Sun in the 2nd House

51 min read · Drawn from 55 classical and modern works · Updated August 2026

वैदिक ज्योतिष में, सूर्य जिसे संस्कृत में Surya कहा जाता है, आत्मा, पिता, अधिकार, तेज और जीवन शक्ति का नैसर्गिक कारक (Karaka) है। जब यह कुंडली के द्वितीय भाव में स्थित होता है, जिसे संस्कृत में Dwitiya Bhava या Dhana Bhava कहा जाता है, तो यह सीधे तौर पर जातक के धन, वाणी, प्रारंभिक शिक्षा, मुख और परिवार (Kutumba) को प्रभावित करता है। यह संयोजन जातक के जीवन में वित्तीय महत्वाकांक्षाओं, पैतृक संपत्ति के मामलों और एक अत्यंत प्रभावशाली या कभी-कभी तीखी वाणी का निर्माण करता है। इस भाव में सूर्य की उपस्थिति से मिलने वाले परिणाम पूरी तरह से उसकी राशि गरिमा (Dignity), युति और उस पर पड़ने वाली दृष्टियों (Drishti) पर निर्भर करते हैं। शास्त्रीय ज्योतिष ग्रंथ अक्सर इस स्थिति के परिणामों को अत्यंत निरपेक्ष या कठोर शब्दों में प्रस्तुत करते हैं; हालांकि, पाठकों को यह ध्यान रखना चाहिए कि किसी भी एकल ग्रह स्थिति को अलगाव में नहीं पढ़ा जाना चाहिए, और ऐसे गंभीर परिणाम तभी घटित होते हैं जब संपूर्ण कुंडली में कई अन्य पीड़ित करने वाले कारक मौजूद हों।

Classical Position

वैदिक ज्योतिष के स्वीकृत और प्रामाणिक ग्रंथों में द्वितीय भाव में सूर्य की स्थिति को लेकर व्यापक सहमति पाई जाती है। शास्त्रीय परंपरा के अनुसार, यदि द्वितीय भाव में स्थित सूर्य पर किसी शुभ ग्रह का प्रभाव न हो, तो जातक को अपने जीवन में धन और परिवार की हानि का सामना करना पड़ता है। Sarvartha Chintamani के अनुसार, ऐसे सूर्य की महादशा (Mahadasha) या अंतर्दशा (Bhukti) के दौरान जातक को संतान की प्राप्ति तो होती है लेकिन साथ ही संतान को कष्ट, मानसिक दुख और अपने मित्रों व रिश्तेदारों से अलगाव का सामना करना पड़ता है। हालांकि, यदि इस सूर्य पर किसी शुभ ग्रह का प्रभाव या दृष्टि हो, तो ये सभी प्रतिकूल परिणाम पूरी तरह से समाप्त हो जाते हैं।

इसके अतिरिक्त, सरकारी दंड या राजकोषीय हानि के संदर्भ में भी ग्रंथों में एक अत्यंत महत्वपूर्ण और स्वीकृत योग का वर्णन मिलता है। Sarvartha Chintamani के अनुसार, यदि कुंडली में प्रथम भाव का स्वामी (Lagna Lord) द्वादश भाव (Dvadasha Bhava) में किसी पापी ग्रह के साथ कमजोर होकर बैठा हो, और द्वितीय भाव का स्वामी (Dhana Lord) सूर्य के साथ स्थित हो या पापी ग्रहों की दृष्टि में होकर नीच का हो, तो जातक को सरकारी कार्रवाई, करों या दंड के माध्यम से अपने धन की भारी हानि उठानी पड़ती है।

नेत्र रोगों के संदर्भ में भी शास्त्रीय ग्रंथों में पूर्ण सहमति है। Phaladeepika के अनुसार, यदि सूर्य या चंद्रमा द्वितीय या द्वादश भाव में स्थित हों और उन पर मंगल (Mangala) या शनि (Shani) की दृष्टि या युति हो, तो जातक को गंभीर नेत्र रोगों का सामना करना पड़ता है। द्वितीय भाव दाहिनी आंख का प्रतिनिधित्व करता है, इसलिए इस भाव में सूर्य का पापी ग्रहों से पीड़ित होना दृष्टि को कमजोर करता है।

Variant Readings

Physical Appearance and Health

  • चेहरे और मुख के रोग: Saravali के अनुसार, द्वितीय भाव में सूर्य की उपस्थिति जातक को मुख या चेहरे के रोगों से पीड़ित कर सकती है। इसके कारण जातक के चेहरे पर तेज तो होता है, लेकिन वह त्वचा या दांतों की समस्याओं से संवेदनशील हो सकता है।
  • दाहिनी आंख की समस्या: नाड़ी और केपी (KP) ज्योतिष के ग्रंथों, विशेष रूप से Kalamsa and Cuspal Interlinks के अनुसार, यदि द्वितीय भाव के पुच्छ (Cusp) का उप-स्वामी (Sub-lord) सूर्य या शुक्र (Shukra) हो और वह छठे (Shashta), आठवें (Ashtama) या बारहवें (Dvadasha) भाव का कार्येश (Significator) बन रहा हो, तो जातक को दाहिनी आंख में गंभीर समस्या या दृष्टि दोष होता है।
  • जन्मजात अंधता का योग: Predictive Stellar Astrology के अनुसार, यदि लग्न का स्वामी सूर्य और शुक्र के साथ युति करके छठे, आठवें या बारहवें भाव में स्थित हो, तो जातक जन्म से ही दृष्टिहीन हो सकता है।
  • रतौंधी का योग: ज्योतिष के एक अन्य महत्वपूर्ण ग्रंथ How to Judge a Horoscope के अनुसार, यदि सूर्य और चंद्रमा दोनों एक साथ द्वितीय भाव में स्थित हों, तो जातक को रतौंधी (रात में दिखाई न देना) की समस्या हो सकती है।
  • चेहरे की कुरूपता: यदि द्वितीय भाव में पापी ग्रह स्थित हों और द्वितीयेश भी पापी ग्रहों के साथ हो या नीच का होकर पापी ग्रहों से दृष्ट हो, तो जातक का चेहरा अनाकर्षक या दोषयुक्त हो सकता है।

