Ketu in the 4th House
Read in English55 min read · Drawn from 55 classical and modern works · Updated August 2026 · 1 view
Classical Position
वैदिक ज्योतिष की शास्त्रीय परंपराओं में चतुर्थ भाव में स्थित केतु (Ketu) के प्रभावों को लेकर एक व्यापक सहमति पाई जाती है। चूंकि केतु (Ketu) का अपना कोई भौतिक अस्तित्व नहीं है, इसलिए इसके परिणाम मुख्य रूप से इसके अधिपति ग्रह और इसके साथ संबंध बनाने वाले अन्य ग्रहों पर निर्भर करते हैं। कृष्णमूर्ति पद्धति (KP System) के सिद्धांतों के अनुसार, राहु और केतु (Ketu) के परिणाम सबसे पहले उनकी युति (conjunction) से, उसके बाद उन पर पड़ने वाले पहलुओं (aspects) से, और अंत में उनके राशि स्वामी (sign lord) द्वारा निर्धारित होते हैं। यह नियम परंपरा में अत्यधिक स्वीकृत है। K.P. Reader 3: Predictive Stellar Astrology स्पष्ट रूप से इस बात की पुष्टि करता है कि इन छाया ग्रहों के फलादेश में युति और दृष्टि को प्राथमिक स्थान दिया जाना चाहिए। यदि चतुर्थ भाव में स्थित केतु (Ketu) किसी अन्य ग्रह के साथ युति में नहीं है और न ही उस पर किसी ग्रह की दृष्टि है, तो वह अपने नक्षत्र स्वामी (constellation lord) और राशि स्वामी के अनुसार परिणाम देता है। Predictive Stellar Astrology के अनुसार, ऐसी स्थिति में केतु (Ketu) पूरी तरह से अपने अधिपति ग्रहों के गुणों को अपना लेता है और जातक के जीवन में उसी के अनुसार चतुर्थ भाव के फल प्रकट करता है। इसके अतिरिक्त, शास्त्रीय दृष्टिकोण यह भी मानता है कि भविष्यवाणियां करते समय हमेशा उस ग्रह को देखा जाना चाहिए जो इस नोड (node) से जुड़ा हुआ है। नोड द्वारा प्रतिनिधित्व किए जाने वाले ग्रह के आधार पर ही सटीक फलादेश संभव हो पाता है।Variant Readings
चतुर्थ भाव में केतु (Ketu) की स्थिति को लेकर विभिन्न शास्त्रीय ग्रंथों और नाड़ी परंपराओं में कई विशिष्ट और भिन्न दृष्टिकोण भी मिलते हैं। ये दृष्टिकोण जातक के जीवन के विभिन्न पहलुओं जैसे स्वास्थ्य, माता के सुख, संपत्ति और आध्यात्मिक झुकाव पर प्रकाश डालते हैं।Domestic Life, Mother, and Property
जातक के घरेलू जीवन और माता के स्वास्थ्य के संबंध में विभिन्न ग्रंथों में कई विशिष्ट योग बताए गए हैं: माता को कष्ट और अलगाव: How to Judge a Horoscope के अनुसार, चतुर्थ भाव में केतु (Ketu) की उपस्थिति माता की हानि, संपत्ति के नुकसान, सुख में कमी, अचानक होने वाले बदलावों और विदेश में निवास का कारण बन सकती है। पारिवारिक अशांति: Timing of Events: Crux of Vedic Astrology के अनुसार, चतुर्थ भाव में केतु (Ketu) संपत्ति के लिए तो शुभ हो सकता है, लेकिन यह पारिवारिक जीवन में अशांति और जातक के भीतर कठोर हृदय की प्रवृत्ति को दर्शाता है। माता का दीर्घायु होना और संकट: Bhrigu Nadi Jyotisham के अनुसार, यदि चतुर्थ भाव में चंद्रमा स्थित हो, तो माता दीर्घायु होती है। हालांकि, यदि मिथुन राशि में शनि हो और वह वृषभ राशि के अंत में गोचर कर रहा हो, तो चतुर्थ भाव के स्वामी की