रमा पर होने से जातक का झुकाव तंत्र-मंत्र, रहस्यमयी विद्याओं और एकांतवास की ओर होता है। यह दृष्टि जातक को सांसारिक जीवन से विमुख कर सकती है और मानसिक रूप से अशांत रख सकती है।

Strength and Condition

छठे भाव में चंद्रमा के वास्तविक प्रभावों को समझने के लिए निम्नलिखित ज्योतिषीय घटकों का विश्लेषण करना अनिवार्य है:

Baladi Avastha

  • 0° - 6° (Bala Avastha): विषम राशियों (मेष, मिथुन, सिंह, तुला, धनु, कुंभ) में चंद्रमा इस अंश पर 'बाल' (Bala) अवस्था में होता है, जिससे उसके परिणाम कमजोर होते हैं। सम राशियों (वृषभ, कर्क, कन्या, वृश्चिक, मकर, मीन) में यह 'मृत' (Mrita) अवस्था होती है, जहां ग्रह निष्प्रभावी हो जाता है।
  • 6° - 12° (Kumara Avastha): विषम राशियों में कुमार और सम राशियों में 'वृद्ध' (Vriddha) अवस्था होती है।
  • 12° - 18° (Yuva Avastha): दोनों प्रकार की राशियों में यह अवस्था ग्रह को पूर्ण बल प्रदान करती है, जिससे चंद्रमा अपने परिणाम पूरी ताकत से देता है।
  • 18° - 24° (Vriddha Avastha): विषम राशियों में वृद्ध और सम राशियों में कुमार अवस्था होती है।
  • 24° - 30° (Mrita Avastha): विषम राशियों में मृत और सम राशियों में बाल अवस्था होती है।

Ashtakavarga

  • उच्च बिंदु (High Bindus): यदि छठे भाव को Ashtakavarga [eight-fold division of points] में 28 से अधिक बिंदु प्राप्त हैं, तो चंद्रमा छठे भाव के नकारात्मक प्रभावों (ऋण, रोग) को नियंत्रित करने में सक्षम होता है।
  • निम्न बिंदु (Low Bindus): यदि बिंदु 25 से कम हैं, तो चंद्रमा की दशा में जातक को गंभीर स्वास्थ्य समस्याओं और शत्रुओं के कारण भारी नुकसान उठाना पड़ सकता है।

Nakshatra

चंद्रमा जिस नक्षत्र में स्थित होता है, उस नक्षत्र का स्वामी चंद्रमा के परिणामों को गहराई से प्रभावित करता है। यदि नक्षत्र स्वामी कुंडली में शुभ भावों का स्वामी होकर मजबूत स्थिति में हो, तो चंद्रमा छठे भाव में भी शुभ परिणाम देने में सक्षम होता है।

Navamsha (D9)

यदि चंद्रमा Navamsha में अपनी उच्च या स्वराशि में स्थित हो, तो जन्म कुंडली के छठे भाव के अशुभ प्रभाव काफी हद तक कम हो जाते हैं। इसके विपरीत, यदि चंद्रमा नवमांश में भी शनि या मंगल की राशियों में या नीच का होकर स्थित हो, तो जातक को जीवन भर स्वास्थ्य और मानसिक अशांति का सामना करना पड़ता है।

Condition of the 6th Lord

छठे भाव के स्वामी (Shashtesha) की स्थिति अत्यंत महत्वपूर्ण है। यदि छठे भाव का स्वामी मजबूत, उच्च का या त्रिकोण में हो, तो वह चंद्रमा को सुरक्षा प्रदान करता है। इसके विपरीत, यदि छठे भाव का स्वामी स्वयं पीड़ित या कमजोर हो, तो छठे भाव में बैठा चंद्रमा पूरी तरह से पीड़ित हो जाता है और जातक को गंभीर संकटों का सामना करना पड़ता है।

In the KP System

कृष्णमूर्ति पद्धति (KP System) के अनुसार, ग्रहों के परिणामों का निर्धारण उनके नक्षत्र स्वामी और उप-स्वामी (Sub-lord) के माध्यम से किया जाता है। यदि जातक के लग्न का उप-उप-स्वामी (Sub-Sub Lord) या चंद्रमा का उप-स्वामी छठे भाव के कस्प (Cusp) से संबंध बनाता है, तो जातक के बीमार होने की संभावना अत्यधिक बढ़ जाती है। केपी प्रणाली में, राशि स्वामी की तुलना में उप-स्वामी को अधिक महत्व दिया जाता है क्योंकि वह घटना के घटित होने की सूक्ष्म और सटीक पुष्टि करता है।

Practical Significations

व्यावहारिक रूप से, छठे भाव में चंद्रमा की स्थिति को निम्नलिखित रूपों में देखा जाता है:

Daily Life and Service

  • सेवा भाव: जातक का झुकाव दूसरों की सेवा करने, चिकित्सा क्षेत्र में कार्य करने या सामाजिक कल्याण के कार्यों में होता है।
  • सहकर्मियों से संबंध: नौकरीपेशा जीवन में जातक को सहकर्मियों के साथ अपनी भावनाओं को संतुलित रखने में कठिनाई हो सकती है।

Health and Wellness

  • पाचन तंत्र: जातक को अपने खान-पान और पाचन तंत्र का विशेष ध्यान रखना चाहिए क्योंकि कमजोर पाचन की प्रवृत्ति बनी रहती है।
  • मानसिक स्वास्थ्य: मानसिक स्वास्थ्य को बनाए रखने के लिए जातक को नियमित ध्यान और प्राणायाम करना चाहिए।