Temperament and Mental State

  • क्रोध और कटु वाणी: Sarvartha Chintamani के अनुसार, द्वितीय भाव में सूर्य होने से जातक की वाणी में उग्रता और क्रोध की अधिकता देखी जा सकती है। जातक का स्वभाव झगड़ालू हो सकता है और वह अपनी तीखी वाणी के कारण अपने प्रियजनों को आहत कर सकता है।
  • हास्यप्रिय स्वभाव: यदि द्वितीय भाव में स्थित सूर्य जिस नवंश (Navamsha) में है, उसका स्वामी द्वितीय भाव में ही मजबूत होकर वैशेषिक (Vaisheshik) या विंशिका (Vimshika) वर्ग में स्थित हो, तो जातक अत्यंत विनोदी, मजाकिया और हास्यप्रिय स्वभाव का होता है।
  • तर्कशास्त्र में निपुणता: Jataka Parijata के अनुसार, यदि सूर्य या मंगल द्वितीय भाव के स्वामी हों और उन पर बृहस्पति (Guru) तथा शुक्र की दृष्टि हो, या वे पारावतांश (Paravathamsa) में हों, तो जातक महान तार्किक और शास्त्रार्थ करने वाला बनता है।

Wealth, Status and Life Events

  • राजकीय कोप से धन हानि: Saravali के अनुसार, द्वितीय भाव में सूर्य होने से जातक को चोरों या सरकारी अधिकारियों के क्रोध के कारण धन की हानि उठानी पड़ सकती है। हालांकि, ऐसा जातक नौकरों और चौपायों (वाहनों या पशुओं) से युक्त होता है।
  • परोपकार के लिए धन का उपयोग: Phaladeepika के अनुसार, यदि द्वितीय भाव का स्वामी सूर्य से संबंधित या युत हो, तो जातक अत्यंत धनवान होता है और वह अपने धन का उपयोग पूरी मानवता के कल्याण और परोपकार के कार्यों के लिए करता है।
  • सरकारी दंड से संपत्ति की जब्ती: यदि द्वितीयेश अष्टम भाव में नीच का होकर पापी ग्रहों और सूर्य के साथ स्थित हो, तो जातक को सरकारी सजा के रूप में अपनी संपत्ति से हाथ धोना पड़ता है।
  • बैंकिंग और लेखांकन में सफलता: केपी पद्धति के अनुसार, यदि सूर्य द्वितीय भाव का मजबूत कार्येश बनता है, तो जातक अत्यंत परिश्रमी होता है और वह बैंकिंग, ऑडिटिंग, अकाउंटिंग या वित्तीय संस्थानों में उच्च पद प्राप्त करता है।
  • पिता के करियर का हस्तांतरण: नाड़ी ग्रंथ Bhrigu Nandi Nadi के अनुसार, यदि सूर्य से द्वितीय भाव में शनि स्थित हो, तो जातक अपने पिता के पद या व्यवसाय को संभालता है और उसी क्षेत्र में कार्य करता है।

Aspect and Directional Strength

द्वितीय भाव में स्थित होकर, सूर्य अपनी पूर्ण सातवीं दृष्टि (Drishti) अष्टम भाव (Ashtama Bhava) पर डालता है। चूंकि सूर्य एक क्रूर ग्रह (Krura Graha) है, इसलिए अष्टम भाव पर इसकी दृष्टि मिश्रित परिणाम देती है। अष्टम भाव गुप्त विद्याओं, अचानक होने वाली घटनाओं, दीर्घकालिक रोगों और मृत्यु का भाव है। सूर्य की यह दृष्टि जातक को रहस्यमयी विषयों, ज्योतिष और अनुसंधान के प्रति गहरी रुचि प्रदान करती है। हालांकि, एक उग्र ग्रह होने के कारण, यह अष्टम भाव पर दबाव भी बनाता है, जिससे जातक को अचानक स्वास्थ्य संबंधी उतार-चढ़ाव या पैतृक संपत्ति को लेकर विवादों का सामना करना पड़ सकता है।

दिशा बल (Digbala) के सिद्धांतों के अनुसार, सूर्य दशम भाव (Dashama Bhava) में सबसे मजबूत होता है, जहां उसे पूर्ण दिशा बल प्राप्त होता है। द्वितीय भाव में सूर्य को कोई दिशा बल प्राप्त नहीं होता है। दशम भाव का सूर्य जातक को समाज में सर्वोच्च प्रशासनिक शक्ति, प्रसिद्धि और करियर में बड़ी सफलता देता है। इसके विपरीत, द्वितीय भाव में सूर्य का प्रभाव जातक की ऊर्जा को बाहरी दुनिया के बजाय उसके व्यक्तिगत संसाधनों, पारिवारिक संचित धन और वाणी की ओर केंद्रित कर देता है। यहां सूर्य को अपनी स्थिति को मजबूत करने और सकारात्मक परिणाम देने के लिए अपनी राशि गरिमा और शुभ ग्रहों के सहयोग पर अधिक निर्भर रहना पड़ता है।

The Placement Across the Twelve Rashis

Aries (Mesha)

मेष राशि में सूर्य अपनी उच्च (Exalted) अवस्था में होता है, और इस राशि का स्वामी मंगल है। जब सूर्य मेष राशि में द्वितीय भाव में स्थित होता है, तो यह जातक के लिए मीन लग्न (Meena Lagna) का निर्माण करता है, जहां सूर्य छठे भाव (Shashta Bhava) का स्वामी बनता है। छठे भाव का स्वामी होकर द्वितीय भाव में उच्च का होना यह दर्शाता है कि जातक अपने शत्रुओं पर विजय प्राप्त करके और कानूनी या चिकित्सीय क्षेत्रों के माध्यम से प्रचुर धन अर्जित करेगा। Saravali के अनुसार, मेष राशि का सूर्य जातक को कलाओं में प्रसिद्ध, युद्धप्रिय, अपने कर्तव्य के प्रति समर्पित और मजबूत हड्डियों वाला बनाता है। यदि इस सूर्य पर चंद्रमा की दृष्टि हो, तो जातक अत्यंत उदार और विपरीत लिंग के बीच लोकप्रिय होता है। यदि मंगल की दृष्टि हो, तो वह युद्ध में साहसी और शारीरिक रूप से अत्यंत शक्तिशाली होता है। बृहस्पति की दृष्टि होने पर जातक न्यायाधीश या सरकारी मंत्री बनता है। इस स्थिति में जातक की वाणी अत्यंत प्रभावशाली और आदेशात्मक होती है।

