Rahu in the 9th House

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54 min read · Drawn from 47 classical and modern works · Updated August 2026 · 1 view

वैदिक ज्योतिष में, राहु (Rahu), जिसे एक छाया ग्रह यानी Chhaya Graha (shadow planet) माना जाता है, जब कुंडली के नवम भाव यानी Navama Bhava (9th House) में स्थित होता है, तो यह जीवन में अत्यंत विशिष्ट और अपरंपरागत परिणाम उत्पन्न करता है। नवम भाव मुख्य रूप से भाग्य (fortune), पिता (father), और धर्म (dharma) का प्रतिनिधित्व करता है, जबकि राहु विदेशी तत्वों, भ्रम, और अचानक होने वाले परिवर्तनों का कारक यानी Karaka (significator) है। इन दोनों का संयोजन जातक के जीवन में धार्मिक दृष्टिकोण, पैतृक संबंधों और लंबी यात्राओं के संदर्भ में एक अनूठा प्रभाव उत्पन्न करता है। इस स्थिति का अंतिम परिणाम राहु की राशि स्थिति, उसके अधिपति (dispositor) की शक्ति, और उस पर पड़ने वाले शुभ या अशुभ ग्रहों के प्रभाव तथा दृष्टि यानी Drishti (aspect) पर निर्भर करता है। शास्त्रीय ग्रंथ परिणामों को अत्यंत स्पष्ट और कभी-कभी कठोर शब्दों में प्रस्तुत करते हैं, लेकिन यह ध्यान रखना आवश्यक है कि कोई भी एकल स्थिति स्वतंत्र रूप से पूर्ण परिणाम नहीं देती; इसके लिए संपूर्ण कुंडली में कई सहायक और पुष्टिकारक योगों की आवश्यकता होती है।

Classical Position

शास्त्रीय ज्योतिष और आधुनिक पद्धतियों में इस बात पर व्यापक सहमति है कि राहु और केतु (Ketu) जैसे छाया ग्रह स्वयं का कोई स्वतंत्र अस्तित्व नहीं रखते। The K.P. Reader III: Predictive Stellar Astrology और Predictive Stellar Astrology के अनुसार, जब राहु नवम भाव में स्थित होता है, तो उसके परिणाम मुख्य रूप से उस ग्रह द्वारा निर्धारित होते हैं जिसके साथ वह युति में होता है, या जो उसे देखता है, या फिर उस राशि के स्वामी द्वारा जिसके अंतर्गत वह स्थित होता है। इसके अतिरिक्त, कृष्णमूर्ति पद्धति (KP System) के सिद्धांतों के अनुसार, भविष्यवाणियां उस ग्रह के आधार पर की जानी चाहिए जिसका प्रतिनिधित्व राहु करता है।

पितृ पक्ष के संदर्भ में, शास्त्रीय ग्रंथों में एक महत्वपूर्ण सहमति मिलती है। Sarvartha Chintamani के अनुसार, यदि नवम भाव, नवमेश (9th lord), और सूर्य (Sun) नीच राशि में हों या उन पर शनि (Saturn), मांदी (Mandi), और राहु (Rahu) का अशुभ प्रभाव हो, तो जातक के पिता को गंभीर कष्ट या संकट का सामना करना पड़ता है। यह दर्शाता है कि राहु की नवम भाव में उपस्थिति, यदि अन्य अशुभ ग्रहों द्वारा पुष्ट हो, तो पिता के स्वास्थ्य और भाग्य के लिए प्रतिकूल सिद्ध हो सकती है।

Variant Readings

Wealth, Status and Life Events

  • योगकारक प्रभाव: Phaladeepika के अनुसार, यदि राहु और केतु प्रथम, पंचम या नवम भाव में स्थित हों, तो वे जातक को एक योगकारक यानी Yogakaraka ग्रह के समान शुभ फल प्रदान करते हैं। इसके अतिरिक्त, Uttara Kalamrita संकेत देता है कि जब राहु या केतु और किसी त्रिकोण यानी Trikona का स्वामी नवम या दशम भाव में स्थित होते हैं, तो यह जातक के जीवन में अत्यधिक समृद्धि और उन्नति का कारण बनता है।
  • अत्यधिक धन और समृद्धि: Doctrines of Suka Nadi के अनुसार, यदि नवम भाव में एकादशेश और बृहस्पति (Jupiter) स्थित हों तथा द्वितीयेश एकादश भाव में हो, तो जातक को अत्यधिक धन की प्राप्ति होती है। इसी ग्रंथ के अनुसार, यदि चतुर्थेश और नवमेश नवम भाव में हों और लग्नेश उच्च का हो, तो जातक प्रचुर संपत्ति अर्जित करता है।
  • बृहस्पति और राहु का विशिष्ट योग: Doctrines of Suka Nadi के अनुसार, यदि षष्ठेश किसी केंद्र यानी Kendra के स्वामी के साथ युति करे, जबकि बृहस्पति नवम भाव में हो और राहु बृहस्पति से केंद्र में स्थित हो, तो जातक अत्यंत धनी बनता है। इसके अतिरिक्त, यदि पंचमेश द्वितीय भाव में केंद्र के स्वामी के साथ हो, या बृहस्पति नवम भाव में राहु के साथ केंद्र में हो, अथवा सूर्य और चंद्रमा (Moon) नवम भाव में हों, तो जातक को जीवन में अपार समृद्धि प्राप्त होती है।
  • लक्ष्मी योग: शास्त्रीय सिद्धांतों के अनुसार, यदि नवमेश नवम भाव में पंचमेश के साथ स्थित हो और द्वितीयेश या एकादशेश द्वारा देखा जाता हो, तो कुंडली में अत्यंत शुभ 'लक्ष्मी योग' का निर्माण होता है।
  • दरिद्रता और हानि के योग: इसके विपरीत, Doctrines of Suka Nadi के अनुसार, यदि लग्न, नवम और एकादश भाव के स्वामी अष्टम भाव में चले जाएं, तो जातक को अत्यधिक निर्धनता का सामना करना पड़ता है। इसके अतिरिक्त, एक सामान्य शास्त्रीय स्रोत के अनुसार, नवम भाव में राहु की उपस्थिति जातक को बंधु-बांधवों से अलग कर सकती है, उसे भूख से पीड़ित कर सकती है, और उसे डरपोक तथा निर्धन बना सकती है।
  • करियर में बाधाएं: Sarvartha Chintamani के अनुसार, नवमेश की महादशा यानी Mahadasha और शनि, मंगल (Mars), राहु या सूर्य की अंतर्दशा यानी Antardasha के दौरान जातक को अपने करियर में भारी गिरावट, भाइयों से विरोध और विदेश यात्रा के दौरान कलह का सामना करना पड़ता है।