Frequently Asked Questions

क्या छठे भाव में चंद्रमा का होना हमेशा खराब होता है?
नहीं, छठे भाव में चंद्रमा हमेशा खराब नहीं होता। यदि चंद्रमा उच्च का (वृषभ में) या स्वराशि (कर्क में) का हो, या फिर चंद्रमा से छठे, सातवें और आठवें भाव में शुभ ग्रह स्थित होकर अधियोग बना रहे हों, तो यह जातक को अत्यधिक समृद्ध, विजयी और दीर्घायु बनाता है।
छठे भाव में चंद्रमा स्वास्थ्य को कैसे प्रभावित करता है?
छठे भाव का चंद्रमा जातक को नाजुक शारीरिक बनावट, कमजोर पाचन शक्ति और वात या कफ संबंधी रोगों के प्रति संवेदनशील बनाता है। यदि चंद्रमा पापी ग्रहों से पीड़ित हो, तो यह मानसिक तनाव, अवसाद और नेत्र संबंधी विकार भी दे सकता है।
क्या छठे भाव का चंद्रमा माता के लिए अशुभ है?
हां, कुछ विशिष्ट परिस्थितियों में यह माता के लिए कष्टकारी हो सकता है। यदि क्षीण चंद्रमा पापी ग्रहों के साथ छठे भाव में हो और चतुर्थ भाव भी पीड़ित हो, तो यह माता के स्वास्थ्य को गंभीर नुकसान पहुंचा सकता है या उनके साथ संबंधों में दूरी ला सकता है।
केपी सिस्टम में छठे भाव के चंद्रमा का क्या महत्व है?
केपी सिस्टम के अनुसार, यदि चंद्रमा का उप-स्वामी छठे भाव के कस्प से जुड़ता है, तो यह जातक को बीमारियों के प्रति संवेदनशील बनाता है। केपी प्रणाली में सटीक भविष्यवाणियों के लिए चंद्रमा के नक्षत्र और उप-स्वामी की स्थिति का विश्लेषण किया जाता है।
क्या छठे भाव में चंद्रमा होने से शत्रुओं की अधिकता होती है?
हां, शास्त्रीय ग्रंथों के अनुसार छठे भाव में चंद्रमा होने से जातक के कई शत्रु होते हैं। हालांकि, यदि चंद्रमा मजबूत हो या उस पर गुरु जैसे शुभ ग्रहों की दृष्टि हो, तो जातक अपने शत्रुओं पर आसानी से विजय प्राप्त कर लेता है।
छठे भाव में चंद्रमा होने पर कौन सा रत्न पहनना चाहिए?
छठे भाव में चंद्रमा होने पर मोती (Moti) रत्न केवल तभी पहनना चाहिए जब चंद्रमा आपकी कुंडली के लिए एक कार्यात्मक शुभ ग्रह (Functional Benefic) हो, जैसे कि मेष, कर्क, वृश्चिक या मीन लग्न में। यदि चंद्रमा मारक या अशुभ भाव का स्वामी है, तो मोती पहनने से बचना चाहिए।

Remedial Measures

छठे भाव में चंद्रमा के अशुभ प्रभावों को कम करने और शुभ फलों को बढ़ाने के लिए निम्नलिखित उपाय किए जा सकते हैं:

Standard Remedies for Moon

  • आध्यात्मिक उपाय: प्रतिदिन या प्रत्येक सोमवार को भगवान शिव की पूजा करें और शिवलिंग पर जल या दूध अर्पित करें। Chandra Stotra या "ॐ सों सोमाय नमः" मंत्र का नियमित जाप करें।
  • व्यवहारिक उपाय: अपनी माता और माता समान महिलाओं का सदैव सम्मान करें और उनके चरण स्पर्श कर आशीर्वाद लें। अपने मानसिक स्वास्थ्य को ठीक रखने के लिए पानी का अपव्यय न करें।
  • दान कार्य: सोमवार के दिन सफेद वस्तुओं जैसे दूध, चावल, चीनी, सफेद वस्त्र या चांदी का दान किसी जरूरतमंद या मंदिर में करें।
  • रत्न चिकित्सा: चंद्रमा का मुख्य रत्न मोती (Moti) है। इसे केवल तभी धारण करें जब चंद्रमा आपकी कुंडली में शुभ भावों (जैसे लग्न, पंचम, नवम) का स्वामी हो। मेष, कर्क, वृश्चिक और मीन लग्न के जातकों के लिए यह शुभ हो सकता है, लेकिन वृषभ, मिथुन, कन्या, तुला, मकर और कुंभ लग्न के जातकों को बिना योग्य ज्योतिषी की सलाह के मोती धारण नहीं करना चाहिए, क्योंकि यह उनके कष्टों को बढ़ा सकता है।

संक्षेप में, छठे भाव में चंद्रमा की स्थिति जातक के जीवन में संवेदनशीलता, सेवा और संघर्ष का एक अनूठा मिश्रण प्रस्तुत करती है। इस स्थिति का सटीक विश्लेषण करने के लिए जातक को अपनी कुंडली में चंद्रमा की राशि, उसके नक्षत्र स्वामी, नवमांश स्थिति और छठे भाव के स्वामी की गरिमा का समग्र रूप से अध्ययन करना चाहिए। किसी योग्य ज्योतिषी के मार्गदर्शन में पूरी कुंडली का विश्लेषण ही सही दिशा और समाधान प्रदान कर सकता है।

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Sources consulted

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