Taurus (Vrishabha)

वृषभ राशि में सूर्य शत्रु (Inimical) राशि में होता है, जिसका स्वामी शुक्र है। यह स्थिति मेष लग्न (Mesha Lagna) का निर्माण करती है, जहां सूर्य पंचम भाव (Pancha Bhava) का स्वामी बनता है। पंचमेश का द्वितीय भाव में शत्रु राशि में होना यह दर्शाता है कि जातक की बुद्धि और संतान का संबंध उसके धन से होगा, लेकिन पारिवारिक मामलों में वैचारिक मतभेद रह सकते हैं। Saravali के अनुसार, वृषभ राशि में सूर्य जातक को कलात्मक योग्यता और अच्छा सामाजिक स्तर देता है, लेकिन जातक स्वभाव से जिद्दी और अत्यधिक भौतिकवादी हो सकता है। यदि इस सूर्य पर मंगल का प्रतिकूल प्रभाव हो, तो जातक को नेत्र संबंधी विकारों का सामना करना पड़ सकता है। पिता के वित्तीय मामलों के लिए यह स्थिति मध्यम रूप से शुभ होती है, बशर्ते शुक्र की स्थिति कुंडली में मजबूत हो।

Gemini (Mithuna)

मिथुन राशि में सूर्य सम (Neutral) अवस्था में होता है, जिसका स्वामी बुध है। यह स्थिति वृषभ लग्न (Vrishabha Lagna) का निर्माण करती है, जहां सूर्य चतुर्थ भाव (Chaturtha Bhava) का स्वामी बनता है। चतुर्थेश का द्वितीय भाव में होना जातक के पारिवारिक सुख, भूमि और वाहन को सीधे तौर पर धन भाव से जोड़ता है। Saravali के अनुसार, मिथुन राशि का सूर्य जातक को विद्वान, मधुरभाषी, स्नेही, समृद्ध और भाग्यशाली बनाता है। यदि इस सूर्य पर बुध की दृष्टि हो, तो जातक राजा के समान जीवन जीता है, प्रसिद्ध होता है, लेकिन उसे नेत्र रोगों का खतरा रहता है। The Encyclopedia of Vedic Astrological Dasha Systems के अनुसार, इस सूर्य की महादशा के दौरान जातक की रुचि रहस्यवाद, कविता और कृषि कार्यों में बढ़ती है। जातक की वाणी बौद्धिक और तार्किक होती है।

Cancer (Karka)

कर्क राशि में सूर्य मित्र (Friendly) राशि में होता है, जिसका स्वामी चंद्रमा है। यह स्थिति मिथुन लग्न (Gemini Lagna) का निर्माण करती है, जहां सूर्य तृतीय भाव (Tritiya Bhava) का स्वामी बनता है। तृतीयेश का द्वितीय भाव में होना यह दर्शाता है कि जातक अपने स्वयं के प्रयासों, लेखन, संचार और छोटी यात्राओं के माध्यम से धन अर्जित करेगा। Saravali के अनुसार, कर्क राशि का सूर्य जातक को ऐसी चीजों की इच्छा करने वाला बनाता है जो अप्राप्य हों, और उन्हें प्राप्त करने के बाद वह अपनी रुचि खो देता है। यदि यह सूर्य पीड़ित हो, तो जातक का स्वभाव झगड़ालू हो जाता है और उसे जीवनसाथी के कारण कष्ट उठाना पड़ता है। नाड़ी ग्रंथ Bhrigu Nandi Nadi के अनुसार, यदि कर्क के सूर्य के पीछे बृहस्पति या केतु स्थित हों, तो जातक के पिता अत्यंत विद्वान और धार्मिक प्रवृत्ति के होते हैं।

Leo (Simha)

सिंह राशि में सूर्य अपनी मूलत्रिकोण (Moolatrikona) और स्वराशि (Sva Kshetra) में होता है, जिसका स्वामी वह स्वयं है। यह स्थिति कर्क लग्न (Karka Lagna) का निर्माण करती है, जहां सूर्य द्वितीय भाव का ही स्वामी बनता है। द्वितीयेश का अपने ही भाव में होना धन, परिवार और वाणी के लिए एक अत्यंत शक्तिशाली राजयोग का निर्माण करता है। Saravali के अनुसार, सिंह राशि का सूर्य जातक को अत्यंत उत्साही, पराक्रमी, धनवान, प्रसिद्ध और राजा के समान तेजस्वी बनाता है। यदि इस पर चंद्रमा की दृष्टि हो, तो जातक कफ विकारों से पीड़ित हो सकता है लेकिन वह राजा का प्रिय होता है। मंगल की दृष्टि होने पर जातक साहसी और क्रांतिकारी विचारों वाला होता है। बुध की दृष्टि जातक को एक बेहतरीन लेखक और मजबूत कद-काठी का विद्वान बनाती है। जातक की वाणी में एक स्वाभाविक नेतृत्व और अधिकार झलकता है।

Virgo (Kanya)

कन्या राशि में सूर्य सम (Neutral) अवस्था में होता है, जिसका स्वामी बुध है। यह स्थिति सिंह लग्न (Simha Lagna) का निर्माण करती है, जहां सूर्य स्वयं लग्न भाव (Lagna) का स्वामी बनता है। लग्नेश का द्वितीय भाव में जाना जातक के संपूर्ण व्यक्तित्व, स्वास्थ्य और जीवन के उद्देश्य को सीधे तौर पर धन संचय और परिवार के साथ जोड़ देता है। Saravali के अनुसार, कन्या राशि का सूर्य जातक को गणितीय और तकनीकी कौशल प्रदान करता है। केपी पद्धति के अनुसार, यह स्थिति जातक को ड्राफ्ट्समैन, इंजीनियर या गणितज्ञ बनाने के लिए उपयुक्त है। Essence of Nadi Astrology के अनुसार, यदि कन्या राशि में सूर्य अकेला हो, तो जातक कभी-कभी ऊर्जा की कमी महसूस कर सकता है। नाड़ी ग्रंथों के अनुसार, जातक के पिता बचपन से ही अत्यंत बुद्धिमान होते हैं और जातक को पैतृक संपत्ति का अच्छा सुख मिलता है।