Father and Family Well-being

  • पिता के जीवन पर संकट: Jataka Parijata के अनुसार, यदि शनि, मंगल और राहु एकादश या नवम भाव में स्थित हों, तो यह पिता की मृत्यु का कारण बन सकते हैं। इसके अतिरिक्त, Doctrines of Suka Nadi के अनुसार, यदि अष्टमेश के रूप में शनि नवम भाव में स्थित होकर दशमेश को देखता हो, तो शनि की महादशा के दौरान जातक के पिता की मृत्यु हो सकती है।
  • षष्ठेश का प्रभाव: Doctrines of Suka Nadi के अनुसार, यदि षष्ठेश नवम भाव में प्रतिकूल रूप से स्थित हो, तो षष्ठेश की महादशा और मंगल की अंतर्दशा में पिता की मृत्यु संभावित होती है।
  • दशा और गोचर का प्रभाव: शास्त्रीय ग्रंथों के अनुसार, यदि राहु और शनि नवम भाव से द्वादश भाव के स्वामी होकर एक-दूसरे को देखते हों, तो राहु की दशा और शनि की अंतर्दशा पिता के लिए मारक सिद्ध हो सकती है। इसी प्रकार, यदि दशा और अंतर्दशा के स्वामी पिता के लग्न यानी Lagna से मारक स्थानों में स्थित हों, तो पिता की मृत्यु का संकेत मिलता है।
  • सूर्य और नवमेश की स्थिति: Learn Successful Predictive Techniques of Hindu Astrology के अनुसार, यदि नवमेश द्वादशांश यानी Dwadashamsha कुंडली में अष्टम भाव में हो और सूर्य राहु-केतु अक्ष पर पीड़ित हो, तो यह पिता की मृत्यु को दर्शाता है।
  • दीर्घायु पिता का योग: इसके विपरीत, Doctrines of Suka Nadi के अनुसार, यदि चंद्रमा और नवमेश नवम भाव में स्थित हों और लग्नेश उच्च का हो, तो जातक के पिता दीर्घायु होते हैं।

Education, Research and Foreign Travel

  • उच्च शिक्षा और अनुसंधान: Krishnamurti Padhdhati के अनुसार, चतुर्थ और एकादश भाव नियमित शिक्षा के लिए होते हैं, जबकि नवम और द्वादश भाव अनुसंधान, शोध प्रबंध या विदेशी यात्राओं के लिए जिम्मेदार होते हैं। Predictive Stellar Astrology के अनुसार, नवम भाव उच्च शिक्षा का प्रतिनिधित्व करता है, और नवम भाव के कारक ग्रह की दशा या अंतर्दशा के दौरान जातक अपनी उच्च शिक्षा को आगे बढ़ाता है।
  • विदेशी निवास और यात्रा: आधुनिक ज्योतिषीय पाठ्यपुस्तकों के अनुसार, यदि नवम भाव सक्रिय हो और उस पर राहु या द्वादशेश का प्रभाव हो, तो जातक का विदेश में निवास हो सकता है। Brihat Parashara Hora Shastra के सिद्धांतों के अनुसार, यदि द्वादशेश चतुर्थांश यानी D-4 कुंडली में नवम भाव में राहु के साथ स्थित हो, तो यह विदेशी निवास का प्रबल संकेत देता है।
  • शैक्षणिक सफलता के योग: The K.P. Reader III के अनुसार, यदि चतुर्थेश और नवमेश एकादश भाव के कार्येश के उप-स्वामी के नक्षत्र में हों, तो शिक्षा में पूर्ण सफलता प्राप्त होती है। इसके अतिरिक्त, यदि चतुर्थ और नवम भाव के कार्येश सक्रिय हों और नवमेश एकादश भाव का भी कार्येश हो, तो जातक को पी.एच.डी. में सफलता मिलती है।

Marriage and Progeny

  • पुनर्विवाह और बहु-विवाह: Kalamsa and Cuspal Interlinks के अनुसार, यदि लग्न का उप-उप-स्वामी और सप्तम का उप-उप-स्वामी नवम भाव के पुच्छ से जुड़े हों, और नवम का उप-उप-स्वामी सप्तम भाव के पुच्छ से जुड़ा हो, तो जातक के पुनर्विवाह की प्रबल संभावना होती है। इसके अतिरिक्त, Doctrines of Suka Nadi के अनुसार, यदि नवमेश नीच का होकर त्रिक भावों (6, 8, 12) में हो और शुक्र (Venus), मंगल तथा राहु अष्टम भाव में स्थित हों, तो जातक के कई विवाह होते हैं।
  • संतान की संख्या: Brihat Parashara Hora Shastra के अनुसार, विभिन्न ग्रह संतानों की विशिष्ट संख्या को दर्शाते हैं, जिसमें राहु को 4 संतानों का प्रतिनिधित्व प्राप्त है। Doctrines of Suka Nadi के अनुसार, यदि नवम भाव में चंद्रमा, बुध (Mercury), शनि और मंगल एक साथ स्थित हों, तो जातक की अनेक संतानें होती हैं।
  • संतान प्राप्ति के समय का निर्धारण: The Four-Step Theory के अनुसार, जब महादशा और अंतर्दशा के स्वामी पंचम भाव (प्राथमिक) और नवम या एकादश भाव (सहायक) के कार्येश होते हैं, तब जातक को संतान की प्राप्ति होती है।

Health and Physical Indications

  • देह कष्ट योग: चिकित्सा ज्योतिष के ग्रंथों के अनुसार, यदि लग्नेश नवम भाव में राहु के साथ स्थित हो, तो यह 'देह कष्ट योग' यानी Deha Kasta Yoga का निर्माण करता है, जिससे जातक को शारीरिक पीड़ा और स्वास्थ्य संबंधी समस्याओं का सामना करना पड़ता है।
  • दुर्घटना और कारावास के योग: The K.P. Reader III के अनुसार, यदि तृतीय (लघु यात्रा) या नवम (दीर्घ यात्रा) भाव का कार्येश षष्ठ और अष्टम भाव का भी कार्येश बन जाता है, तो जातक के साथ दुर्घटना होने की संभावना रहती है। इसके अतिरिक्त, यदि कोई पापी ग्रह द्वितीय या द्वादश भाव में स्थित हो और वह राहु के नक्षत्र या उप-भाग में हो, जो स्वयं द्वितीय या द्वादश भाव से जुड़ा हो, तो यह कारावास का संकेत देता है।
  • शारीरिक लक्षण: Jaimini Sutras के अनुसार, यदि राहु उपपद यानी Upapada से सप्तम के द्वितीय भाव में स्थित हो, तो जातक के दांत बड़े होते हैं, या दांत नहीं होते, या वह मूक हो सकता है।