Libra (Tula)

तुला राशि में सूर्य अपनी नीच (Debilitated) अवस्था में होता है, जिसका स्वामी शुक्र है। यह स्थिति कन्या लग्न (Kanya Lagna) का निर्माण करती है, जहां सूर्य द्वादश भाव (Dvadasha Bhava) का स्वामी बनता है। द्वादशेश का द्वितीय भाव में नीच का होना वित्तीय स्थिरता के लिए एक चुनौतीपूर्ण स्थिति है, जो अत्यधिक खर्चों और अचानक होने वाले नुकसान को दर्शाती है। Saravali के अनुसार, तुला राशि का सूर्य जातक को गरीबी और संतान के कष्ट का सामना करवा सकता है। classical texts on debilitated grahas के अनुसार, ऐसा जातक अपने आत्मसम्मान को लेकर असुरक्षित और अत्यधिक संवेदनशील हो सकता है। हालांकि, राजनीतिक झुकाव के लिए यह स्थिति अनुकूल हो सकती है। यदि कुंडली में नीच भंग (Neecha Bhanga) हो रहा हो, तो जातक किसी बड़ी प्रबंधन फर्म में उच्च पद प्राप्त कर सकता है।

Scorpio (Vrischika)

वृश्चिक राशि में सूर्य मित्र (Friendly) राशि में होता है, जिसका स्वामी मंगल है। यह स्थिति तुला लग्न (Libra Lagna) का निर्माण करती है, जहां सूर्य एकादश भाव (Ekadasha Bhava) का स्वामी बनता है। एकादशेश का द्वितीय भाव में मित्र राशि में होना धन आगमन के लिए एक उत्कृष्ट योग है, जो जातक को बड़े भाई-बहनों, मित्रों और व्यावसायिक नेटवर्किंग के माध्यम से निरंतर लाभ दिलाता है। Saravali के अनुसार, वृश्चिक राशि का सूर्य जातक को गुप्त रहस्यों को उजागर करने में कुशल बनाता है, लेकिन जातक अपने व्यक्तिगत जीवन को लेकर अत्यधिक गोपनीय और रक्षात्मक होता है। यदि यह सूर्य पीड़ित हो, तो जातक क्रोधी और दुस्साहसी हो सकता है। इस स्थिति में जातक की वाणी अत्यंत गहरी, मर्मभेदी और प्रभावशाली होती है।

Sagittarius (Dhanu)

धनु राशि में सूर्य मित्र (Friendly) राशि में होता है, जिसका स्वामी बृहस्पति है। यह स्थिति वृश्चिक लग्न (Vrischika Lagna) का निर्माण करती है, जहां सूर्य दशम भाव (Dashama Bhava) का स्वामी बनता है। दशमेश का द्वितीय भाव में होना करियर और धन के बीच एक सीधा और मजबूत संबंध स्थापित करता है। जातक सरकारी नौकरियों, प्रशासन या पैतृक व्यवसाय के माध्यम से प्रचुर धन कमाता है। Predictive Jyotish के अनुसार, धनु राशि का सूर्य जातक को ऊर्जावान, बुद्धिमान, बड़ों का सम्मान करने वाला और हथियारों या तकनीकी कौशल में निपुण बनाता है। जातक की वाणी अत्यंत स्पष्ट, सत्यवादी और दार्शनिक होती है। जातक यात्राओं का शौकीन होता है और समाज में एक सम्मानित स्थान प्राप्त करता है।

Capricorn (Makara)

मकर राशि में सूर्य शत्रु (Inimical) राशि में होता है, जिसका स्वामी शनि है। यह स्थिति धनु लग्न (Sagittarius Lagna) का निर्माण करती है, जहां सूर्य नवम भाव (Navama Bhava) का स्वामी बनता है। नवमेश का द्वितीय भाव में शत्रु राशि में होना यह दर्शाता है कि जातक का भाग्य और धर्म उसके पारिवारिक मूल्यों से जुड़े होंगे, लेकिन पिता के साथ वैचारिक मतभेद या उनके स्वास्थ्य को लेकर चिंताएं रह सकती हैं। Saravali के अनुसार, मकर राशि का सूर्य जातक को थोड़ा लालची, शंकालु और चंचल दिमाग का बना सकता है, जिससे धन का नुकसान हो सकता है। हालांकि, Scientific Hindu Astrology के अनुसार, यह स्थिति जातक को इतिहास, पुरातत्व या किसी गंभीर अकादमिक क्षेत्र में विद्वान बनाने के लिए अत्यंत सहायक होती है।

Aquarius (Kumbha)

कुंभ राशि में सूर्य शत्रु (Inimical) राशि में होता है, जिसका स्वामी शनि है। यह स्थिति मकर लग्न (Capricorn Lagna) का निर्माण करती है, जहां सूर्य अष्टम भाव (Ashtama Bhava) का स्वामी बनता है। अष्टमेश का द्वितीय भाव में शत्रु राशि में होना जातक के जीवन में अचानक वित्तीय उतार-चढ़ाव, पैतृक संपत्ति के विवाद और वाणी में तीखापन लाता है। Saravali के अनुसार, कुंभ राशि का सूर्य जातक को हृदय रोगों के प्रति संवेदनशील, अल्प-क्रोधी और धन संचय में कठिनाइयों का सामना करने वाला बनाता है। The Encyclopedia of Vedic Astrological Dasha Systems के अनुसार, इस सूर्य की दशा के दौरान जातक को अदालती मामलों, पारिवारिक विवादों और पित्त संबंधी स्वास्थ्य समस्याओं का सामना करना पड़ सकता है। जातक की वाणी क्रांतिकारी और लीक से हटकर सोचने वाली होती है।

Pisces (Meena)