Aspect and Directional Strength

वैदिक ज्योतिष में राहु की दृष्टि यानी Drishti को लेकर विभिन्न ग्रंथों में अलग-अलग मत हैं। Brihat Parashara Hora Shastra के अनुसार, राहु और केतु अपने स्थान से पंचम, सप्तम और नवम भाव को देखते हैं। वहीं दूसरी ओर, Doctrines of Suka Nadi के अनुसार, राहु और केतु की दृष्टि तृतीय, सप्तम और एकादश भाव पर होती है। नवम भाव में स्थित होने पर, राहु मुख्य रूप से तृतीय भाव पर अपनी पूर्ण दृष्टि डालता है, जो साहस, छोटे भाई-बहनों और संचार का भाव है। चूंकि राहु एक क्रूर यानी Krura (fierce) ग्रह है, इसलिए इसकी दृष्टि तृतीय भाव पर दबाव और तनाव उत्पन्न करती है, जिससे भाई-बहनों के साथ संबंधों में मतभेद या अचानक यात्राओं की स्थिति बन सकती है।

दिशा बल यानी Digbala (directional strength) के संदर्भ में, चूंकि राहु एक छाया ग्रह यानी Chhaya Graha है, इसलिए शास्त्रीय ग्रंथों में इसके लिए किसी निश्चित दिशा बल का उल्लेख नहीं मिलता है, जैसा कि अन्य सात प्रत्यक्ष ग्रहों के लिए होता है। इसलिए, नवम भाव में राहु की शक्ति का आकलन मुख्य रूप से उसके राशि स्वामी (dispositor) की स्थिति और उस पर पड़ने वाले अन्य ग्रहों के प्रभाव के आधार पर किया जाता है।

The Placement Across the Twelve Rashis

Aries (Mesha)

मेष राशि में राहु की कोई विशिष्ट गरिमा नहीं होती है, और इस राशि के स्वामी मंगल इसके अधिपति बनते हैं। यह स्थिति सिंह लग्न यानी Leo Lagna को दर्शाती है। चूंकि राहु स्वयं किसी राशि का स्वामी नहीं है, इसलिए वह इस लग्न से किसी भी भाव का स्वामित्व नहीं रखता, जिससे उसके परिणाम पूरी तरह से मंगल की स्थिति पर निर्भर करते हैं। Notable Horoscopes के अनुसार, मेष राशि में स्थित होने पर राहु मंगल, सूर्य और चंद्रमा के समान फल प्रदान करता है। Scientific Hindu Astrology के अनुसार, मेष राशि राहु को विशेष बल प्रदान करती है और इस राशि में राहु बेहतर परिणाम देने की प्रवृत्ति रखता है। इसके अतिरिक्त, Brihat Parashara Hora Shastra और Sarvartha Chintamani के अनुसार, यदि राहु मेष राशि में शुभ और पीड़ित न हो, तो यह जातक को सामान्य समृद्धि, ऐश्वर्य और वैभव प्रदान करता है। इस प्रकार, मेष राशि का राहु जातक को साहसी और भाग्यशाली बनाता है, बशर्ते उसका अधिपति मंगल कुंडली में अनुकूल स्थिति में हो।

Taurus (Vrishabha)

वृषभ राशि में राहु की कोई गरिमा निर्धारित नहीं है, और इसका अधिपति शुक्र बनता है। यह स्थिति कन्या लग्न यानी Virgo Lagna को दर्शाती है, जहां राहु किसी भी भाव का स्वामी नहीं होता। Rasi Characteristics के अनुसार, वृषभ राशि में राहु अत्यंत शुभ परिणाम देने वाला माना जाता है। The Encyclopedia of Vedic Astrological Dasha Systems के अनुसार, वृषभ राशि में राहु की उपस्थिति उसकी दशा के नकारात्मक प्रभावों को शांत करती है और उसकी दशा अवधि में जातक को धन, शिक्षा, पदोन्नति और उत्तम स्वास्थ्य प्रदान करती है। इस प्रकार, वृषभ राशि का राहु जातक को सांसारिक सुखों और भौतिक समृद्धि की ओर ले जाता है, क्योंकि इसका अधिपति शुक्र भौतिक सुखों का कारक है।

Gemini (Mithuna)

मिथुन राशि में राहु की कोई गरिमा नहीं होती, और इसका अधिपति बुध बनता है। यह स्थिति तुला लग्न यानी Libra Lagna को दर्शाती है। The K.P. Reader III: Predictive Stellar Astrology के अनुसार, मिथुन राशि में राहु पूरी तरह से बुध के प्रतिनिधि के रूप में कार्य करता है। Scientific Hindu Astrology के अनुसार, मिथुन राशि में राहु जातक के भीतर पारंपरिक और आधुनिक विचारों के बीच एक आंतरिक द्वंद्व उत्पन्न करता है। चूंकि बुध बुद्धि और संचार का स्वामी है, इसलिए यह स्थिति जातक को कुशाग्र बुद्धि और विदेशी भाषाओं या आधुनिक तकनीकों में निपुण बनाती है, जो नवम भाव के धार्मिक और दार्शनिक झुकाव को एक नया आयाम देती है।

Cancer (Karka)

कर्क राशि में राहु की कोई गरिमा नहीं होती, और इसका अधिपति चंद्रमा बनता है। यह स्थिति वृश्चिक लग्न यानी Scorpio Lagna को दर्शाती है। Notable Horoscopes के अनुसार, कर्क राशि में राहु चंद्रमा के समान संवेदनशील परिणाम उत्पन्न करता है। Jataka Parijata के अनुसार, कर्क राशि में राहु की दशा के दौरान जातक को प्रचुर धन, अनाज, शिक्षा, मनोरंजन और पारिवारिक सुख प्राप्त होता है। Brihat Parashara Hora Shastra भी इस बात की पुष्टि करता है कि कर्क राशि में राहु अत्यंत शुभ फल देता है। हालांकि, चिकित्सा ज्योतिष के दृष्टिकोण से, How to Judge a Horoscope के अनुसार, यदि कर्क राशि का राहु शनि से पीड़ित हो, तो यह जातक को स्वास्थ्य संबंधी गंभीर समस्याएं दे सकता है। यह स्थिति जातक के भाग्य को मानसिक उतार-चढ़ाव से जोड़ती है।

Leo (Simha)

सिंह राशि में राहु की कोई गरिमा नहीं होती, और इसका अधिपति सूर्य बनता है। यह स्थिति धनु लग्न यानी Sagittarius Lagna को दर्शाती है। Jataka Parijata के अनुसार, सिंह राशि में राहु की दशा जातक को राजा के समान दर्जा, सैन्य नेतृत्व, धन और पारिवारिक निष्ठा प्रदान करती है। Scientific Hindu Astrology के अनुसार, यद्यपि सिंह राशि सूर्य की राशि होने के कारण राहु के लिए जटिल मानी जाती है, फिर भी कई कुंडलियों में इसने अत्यंत शुभ और कल्याणकारी परिणाम दिए हैं। हालांकि, Marvel of Vedic Astrology के अनुसार, यदि सिंह राशि में राहु और शनि की युति हो, तो जातक या उसकी माता को हृदय रोग या अस्थि भंग जैसी समस्याओं का सामना करना पड़ सकता है। यह स्थिति जातक को नेतृत्व क्षमता और अचानक प्रसिद्धि प्रदान करती है।

Virgo (Kanya)

कन्या राशि में राहु की कोई गरिमा नहीं होती, और इसका अधिपति बुध बनता है। यह स्थिति मकर लग्न यानी Capricorn Lagna को दर्शाती है। Phaladeepika और The Encyclopedia of Vedic Astrological Dasha Systems के अनुसार, कन्या राशि में राहु अपनी दशा के दौरान जातक को सम्मान, सुख और भूमि व वाहन का सुख प्रदान करता है, लेकिन दशा के अंत में इन चीजों की हानि भी हो सकती है। Jataka Parijata के अनुसार, कन्या राशि का राहु जातक को पत्नी, संतान और संपत्ति का सुख देता है। यह स्थिति दर्शाती है कि जातक अपने भाग्य का निर्माण अपनी विश्लेषणात्मक क्षमता और व्यावहारिक दृष्टिकोण से करेगा, लेकिन दशा के अंतिम चरण में उसे सतर्क रहना चाहिए।

Libra (Tula)

तुला राशि में राहु की कोई गरिमा नहीं होती, और इसका अधिपति शुक्र बनता है। यह स्थिति कुंभ लग्न यानी Aquarius Lagna को दर्शाती है। Rasi Characteristics के अनुसार, तुला राशि में राहु अत्यंत अनुकूल और शुभ परिणाम देता है। हालांकि, Bhrigu Nandi Nadi के अनुसार, तुला राशि में राहु की उपस्थिति जातक के शैक्षणिक करियर में कुछ बाधाएं या रुकावटें उत्पन्न कर सकती है। चूंकि शुक्र इस राशि का स्वामी है, इसलिए यह राहु जातक को कलात्मक और कूटनीतिक क्षेत्रों में भाग्य का साथ दिलाता है, लेकिन शिक्षा के क्षेत्र में कुछ संघर्ष भी दे सकता है।

Scorpio (Vrischika)

वृश्चिक राशि में राहु की कोई गरिमा नहीं होती, और इसका अधिपति मंगल बनता है। यह स्थिति मीन लग्न यानी Pisces Lagna को दर्शाती है। Sarvartha Chintamani के अनुसार, वृश्चिक राशि में राहु भय और संकट की स्थितियां उत्पन्न कर सकता है। यदि चंद्रमा और राहु वृश्चिक राशि में एक साथ हों, तो Nadi Astrological Researches के अनुसार, जातक को अनिद्रा, भय, अवसाद, कमजोर पाचन तंत्र और अत्यधिक यात्राओं का सामना करना पड़ता है, हालांकि यह उसे कलात्मक स्वभाव भी प्रदान करता है। यह स्थिति दर्शाती है कि जातक का भाग्य और धर्म गहन मानसिक और आध्यात्मिक परिवर्तनों के माध्यम से विकसित होगा।

Sagittarius (Dhanu)

धनु राशि में राहु की कोई गरिमा नहीं होती, और इसका अधिपति बृहस्पति बनता है। यह स्थिति मेष लग्न यानी Aries Lagna को दर्शाती है। Scientific Hindu Astrology के अनुसार, धनु राशि में राहु का प्रभाव मीन राशि की तुलना में बेहतर होता है क्योंकि यह धनु राशि के दार्शनिक स्वभाव के साथ मेल खाता है। The Encyclopedia of Vedic Astrological Dasha Systems के अनुसार, यदि राहु धनु राशि में शुभ स्थिति में हो, तो यह जातक को पुत्र संतान और पद प्रतिष्ठा में वृद्धि देता है, लेकिन यदि यह पीड़ित हो, तो स्वास्थ्य हानि, खतरनाक आजीविका और विश्वासघात का सामना करना पड़ता है। Yogis, Destiny and the Wheel of Time के अनुसार, धनु राशि का राहु किसी पुरोहित, न्यायाधीश या ज्योतिषी के प्रति किए गए अपराध के कारण पैतृक दोष को भी दर्शा सकता है।

Capricorn (Makara)

मकर राशि में राहु की कोई गरिमा नहीं होती, और इसका अधिपति शनि बनता है। यह स्थिति वृषभ लग्न यानी Taurus Lagna को दर्शाती है। Scientific Hindu Astrology के अनुसार, मकर राशि में राहु की स्थिति जातक को शुभ फल देने में सक्षम बनाती है, और व्यावहारिक अनुभव में यह कुंभ राशि की तुलना में अधिक स्थिर परिणाम देती है। चूंकि शनि इस राशि का स्वामी है, इसलिए यह राहु जातक को अपने भाग्य के निर्माण के लिए कड़ी मेहनत, अनुशासन और संगठनात्मक क्षमता प्रदान करता है। इस राशि में शास्त्रीय तथ्य सीमित हैं, इसलिए इसका परिणाम मुख्य रूप से शनि की स्थिति पर निर्भर करता है।

Aquarius (Kumbha)