मीन राशि में सूर्य मित्र (Friendly) राशि में होता है, जिसका स्वामी बृहस्पति है। यह स्थिति कुंभ लग्न (Aquarius Lagna) का निर्माण करती है, जहां सूर्य सप्तम भाव (Saptama Bhava) का स्वामी बनता है। सप्तमेश का द्वितीय भाव में होना यह दर्शाता है कि जातक को विवाह के बाद या व्यावसायिक साझेदारों के माध्यम से धन और समृद्धि प्राप्त होगी। Saravali के अनुसार, मीन राशि का सूर्य जातक को धनवान, विद्वान और विपरीत लिंग के बीच अत्यधिक लोकप्रिय बनाता है। जातक की वाणी अत्यंत संवेदनशील, कल्पनाशील और काव्यात्मक होती है। जातक गणित, शिक्षण या परामर्श के क्षेत्रों में अत्यधिक सफल होता है। यदि कुंडली में अन्य शुभ योग हों, तो जातक को विदेश यात्राओं या विदेशी व्यापार से भी बड़ा लाभ मिलता है।

Conjunctions in This House

Sun with Moon

द्वितीय भाव में सूर्य और चंद्रमा की युति अमावस्या (Amavasya) योग का निर्माण करती है। यदि ये दोनों ग्रह बहुत निकट अंशों पर हों, तो जातक मानसिक रूप से अत्यंत संवेदनशील हो सकता है। How to Judge a Horoscope के अनुसार, यह युति जातक को रतौंधी या दाहिनी आंख की कमजोरी दे सकती है। हालांकि, यदि यह युति शुभ राशि में हो, तो जातक को माता और पिता दोनों का संयुक्त सहयोग प्राप्त होता है, लेकिन वित्तीय मामलों में उतार-चढ़ाव बने रहते हैं।

Sun with Mars

द्वितीय भाव में सूर्य और मंगल की युति जातक को अत्यधिक उग्र और तीखी वाणी प्रदान करती है। जातक बिना सोचे-समझे बोलने वाला और अत्यंत साहसी होता है। Scientific Hindu Astrology के अनुसार, यदि मंगल १९वें अंश पर बुध और सूर्य के साथ स्थित हो, तो यह जातक को गंभीर वित्तीय कठिनाइयां, पारिवारिक अशांति, बच्चों को कष्ट और अत्यधिक मानसिक बेचैनी दे सकता है। इस युति के कारण जातक को अपनी वाणी पर नियंत्रण रखना अत्यंत आवश्यक होता है।

Sun with Mercury

द्वितीय भाव में सूर्य और बुध की युति प्रसिद्ध बुधादित्य योग (Budha-Aditya Yoga) का निर्माण करती है। द्वितीय भाव वाणी और बुद्धि का है, इसलिए यह युति जातक को अत्यंत कुशाग्र बुद्धि, तार्किक क्षमता और उत्कृष्ट वक्तृत्व कला प्रदान करती है। How to Judge a Horoscope के अनुसार, यह योग जातक को सहज रूप से प्रेरित कविताएं लिखने की क्षमता और साहित्य में अपार सफलता देता है। जातक वित्तीय प्रबंधन और बैंकिंग के कार्यों में अत्यंत निपुण होता है।

Sun with Jupiter

द्वितीय भाव में सूर्य और बृहस्पति की युति ज्ञान, धन और गरिमा का एक अत्यंत शुभ संयोजन है। बृहस्पति ज्ञान का कारक है और सूर्य सत्ता का। Sarvartha Chintamani के अनुसार, यदि बृहस्पति द्वितीय भाव का स्वामी होकर सूर्य और शुक्र से दृष्ट हो, तो जातक व्याकरण और भाषाशास्त्र का महान ज्ञाता बनता है। जातक की वाणी अत्यंत आदरणीय, सत्यवादी और उपदेशात्मक होती है। समाज में जातक को एक ज्ञानी मार्गदर्शक के रूप में देखा जाता है।

Sun with Venus

द्वितीय भाव में सूर्य और शुक्र की युति जातक को कलात्मक और आकर्षक वाणी प्रदान करती है, लेकिन यहां शुक्र सूर्य के अत्यंत निकट होने पर अस्त (Astangata) हो सकता है। How to Judge a Horoscope के अनुसार, यदि द्वितीयेश शुक्र के साथ हो या सूर्य और चंद्रमा द्वितीय भाव में हों, तो जातक की आंखों को कष्ट हो सकता है। यदि शुक्र अस्त न हो, तो जातक विलासिता की वस्तुओं, कला और सौंदर्य प्रसाधनों के माध्यम से प्रचुर धन अर्जित करता है।

Sun with Saturn

द्वितीय भाव में सूर्य और शनि की युति पिता-पुत्र के बीच वैचारिक मतभेद और वाणी में अत्यधिक कठोरता को दर्शाती है। शनि सूर्य का शत्रु है, इसलिए यह युति संचित धन में देरी और पारिवारिक जीवन में संघर्ष लाती है। नाड़ी ग्रंथ Bhrigu Nandi Nadi के अनुसार, यदि शनि सूर्य से द्वितीय भाव में हो या उसके साथ हो, तो जातक को अपने पिता के स्थान पर बैठकर उनका कार्य संभालना पड़ता है। जातक की वाणी अत्यंत व्यावहारिक और यथार्थवादी होती है।

Sun with Rahu

द्वितीय भाव में सूर्य और राहु की युति ग्रहण योग का निर्माण करती है। यह युति जातक की वाणी में एक अजीब सा भ्रम या रहस्य पैदा करती है। जातक कभी-कभी अत्यधिक बढ़ा-चढ़ाकर बोलने वाला या कूटनीतिक भाषा का प्रयोग करने वाला हो सकता है। वित्तीय मामलों में यह युति अचानक बड़े लाभ और अचानक भारी नुकसान दोनों दे सकती है। जातक को अपने पारिवारिक संबंधों को बनाए रखने के लिए अत्यधिक प्रयास करने पड़ते हैं।