कुंभ राशि में राहु की कोई गरिमा नहीं होती, और इसका अधिपति शनि बनता है। यह स्थिति मिथुन लग्न यानी Gemini Lagna को दर्शाती है। कुंभ राशि के लिए शास्त्रीय ग्रंथों में राहु के विशिष्ट परिणाम अत्यंत सीमित हैं। चूंकि शनि इस राशि का स्वामी है और राहु के साथ उसका संबंध अनुकूल माना जाता है, इसलिए यह स्थिति जातक को वैज्ञानिक अनुसंधान, दार्शनिक सोच और समाज कल्याण के कार्यों में रुचि प्रदान करती है। इस राशि में राहु का प्रभाव पूरी तरह से शनि की स्थिति और नवम भाव पर पड़ने वाले अन्य शुभ ग्रहों के प्रभाव से निर्धारित होता है।

Pisces (Meena)

मीन राशि में राहु की कोई गरिमा नहीं होती, और इसका अधिपति बृहस्पति बनता है। यह स्थिति कर्क लग्न यानी Cancer Lagna को दर्शाती है। My Experiences in Astrology के अनुसार, मीन राशि में राहु पूरी तरह से बृहस्पति के प्रभाव के अधीन कार्य करता है, जिससे जातक को जीवन में कठिनाइयों, शासकों या चोरों से भय, कलह और सगे-संबंधियों के साथ गलतफहमी का सामना करना पड़ सकता है। हालांकि, The Encyclopedia of Vedic Astrological Dasha Systems के अनुसार, यदि राहु शुभ ग्रहों से देखा जाता हो, तो यह जातक को समाज में उच्च स्थान और संतान सुख देता है। Sarvartha Chintamani के अनुसार, मीन राशि का राहु जातक को अस्थायी सफलता प्रदान करता है जिसके बाद हानि की संभावना रहती है।

Conjunctions in This House

Sun

सूर्य और राहु की युति: नवम भाव में सूर्य और राहु की युति जातक के जीवन में एक ग्रहण जैसी स्थिति उत्पन्न करती है। चूंकि सूर्य पिता और आत्मा का कारक है, इसलिए राहु के साथ उसकी युति पिता के स्वास्थ्य और जातक के भाग्य में उतार-चढ़ाव लाती है। Sarvartha Chintamani के अनुसार, यदि नवम भाव, नवमेश और सूर्य पीड़ित हों, तो पिता को कष्ट होता है। यह जातक को पारंपरिक सत्ता और धर्म के प्रति विद्रोही बना सकता है।

Moon

चंद्रमा और राहु की युति: चंद्रमा मन का कारक है, और नवम भाव में राहु के साथ उसकी युति जातक को अत्यधिक कल्पनाशील लेकिन मानसिक रूप से अस्थिर बना सकती है। Notable Horoscopes के अनुसार, यदि चंद्रमा और राहु नवम भाव में हों और उन पर शनि की दृष्टि हो, तो यह गंभीर संकट या कानूनी बाधाओं का कारण बन सकता है। यह युति जातक को लीक से हटकर सोचने वाला और धार्मिक मामलों में अपरंपरागत बनाती है।

Mars

मंगल और राहु की युति: मंगल ऊर्जा और साहस का प्रतीक है। नवम भाव में मंगल और राहु की युति जातक को अपने सिद्धांतों के प्रति अत्यधिक आक्रामक बना सकती है। Jataka Parijata के अनुसार, यदि नवम भाव में शनि, मंगल और राहु की युति या प्रभाव हो, तो यह पिता के जीवन के लिए अत्यंत कष्टकारी सिद्ध होता है। यह युति जातक को अचानक और साहसिक यात्राओं की ओर प्रेरित करती है।

Mercury

बुध और राहु की युति: बुध बुद्धि और संचार का कारक है। नवम भाव में बुध और राहु की युति जातक को एक अत्यंत कुशाग्र, विश्लेषणात्मक और खोजी दिमाग प्रदान करती है। जातक विदेशी भाषाओं, आधुनिक तकनीकों और वैज्ञानिक अनुसंधान में असाधारण सफलता प्राप्त कर सकता है। हालांकि, यह युति कभी-कभी जातक को पारंपरिक मान्यताओं पर अत्यधिक सवाल उठाने के लिए प्रेरित करती है।

Jupiter

बृहस्पति और राहु की युति: बृहस्पति ज्ञान, धर्म और गुरु का कारक है। नवम भाव में बृहस्पति और राहु की युति से प्रसिद्ध गुरु चांडाल योग यानी Guru Chandala Yoga का निर्माण होता है। Yogis, Destiny and the Wheel of Time के अनुसार, यह योग जातक के भीतर आदर्शवाद को विकृत कर सकता है, जिससे वह अपने गुरुओं और शास्त्रों के प्रति कृतघ्नता या उनके अर्थों को तोड़ने-मरोड़ने की प्रवृत्ति रख सकता है।

Venus

शुक्र और राहु की युति: शुक्र प्रेम, कला और भौतिक सुखों का कारक है। नवम भाव में शुक्र और राहु की युति जातक को कलात्मक क्षेत्रों में अचानक प्रसिद्धि दिला सकती है। हालांकि, My Experiences in Astrology के अनुसार, यदि शुक्र नवम भाव में नीच का हो और राहु व बृहस्पति का प्रभाव हो, तो यह जातक के भाग्य और पिता के स्वास्थ्य के लिए प्रतिकूल परिस्थितियां उत्पन्न कर सकता है।

Saturn

शनि और राहु की युति: शनि और राहु दोनों ही पापी ग्रह हैं। नवम भाव में इनकी युति भाग्य में अत्यधिक देरी और संघर्ष को दर्शाती है। Doctrines of Suka Nadi के अनुसार, यदि शनि उच्च का होकर त्रिकोण में राहु के साथ स्थित हो, तो जातक अपने गुरुओं और बड़ों पर अकृतज्ञतापूर्वक आरोप लगाने की प्रवृत्ति रखता है। यह युति जातक को जीवन के उत्तरार्ध में गहरी आध्यात्मिक समझ देती है।

Ketu

केतु और राहु की युति: खगोलीय सिद्धांतों के अनुसार, राहु और केतु हमेशा एक-दूसरे से 180 डिग्री की दूरी पर स्थित होते हैं। इसलिए, नवम भाव में राहु और केतु की प्रत्यक्ष युति असंभव है। यदि कुंडली में ऐसी स्थिति दिखाई देती है, तो वह केवल गणितीय गणना की त्रुटि हो सकती है।

जब नवम भाव में तीन या अधिक ग्रह राहु के साथ युति करते हैं, तो यह जातक के जीवन को पूरी तरह से नवम भाव के विषयों जैसे धर्म, दर्शन और लंबी यात्राओं की ओर मोड़ देता है। शास्त्रीय ग्रंथों के अनुसार, ऐसा भारी संकेंद्रण जातक के भीतर संन्यास यानी Sanyasa (renunciation) की भावना जागृत कर सकता है, जिससे वह सांसारिक सुखों को छोड़कर किसी विशिष्ट आध्यात्मिक मार्ग का अनुसरण करने लगता है।