Sun with Ketu

द्वितीय भाव में सूर्य और केतु की युति जातक को भौतिक धन के प्रति एक प्रकार की विरक्ति या उदासीनता दे सकती है। जातक की वाणी आध्यात्मिक और गूढ़ विषयों की ओर झुकी होती है। Kalamsa and Cuspal Interlinks के अनुसार, यदि सूर्य और केतु का संबंध छठे या दसवें भाव से नक्षत्र स्वामी के माध्यम से और द्वितीय, छठे या दसवें भाव से उप-स्वामी के माध्यम से हो, तो जातक को उच्च सरकारी नौकरी प्राप्त होती है।

जब द्वितीय भाव में तीन या अधिक ग्रह एक साथ स्थित होते हैं, तो यह एक शक्तिशाली ग्रह समूह या स्टेलियम का निर्माण करता है। यह स्थिति जातक के संपूर्ण जीवन की ऊर्जा को धन संचय, पारिवारिक जिम्मेदारियों और वाणी के विकास पर केंद्रित कर देती है। Saravali के अनुसार, यदि इस समूह में तीन पापी ग्रह शामिल हों, तो जातक को जीवन में अत्यधिक संघर्ष, दरिद्रता और मानसिक संताप का सामना करना पड़ता है, जो अंततः जातक के भीतर संन्यास (Sanyasa) या वैराग्य की प्रवृत्तियों को जन्म दे सकता है।

Aspects Received

Jupiter's Aspect on Sun

द्वितीय भाव में स्थित सूर्य पर जब बृहस्पति की शुभ दृष्टि पड़ती है, तो यह इस भाव के सभी नकारात्मक प्रभावों को पूरी तरह से समाप्त कर देती है। बृहस्पति की अमृतमयी दृष्टि जातक की वाणी को अत्यंत गरिमापूर्ण, ज्ञानवर्धक और सत्यवादी बनाती है। जातक को अपने परिवार का पूर्ण सहयोग प्राप्त होता है और वह अपने जीवन में ईमानदारी के मार्ग पर चलकर प्रचुर धन अर्जित करता है। नेत्र रोगों से भी जातक की रक्षा होती है।

Saturn's Aspect on Sun

जब द्वितीय भाव के सूर्य पर शनि की दृष्टि पड़ती है, तो यह जातक के जीवन में धन संचय की प्रक्रिया को अत्यंत धीमा और कठिन बना देती है। जातक को अपने प्रारंभिक जीवन में पारिवारिक सुख की कमी महसूस हो सकती है। शनि की दृष्टि के कारण जातक की वाणी अत्यंत रूखी, संक्षिप्त और कभी-कभी कठोर हो सकती है। जातक को अपने पिता के स्वास्थ्य या उनके साथ संबंधों को लेकर निरंतर चिंताओं का सामना करना पड़ता है।

Mars's Aspect on Sun

द्वितीय भाव के सूर्य पर मंगल की दृष्टि जातक की वाणी में अत्यधिक उग्रता, क्रोध और आक्रामकता पैदा करती है। जातक बिना सोचे-समझे तीखे शब्दों का प्रयोग कर सकता है, जिससे पारिवारिक विवाद उत्पन्न होते हैं। वित्तीय मामलों में यह दृष्टि अचानक होने वाले खर्चों और जल्दबाजी में किए गए निवेश के कारण नुकसान को दर्शाती है। जातक को चेहरे या मुख पर चोट लगने का भी भय रहता है।

Rahu or Ketu's Aspect on Sun

जब सूर्य पर राहु या केतु की दृष्टि पड़ती है, तो यह जातक के पारिवारिक जीवन और वित्तीय स्थिरता में अचानक और अप्रत्याशित उतार-चढ़ाव लाती है। राहु की दृष्टि जातक को धन कमाने के लिए अपरंपरागत या कूटनीतिक रास्ते अपनाने के लिए प्रेरित कर सकती है, जबकि केतु की दृष्टि जातक को संचित धन के प्रति लापरवाह बना सकती है। नेत्र स्वास्थ्य के लिए भी यह दृष्टि अनुकूल नहीं मानी जाती है।

Strength and Condition

Baladi Avastha

सूर्य की अंशों के आधार पर अवस्था यह निर्धारित करती है कि वह द्वितीय भाव के परिणामों को कितनी शक्ति से प्रदान करेगा। अंशों के आधार पर अवस्थाएं इस प्रकार विभाजित हैं:

  • बाल अवस्था (Bala - 0° से 6°): ग्रह शिशु के समान कमजोर होता है और पूर्ण परिणाम देने में असमर्थ होता है।
  • कुमार अवस्था (Kumara - 6° से 12°): ग्रह आंशिक रूप से सक्रिय होता है।
  • युवा अवस्था (Yuva - 12° से 18°): ग्रह पूर्ण रूप से शक्तिशाली होता है और अपने सर्वोत्तम परिणाम देता है।
  • वृद्ध अवस्था (Vridha - 18° से 24°): ग्रह अत्यंत कमजोर होता है।
  • मृत अवस्था (Mrita - 24° से 30°): ग्रह पूरी तरह से शक्तिहीन होता है।

यहाँ एक अत्यंत महत्वपूर्ण नियम यह है कि विषम राशियों (Aries, Gemini, Leo, Libra, Sagittarius, Aquarius) में यह क्रम सीधा चलता है (0° से 6° बाल और 24° से 30° मृत), लेकिन सम राशियों (Taurus, Cancer, Virgo, Scorpio, Capricorn, Pisces) में यह क्रम पूरी तरह से विपरीत हो जाता है। सम राशियों में 0° से 6° तक ग्रह मृत अवस्था में होता है और 24° से 30° तक वह बाल अवस्था में होता है।

Ashtakavarga

अष्टकवर्ग (Ashtakavarga) प्रणाली में द्वितीय भाव को मिलने वाले बिंदु (Bindus) सूर्य के वास्तविक प्रदर्शन को तय करते हैं। यदि द्वितीय भाव में सूर्य को ५ या उससे अधिक बिंदु प्राप्त होते हैं, तो सूर्य अपनी दशा के दौरान जातक को अपार वित्तीय समृद्धि, पारिवारिक सुख और समाज में उच्च पद प्रदान करता है। इसके विपरीत, यदि इस भाव में बिंदु ४ से कम हों, तो सूर्य के शुभ प्रभाव अत्यंत सीमित हो जाते हैं और जातक को कड़ी मेहनत के बाद भी धन संचय में भारी कठिनाइयों का सामना करना पड़ता है।