Aspects Received

Jupiter

बृहस्पति की दृष्टि: नवम भाव में स्थित राहु पर बृहस्पति की दृष्टि अत्यंत शुभ और सुरक्षात्मक मानी जाती है। बृहस्पति की दिव्य और सौम्य दृष्टि राहु के नकारात्मक और भ्रमित करने वाले प्रभावों को शांत करती है। यह जातक के अपरंपरागत विचारों को एक सकारात्मक और दार्शनिक दिशा प्रदान करती है, जिससे जातक धार्मिक पाखंड से बचकर वास्तविक आध्यात्मिक ज्ञान और अनुसंधान की ओर अग्रसर होता है। यह पिता के स्वास्थ्य और भाग्य की भी रक्षा करती है।

Saturn

शनि की दृष्टि: शनि की दृष्टि जब नवम भाव के राहु पर पड़ती है, तो यह जीवन में अत्यधिक संघर्ष, विलंब और बाधाओं को दर्शाती है। Notable Horoscopes के अनुसार, शनि और राहु के बीच का संबंध या दृष्टि संबंध अनुकूल नहीं माना जाता है। यह दृष्टि जातक के भाग्य के उदय में देरी करती है और उसे अपने लक्ष्यों को प्राप्त करने के लिए अत्यधिक परिश्रम करने पर मजबूर करती है। यह पिता के साथ संबंधों में भी एक दूरी या ठंडापन ला सकती है।

Mars

मंगल की दृष्टि: मंगल की उग्र दृष्टि जब नवम भाव के राहु पर पड़ती है, तो यह एक अत्यंत विस्फोटक ऊर्जा का निर्माण करती है। यह जातक के भीतर वैचारिक कट्टरता या अपने सिद्धांतों को जबरन दूसरों पर थोपने की प्रवृत्ति उत्पन्न कर सकती है। मंगल की यह दृष्टि जातक को धर्म और दर्शन के मामलों में विद्रोही बना सकती है, और लंबी यात्राओं के दौरान अचानक दुर्घटनाओं या विवादों का जोखिम बढ़ा सकती है।

Ketu

केतु की दृष्टि: चूंकि केतु हमेशा राहु से सप्तम भाव में (इस स्थिति में तृतीय भाव में) स्थित होता है, इसलिए उनका परस्पर दृष्टि संबंध बना रहता है। केतु की यह दृष्टि जातक के जीवन में आत्म-प्रयास (तृतीय भाव) और भाग्य (नवम भाव) के बीच एक निरंतर खिंचाव पैदा करती है। यह जातक को अपनी आंतरिक क्षमताओं को पहचानने और सांसारिक भ्रमों से मुक्त होकर आध्यात्मिक मोक्ष की ओर बढ़ने के लिए प्रेरित करती है।

Strength and Condition

Baladi Avastha

  • विषम राशियों (Odd Signs) में अनुक्रम: मेष, मिथुन, सिंह, तुला, धनु और कुंभ राशि में बाल आदि अवस्था का क्रम इस प्रकार होता है:
    • 0-6 डिग्री: बाल (Bala) अवस्था - परिणाम देने में कमजोर।
    • 6-12 डिग्री: कुमार (Kumara) अवस्था - मध्यम परिणाम।
    • 12-18 डिग्री: युवा (Yuva) अवस्था - पूर्ण और शक्तिशाली परिणाम।
    • 18-24 डिग्री: वृद्ध (Vriddha) अवस्था - न्यूनतम परिणाम।
    • 24-30 डिग्री: मृत (Mrita) अवस्था - परिणाम देने में असमर्थ।
  • सम राशियों (Even Signs) में अनुक्रम: वृषभ, कर्क, कन्या, वृश्चिक, मकर और मीन राशि में यह क्रम पूरी तरह से उलट जाता है, जहां 0-6 डिग्री मृत (Mrita) अवस्था होती है और 24-30 डिग्री बाल (Bala) अवस्था होती है।

राहु की डिग्री के अनुसार उसकी अवस्था यह निर्धारित करती है कि वह नवम भाव के फलों को कितनी तीव्रता से प्रकट करेगा। एक युवा राहु अपने सभी सकारात्मक या नकारात्मक परिणामों को पूरी शक्ति से जातक के जीवन में लाता है।

Ashtakavarga

अष्टकवर्ग यानी Ashtakavarga प्रणाली में नवम भाव को प्राप्त होने वाले बिंदुओं (bindus) की संख्या अत्यंत महत्वपूर्ण है। यदि नवम भाव में उच्च बिंदु (28 से अधिक) प्राप्त होते हैं, तो यह राहु की प्रतिकूलता को कम करता है और भाग्य के मार्ग को सुगम बनाता है। इसके विपरीत, यदि इस भाव में अत्यंत कम बिंदु (20 से कम) हों, तो राहु का अशुभ प्रभाव बढ़ जाता है, जिससे जातक को जीवन भर भाग्य का सहयोग प्राप्त करने के लिए कड़ा संघर्ष करना पड़ता है।

Nakshatra

नवम भाव में राहु जिस नक्षत्र में स्थित होता है, उसका स्वामी ग्रह राहु के परिणामों को गहराई से प्रभावित करता है। यदि नक्षत्र का स्वामी कुंडली में शुभ भावों का स्वामी होकर मजबूत स्थिति में हो, तो राहु अनुकूल परिणाम देता है। उदाहरण के लिए, यदि राहु किसी मित्र ग्रह के नक्षत्र में हो, तो वह जातक को विदेश यात्रा और उच्च शिक्षा में सफलता दिलाता है, जबकि शत्रु ग्रह के नक्षत्र में होने पर यह मानसिक अशांति और भाग्य में अवरोध उत्पन्न करता है।

Navamsha

नवमांश यानी Navamsha (D9) कुंडली जन्म कुंडली के वादों की पुष्टि या उन्हें रद्द करने का काम करती है। Sarvartha Chintamani के अनुसार, यदि नवम भाव, नवमेश और सूर्य नवमांश कुंडली में नीच राशि में हों और उन पर शनि, मांदी या राहु का प्रभाव हो, तो जातक के पिता को गंभीर कष्ट उठाना पड़ता है। इसके अतिरिक्त, Jaimini Sutras के अनुसार, आत्मकारकांश यानी Atmakarakamsa में शनि और राहु को छोड़कर अन्य पापी ग्रहों की युति माता के चरित्र और जातक के जन्म के संदर्भ में विशिष्ट शास्त्रीय संकेत देती है।

Condition of the House Lord

नवम भाव के स्वामी (9th Lord) की स्थिति इस पूरे विश्लेषण की आधारशिला है। यदि नवमेश मजबूत, उच्च का या शुभ ग्रहों से युक्त हो, तो वह राहु के पापी प्रभावों को नियंत्रित कर लेता है और जातक को भाग्यशाली बनाता है। इसके विपरीत, यदि नवमेश स्वयं निर्बल, नीच का या त्रिक भावों (6, 8, 12) में पीड़ित हो, तो नवम भाव में बैठा राहु पूरी तरह से अनियंत्रित हो जाता है, जिससे जातक का भाग्य अत्यंत अस्थिर हो जाता है और उसे जीवन में पग-पग पर बाधाओं का सामना करना पड़ता है।

In the KP System

कृष्णमूर्ति पद्धति (KP System) में राहु को एक अत्यंत शक्तिशाली कार्येश (significator) माना जाता है। The K.P. Reader III: Predictive Stellar Astrology के अनुसार, कार्येशों के निर्धारण में राहु और केतु जैसे नोड्स (nodes) सामान्य ग्रहों की तुलना में अधिक बलवान होते हैं। जब राहु नवम भाव के पुच्छ (cusp) का उप-स्वामी यानी Sub-lord बनता है, तो वह जातक के जीवन की महत्वपूर्ण घटनाओं को तय करने में निर्णायक भूमिका निभाता है।

के.पी. सिद्धांतों के अनुसार, राहु का परिणाम केवल उसकी अपनी स्थिति से नहीं, बल्कि उसके नक्षत्र स्वामी (star lord) और उप-स्वामी द्वारा दर्शाए गए भावों से तय होता है। Predictive Stellar Astrology के अनुसार, यदि राहु नवम भाव का उप-स्वामी हो, तो जातक के जीवन के परिणाम उस ग्रह के अनुसार निर्धारित होते हैं जिसका प्रतिनिधित्व राहु कर रहा होता है। राहु उन ग्रहों के फल देता है जिनके साथ वह युति में हो, जिससे वह देखा जा रहा हो, या जिसकी राशि में वह स्थित हो।

Key to Learn K.P. Cuspal System के अनुसार, यदि कोई ग्रह चंद्रमा के नक्षत्र में हो और चंद्रमा का प्रतिनिधित्व राहु या केतु द्वारा किया जा रहा हो, तो वह ग्रह उन पुच्छीय स्थितियों (cuspal positions) को प्रभावित नहीं करता जहां राहु या केतु प्रकट होते हैं। यह सूक्ष्म नियम के.पी. ज्योतिष में घटनाओं के सटीक समय निर्धारण के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण है।

Practical Significations

धार्मिक दृष्टिकोण और जीवन दर्शन

  • अपरंपरागत धार्मिक विचार: नवम भाव धर्म का भाव है। यहाँ राहु की उपस्थिति जातक को पारंपरिक धार्मिक रीति-रिवाजों के प्रति उदासीन या विद्रोही बना सकती है। जातक लीक से हटकर आध्यात्मिक सत्यों की खोज करता है।
  • धार्मिक कट्टरता का जोखिम: Scientific Hindu Astrology के अनुसार, यदि राहु कर्क राशि में नवम भाव में स्थित हो और उस पर चंद्रमा तथा मंगल की दृष्टि हो, तो यह जातक के भीतर धार्मिक रूढ़िवादिता के विरोध में एक प्रकार की वैचारिक कट्टरता या उग्र दृष्टिकोण उत्पन्न कर सकता है।

विदेशी यात्राएं और अनुसंधान

  • विदेशी भूमि से लाभ: राहु विदेशी तत्वों का कारक है। नवम भाव में इसकी उपस्थिति जातक को विदेशी संस्कृतियों, विदेशी व्यापार और लंबी दूरी की यात्राओं के माध्यम से भाग्य का उदय करने के अवसर प्रदान करती है।
  • उच्च शिक्षा और शोध: Predictive Stellar Astrology के अनुसार, नवम भाव उच्च अध्ययन का प्रतिनिधित्व करता है। राहु की दशा या अंतर्दशा के दौरान जातक अनुसंधान, थीसिस लेखन या उच्च शिक्षा के लिए विदेश यात्रा कर सकता है।

पारिवारिक संबंध और सामाजिक स्थिति

  • पिता के साथ वैचारिक मतभेद: नवम भाव पिता का भी प्रतिनिधित्व करता है। राहु की यहाँ उपस्थिति पिता के साथ वैचारिक दूरी या उनके स्वास्थ्य में उतार-चढ़ाव को दर्शाती है।
  • सामाजिक छवि: जातक को समाज में एक स्वतंत्र विचारक और साहसी व्यक्ति के रूप में देखा जाता है, जो सामाजिक बंधनों की परवाह किए बिना अपने मार्ग का निर्माण स्वयं करता है।