Nakshatra

द्वितीय भाव में सूर्य जिस नक्षत्र में स्थित होता है, उस नक्षत्र का स्वामी ग्रह सूर्य के परिणामों को अपना रंग प्रदान करता है। उदाहरण के लिए, यदि सूर्य अपने स्वयं के नक्षत्रों (Krittika, Uttara Phalguni, Uttara Ashadha) में स्थित हो, तो वह अत्यंत शक्तिशाली होकर राजा के समान परिणाम देता है। यदि वह अपने परम मित्र बृहस्पति के नक्षत्र (जैसे Punarvasu, Vishakha, Purva Bhadrapada) में हो, तो जातक को उच्च कोटि का ज्ञान और धार्मिक बुद्धि प्राप्त होती है। नक्षत्र स्वामी की कुंडली में स्थिति यह तय करती है कि सूर्य का फल जातक को किस माध्यम से प्राप्त होगा।

Navamsa (D9)

नवांश कुंडली (Navamsha Chart) लग्न कुंडली के वादों की पुष्टि या उन्हें रद्द करने का कार्य करती है। Sarvartha Chintamani के अनुसार, यदि सूर्य लग्न कुंडली में अपनी उच्च राशि (मेष) में भी स्थित हो, लेकिन यदि वह नवांश कुंडली में अपनी नीच राशि (तुला) में चला जाता है, तो वह जातक को धन की हानि, जीवनसाथी का कष्ट और रिश्तेदारों से विरोध का सामना करवाता है। इसके विपरीत, यदि सूर्य लग्न कुंडली में कमजोर हो लेकिन नवांश में वर्गोत्तम (Vargottama) या उच्च का हो, तो वह अपने प्रतिकूल प्रभावों को समाप्त कर अंततः शुभ फल प्रदान करता है।

Condition of the Second Lord

द्वितीय भाव में स्थित सूर्य चाहे कितना भी मजबूत क्यों न हो, यदि इस भाव का स्वामी (Dhana Lord) कुंडली में अत्यंत कमजोर, नीच का या त्रिक भावों (६, ८, १२) में स्थित हो, तो सूर्य अपने शुभ परिणाम पूरी तरह से नहीं दे पाता। एक मजबूत किराएदार भी तभी सुरक्षित रह सकता है जब मकान मालिक शक्तिशाली हो। यदि द्वितीयेश मजबूत, अपने मित्र ग्रहों से युत और केंद्र या त्रिकोण में स्थित हो, तो सूर्य जातक को जीवन में अपार धन, सुखी परिवार और एक अत्यंत सम्मानित सामाजिक जीवन प्रदान करता है।

In the KP System

कृष्णमूर्ति पद्धति (KP System) में किसी भी भाव के परिणामों को तय करने में उस भाव के पुच्छीय उप-स्वामी (Cuspal Sub-lord) की भूमिका सबसे महत्वपूर्ण होती है। केपी सिद्धांतों के अनुसार, राशि स्वामी केवल एक सामान्य वातावरण प्रदान करता है, लेकिन वास्तविक घटना होगी या नहीं, यह उप-स्वामी तय करता है।

यदि द्वितीय भाव का उप-स्वामी सूर्य बनता है और वह कुंडली में सकारात्मक भावों (जैसे २, ६, १०, ११) का कार्येश होता है, तो जातक को अपने जीवन में अपार धन, पैतृक संपत्ति और सरकारी क्षेत्रों से बड़ा लाभ प्राप्त होता है। इसके विपरीत, Kalamsa and Cuspal Interlinks के अनुसार, यदि द्वितीय भाव का उप-स्वामी सूर्य या शुक्र हो और वह छठे, आठवें या बारहवें भाव का कार्येश बन रहा हो, तो जातक को दाहिनी आंख में गंभीर समस्या या दृष्टि दोष का सामना करना पड़ता है।

Practical Significations

Financial Management

  • सरकारी क्षेत्रों से लाभ: जातक को सरकारी अनुबंधों, प्रशासनिक नौकरियों या राजकीय अधिकारियों के सहयोग से धन प्राप्त होता है।
  • कठिन परिश्रम से अर्जित धन: जातक अत्यंत परिश्रमी होता है और वह अपनी मेहनत के बल पर शून्य से शुरुआत करके बड़ा साम्राज्य खड़ा करता है।
  • वित्तीय क्षेत्रों में करियर: जातक बैंकिंग, कराधान, ऑडिटिंग और वित्तीय योजना बनाने वाले संस्थानों में उच्च पदों पर कार्य करने के लिए उपयुक्त होता है।

Speech and Communication

  • अधिकारपूर्ण वाणी: जातक की वाणी में एक स्वाभाविक तेज और अधिकार होता है। लोग उसकी बातों को गंभीरता से सुनते हैं।
  • सत्यवादिता: जातक अत्यंत स्पष्टवादी होता है और वह कूटनीति के बजाय सीधे तौर पर सच बोलना पसंद करता है, जिससे कभी-कभी लोग आहत हो सकते हैं।
  • तार्किक क्षमता: जातक अपनी बात को तर्कों और तथ्यों के साथ प्रस्तुत करने में माहिर होता है।

Family Dynamics

  • पारिवारिक गौरव: जातक अपने परिवार की परंपराओं, इतिहास और प्रतिष्ठा को बनाए रखने के लिए अत्यधिक समर्पित होता है।
  • वैचारिक मतभेद: सूर्य के अहंकार और उग्र स्वभाव के कारण जातक के अपने परिवार के सदस्यों, विशेष रूप से पिता या बड़े भाई-बहनों के साथ वैचारिक मतभेद रह सकते हैं।
  • पारिवारिक जिम्मेदारी: जातक अपने परिवार का मुख्य आधार स्तंभ बनता है और सभी की जिम्मेदारियों को अपने कंधों पर उठाता है।