Frequently Asked Questions

क्या नवम भाव में राहु हमेशा बुरा फल देता है?
नहीं, नवम भाव में राहु हमेशा बुरा फल नहीं देता। इसका परिणाम पूरी तरह से इस बात पर निर्भर करता है कि राहु किस राशि में है, उसका अधिपति (dispositor) कितना मजबूत है, और उस पर किन ग्रहों की दृष्टि है। यदि राहु शुभ ग्रहों जैसे बृहस्पति द्वारा देखा जा रहा हो, तो यह जातक को उच्च शिक्षा, अनुसंधान और विदेशी यात्राओं के माध्यम से अपार सफलता और समृद्धि प्रदान करता है।
क्या नवम भाव में राहु पिता के लिए हानिकारक है?
हाँ, शास्त्रीय ग्रंथों के अनुसार नवम भाव में राहु पिता के लिए कष्टकारी हो सकता है। Sarvartha Chintamani के अनुसार, यदि नवम भाव, उसका स्वामी और सूर्य कमजोर या नीच राशि में हों और उन पर राहु, शनि या मांदी का प्रभाव हो, तो पिता को गंभीर स्वास्थ्य समस्याओं या संकट का सामना करना पड़ता है। हालांकि, यदि नवमेश मजबूत हो, तो यह प्रभाव कम हो जाता है।
क्या नवम भाव में राहु विदेश यात्रा कराता है?
हाँ, राहु विदेशी तत्वों का कारक है और नवम भाव लंबी यात्राओं का है। जब राहु नवम भाव में स्थित होता है, तो यह विदेशी यात्राओं और विदेशी भूमि पर निवास के प्रबल योग बनाता है। विशेष रूप से राहु या द्वादशेश की दशा के दौरान जातक शिक्षा, अनुसंधान या करियर के सिलसिले में विदेश यात्रा करता है और वहां सफलता प्राप्त करता है।
नवम भाव में राहु होने पर कौन सी राशि सबसे अच्छी होती है?
शास्त्रीय ग्रंथों के अनुसार, वृषभ, कर्क और मेष राशि में राहु के परिणाम अत्यंत शुभ माने गए हैं। वृषभ और कर्क राशि में राहु की दशा जातक को प्रचुर धन, उत्तम स्वास्थ्य, पदोन्नति और पारिवारिक सुख प्रदान करती है। इसके विपरीत, वृश्चिक और मीन राशि में राहु को कुछ संघर्ष और मानसिक तनाव उत्पन्न करने वाला माना गया है।
क्या नवम भाव में राहु शिक्षा में बाधा डालता है?
यह परिस्थिति पर निर्भर करता है। Bhrigu Nandi Nadi के अनुसार, यदि राहु तुला राशि में स्थित हो, तो यह शैक्षणिक करियर में कुछ बाधाएं उत्पन्न कर सकता है। हालांकि, यदि राहु के.पी. पद्धति के अनुसार चतुर्थ, नवम और एकादश भाव के स्वामियों से अनुकूल रूप से जुड़ा हो, तो यह जातक को अनुसंधान और उच्च शिक्षा (जैसे पी.एच.डी.) में असाधारण सफलता दिलाता है।
नवम भाव में राहु का धर्म पर क्या प्रभाव पड़ता है?
नवम भाव में राहु जातक को धर्म के प्रति एक अपरंपरागत और खोजी दृष्टिकोण देता है। जातक पारंपरिक रूढ़ियों को नहीं मानता और सत्य की खोज में विभिन्न दर्शनों का अध्ययन करता है। हालांकि, यदि राहु पर मंगल और चंद्रमा का अशुभ प्रभाव हो, तो यह जातक के भीतर धार्मिक मामलों में वैचारिक कट्टरता या उग्रता भी उत्पन्न कर सकता है।
क्या नवम भाव में राहु धन और समृद्धि देता है?
हाँ, राहु नवम भाव में विशिष्ट योगों के अंतर्गत अत्यधिक धन दे सकता है। Phaladeepika के अनुसार, त्रिकोण भाव में राहु योगकारक के समान फल देता है। यदि नवम भाव का स्वामी मजबूत हो या राहु के साथ शुभ ग्रहों की युति हो, तो जातक को अपनी दशा के दौरान अचानक धन लाभ, वाहन सुख और समाज में उच्च सम्मान प्राप्त होता है।

Remedial Measures

शास्त्रीय ग्रंथों में नवम भाव के राहु के अशुभ प्रभावों को शांत करने और उसके शुभ फलों को सक्रिय करने के लिए विशिष्ट उपाय बताए गए हैं। Jatak Alankaar के अनुसार, यदि राहु या अन्य पापी ग्रहों के कारण संतान प्राप्ति में बाधा आ रही हो, तो जातक को अपने वंश-इष्ट या कुलदेवता की पूजा (Vamsha-Ishta/Kuladevata Puja) करनी चाहिए। इसके अतिरिक्त, यदि नवमेश या बृहस्पति के कारण कोई रुकावट हो, तो अनुष्ठान (Anushthana) करना अत्यंत कल्याणकारी माना गया है। Bhrigu Nandi Nadi के अनुसार, यदि सूर्य और राहु की युति से पितृ दोष या भाग्य में बाधा उत्पन्न हो रही हो, तो उसकी शांति के लिए विशेष पूजा और दान करना आवश्यक है।

Standard Remedies for Rahu

  • आध्यात्मिक उपाय (Spiritual Remedies):
    • भगवान शिव की आराधना करें और नियमित रूप से शिव अभिषेक (Shiva Abhisheka) करें।
    • राहु के बीज मंत्र "ॐ भ्रां भ्रीं भ्रौं सः राहवे नमः" का नियमित रूप से 108 बार जाप करें।
    • देवी दुर्गा या चंडी की पूजा करें और दुर्गा चालीसा का पाठ करें।
  • व्यवहारिक उपाय (Behavioural Remedies):
    • अपने दादा-दादी, ससुर और परिवार के बुजुर्गों का सम्मान करें और उनकी सेवा करें।
    • कुष्ठ रोगियों, अनाथों और समाज के वंचित वर्ग के लोगों के प्रति दयाभाव रखें और उनकी सहायता करें।
  • दान कार्य (Charitable Remedies):
    • शनिवार के दिन काले तिल, उड़द की दाल, कंबल या नीले वस्त्रों का दान करें।
    • पक्षियों को बाजरा खिलाएं और बहते पानी में नारियल प्रवाहित करें।
  • रत्न चिकित्सा (Gemological Remedies):
    • राहु का मुख्य रत्न गोमेद (Hessonite) है।
    • चेतावनी: गोमेद रत्न केवल तभी धारण करना चाहिए जब राहु जातक की कुंडली में एक कार्यात्मक शुभ ग्रह (functional benefic) हो, जैसे वृषभ, मिथुन, कन्या, तुला, मकर या कुंभ लग्न के जातकों के लिए। इसे मेष, कर्क, सिंह, वृश्चिक, धनु या मीन लग्न के जातकों को धारण नहीं करना चाहिए, क्योंकि एक अशुभ ग्रह के रत्न को धारण करने से उसके नकारात्मक प्रभाव और अधिक बढ़ जाते हैं।

अपनी कुंडली में नवम भाव के राहु का सटीक प्रभाव जानने के लिए, जातक को सबसे पहले राहु की डिग्री, उसके नक्षत्र स्वामी और नवमेश की स्थिति का सूक्ष्मता से विश्लेषण करना चाहिए। इसके साथ ही, नवमांश कुंडली में राहु की स्थिति और अष्टकवर्ग में नवम भाव को मिलने वाले बिंदुओं का आकलन करके ही किसी अंतिम निष्कर्ष पर पहुंचना चाहिए। एक योग्य ज्योतिषी के मार्गदर्शन में किया गया संपूर्ण चार्ट विश्लेषण ही जीवन में सही दिशा और सटीक उपायों का निर्धारण कर सकता है।

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Sources consulted

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