Frequently Asked Questions

क्या द्वितीय भाव में सूर्य धन के लिए अच्छा होता है?
हाँ, द्वितीय भाव में सूर्य यदि शुभ राशि (जैसे मेष, सिंह, धनु) में हो या उस पर बृहस्पति की दृष्टि हो, तो यह जातक को सरकारी क्षेत्रों, बैंकिंग और कठिन परिश्रम के माध्यम से प्रचुर धन प्रदान करता है। हालांकि, यदि यह पीड़ित हो, तो धन संचय में कठिनाइयां आती हैं।
क्या द्वितीय भाव में सूर्य होने से पारिवारिक जीवन में समस्याएं आती हैं?
सूर्य एक उग्र और अहंकारी ग्रह है। द्वितीय भाव में इसकी उपस्थिति जातक की वाणी को तीखा बना सकती है, जिससे परिवार के सदस्यों के साथ वैचारिक मतभेद उत्पन्न हो सकते हैं। शुभ ग्रहों के प्रभाव से इन समस्याओं को कम किया जा सकता है।
क्या द्वितीय भाव का सूर्य आंखों की रोशनी को प्रभावित करता है?
हाँ, द्वितीय भाव दाहिनी आंख का प्रतिनिधित्व करता है। शास्त्रीय ग्रंथों के अनुसार, यदि द्वितीय भाव में स्थित सूर्य पर मंगल या शनि का प्रतिकूल प्रभाव हो, तो जातक को नेत्र रोगों या दाहिनी आंख की कमजोरी का सामना करना पड़ सकता है।
द्वितीय भाव में सूर्य के लिए कौन सी राशि सबसे अच्छी मानी जाती है?
सूर्य के लिए मेष राशि (जहां वह उच्च का होता है) और सिंह राशि (उसकी अपनी राशि) सबसे सर्वोत्तम मानी जाती हैं। इन राशियों में स्थित होकर सूर्य जातक को अपार धन, मान-सम्मान और एक अत्यंत प्रभावशाली वाणी प्रदान करता है।
क्या द्वितीय भाव में सूर्य सरकारी नौकरी दिला सकता है?
हाँ, सूर्य सरकार और अधिकार का कारक है। यदि द्वितीय भाव का सूर्य दशम भाव के स्वामी के साथ संबंध बनाता है या केपी पद्धति में ६ और १०वें भाव का कार्येश बनता है, तो जातक को सरकारी क्षेत्र में उच्च प्रशासनिक पद प्राप्त होता है।
द्वितीय भाव में सूर्य और बुध की युति का क्या प्रभाव होता है?
यह युति द्वितीय भाव में एक अत्यंत शक्तिशाली बुधादित्य योग का निर्माण करती है। इसके प्रभाव से जातक अत्यंत बुद्धिमान, तार्किक, मधुरभाषी और वित्तीय मामलों का बेहतरीन जानकार बनता है। जातक को लेखन और भाषण कला में अपार सफलता मिलती है।

Remedial Measures

यदि द्वितीय भाव में स्थित सूर्य पापी ग्रहों से पीड़ित हो, नीच राशि में हो, या उसके कारण जातक को धन हानि, नेत्र रोग और पारिवारिक कलह का सामना करना पड़ रहा हो, तो शास्त्रीय और पारंपरिक उपायों के माध्यम से सूर्य के नकारात्मक प्रभावों को शांत किया जा सकता है। Sarvartha Chintamani के अनुसार, पीड़ित सूर्य के लिए दान और जप करना अत्यंत कल्याणकारी होता है।

Standard Remedies for Sun

  • आध्यात्मिक उपाय: प्रतिदिन सूर्योदय के समय तांबे के पात्र से सूर्य देव को जल अर्पित करें (Arghya)। जल अर्पित करते समय "ॐ घृणि सूर्याय नमः" मंत्र का जाप करें। इसके अतिरिक्त, प्रतिदिन Aditya Hrudaya Stotra का पाठ करना वाणी दोष और नेत्र रोगों को दूर करने में अत्यंत सहायक होता है।
  • व्यवहारिक उपाय: अपने पिता, दादा और पिता समान बुजुर्गों का सदैव सम्मान करें और उनके चरण स्पर्श कर आशीर्वाद लें। अपनी वाणी में मधुरता लाएं और बिना सोचे-समझे या अत्यधिक क्रोध में बोलने से बचें। सरकारी नियमों और करों का पूरी ईमानदारी से पालन करें।
  • दान और चैरिटी: रविवार के दिन गेहूं, तांबा, गुड़, लाल चंदन या लाल वस्त्र का दान किसी योग्य ब्राह्मण या जरूरतमंद व्यक्ति को करें। रविवार के दिन नमक का सेवन कम से कम करें या पूरी तरह से परहेज करें।
  • रत्न चिकित्सा (Gemology): सूर्य का मुख्य रत्न माणिक्य (Ruby) है। विशेष चेतावनी: माणिक्य रत्न केवल तभी धारण करना चाहिए जब सूर्य जातक की कुंडली के लिए एक कार्यात्मक शुभ ग्रह (Functional Benefic) हो, जैसे मेष, सिंह, वृश्चिक या धनु लग्न के जातकों के लिए। यदि सूर्य कुंडली के लिए कार्यात्मक अशुभ ग्रह (Functional Malefic) हो (जैसे मकर, कुंभ या तुला लग्न), तो माणिक्य धारण करने से सूर्य की नकारात्मक ऊर्जा और अधिक बढ़ सकती है, जिससे भारी नुकसान हो सकता है।

अपने व्यक्तिगत जीवन में द्वितीय भाव में स्थित सूर्य के वास्तविक प्रभावों को समझने के लिए, जातक को केवल इस एकल स्थिति पर निर्भर नहीं रहना चाहिए। इसके बजाय, जातक को अपनी जन्म कुंडली में सूर्य की सटीक राशि, उसके नक्षत्र स्वामी की स्थिति, नवांश कुंडली (D9) में उसकी गरिमा, अष्टकवर्ग में द्वितीय भाव को मिले बिंदु और वर्तमान में चल रही महादशा व अंतर्दशा का एक समग्र और संतुलित विश्लेषण करना चाहिए। एक योग्य और अनुभवी ज्योतिषी से परामर्श लेकर ही किसी भी अंतिम निष्कर्ष पर पहुंचना और उपाय करना उचित होता है।

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Sources consulted

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