महादशा (Mahadasha [major planetary period]) के केतु (Ketu) भुक्ति (Bhukti [sub-planetary period]) के दौरान माता को भारी संकट का सामना करना पड़ता है। माता द्वारा परित्याग: Doctrines of Suka Nadi के अनुसार, यदि चतुर्थ भाव में नीच का शनि स्थित हो और वह अष्टमेश (सूर्य जो तुला में हो) को देखता हो, तथा चतुर्थेश दशम भाव में हो, तो माता जातक का परित्याग कर देती है। माता की शीघ्र मृत्यु: Doctrines of Suka Nadi के अनुसार, यदि दशम भाव में राहु, मंगल और शनि स्थित हों, तथा चतुर्थ और सप्तम भाव में प्रतिकूल ग्रह हों, तो जन्म के दो वर्ष के भीतर ही माता की मृत्यु हो जाती है। माता का पूर्ण जीवन: इसके विपरीत, Doctrines of Suka Nadi का मत है कि यदि बृहस्पति लग्न स्वामी से त्रिकोण में हो, और लग्न स्वामी चतुर्थेश के साथ त्रिकोण में युति कर रहा हो, तो माता पूर्ण जीवन का आनंद लेती है। शारीरिक रोग: Sarvartha Chintamani के अनुसार, यदि चतुर्थ भाव में चंद्रमा के साथ राहु या केतु (Ketu) स्थित हो, तो जातक को हर चार दिन के अंतराल पर आने वाले रुक-रुक कर होने वाले बुखार (intermittent fever) से पीड़ित होना पड़ता है।Wealth, Status, and Education
चतुर्थ भाव में केतु (Ketu) की स्थिति जातक की शिक्षा, धन और सामाजिक प्रतिष्ठा को भी गहराई से प्रभावित करती है: जन्म से ही धनवान: Doctrines of Suka Nadi के अनुसार, यदि द्वितीय और चतुर्थ भाव के स्वामी लग्न में स्थित हों और चतुर्थ भाव में नवमेश स्थित हो, तो जातक जन्म से ही अत्यधिक धनवान होता है। उच्च पद और प्रसिद्धि: Doctrines of Suka Nadi के अनुसार, यदि नवम भाव में बृहस्पति, द्वादशेश और चतुर्थेश संयुक्त रूप से स्थित हों, तो जातक को प्रसिद्धि, धन और विलासितापूर्ण वाहन प्राप्त होते हैं। विश्वव्यापी प्रसिद्धि: Doctrines of Suka Nadi के अनुसार, यदि बृहस्पति, बुध और शुक्र छठे भाव में हों, लग्न स्वामी चतुर्थ भाव में हो, नवमेश चतुर्थ भाव में हो, और चतुर्थेश बृहस्पति की राशि में हो, तो जातक सर्वोच्च पद प्राप्त कर विश्व प्रसिद्ध और अत्यंत भाग्यशाली बनता है। शिक्षा में सफलता: Krishnamurti Padhdhati के अनुसार, चतुर्थ और एकादश भाव नियमित शिक्षा का प्रतिनिधित्व करते हैं, जबकि नवम और द्वादश भाव अनुसंधान, थीसिस या विदेश यात्रा के लिए होते हैं। यदि चतुर्थ और नवम भाव के स्वामी एकादश भाव के कार्येश (significator) के उप-स्वामी (sub-lord) में हों, तो जातक को शिक्षा में बड़ी सफलता मिलती है। K.P. Reader 3: Predictive Stellar Astrology के अनुसार, चतुर्थ और नवम भाव के कार्येश सक्रिय होने पर और नवमेश के एकादशेश होने पर जातक को पीएच.डी. (Ph.D.) में सफलता प्राप्त होती है।Vehicles, Loss, and Imprisonment
चतुर्थ भाव और उसके स्वामी के पीड़ित होने पर जातक को वाहनों और संपत्ति के नुकसान का सामना करना पड़ सकता है: वाहन दुर्घटना या हानि: Predictive Stellar Astrology के अनुसार, यदि चतुर्थेश नीच का हो, अस्त हो, पाप कर्तरी योग में हो, या शत्रु के घर में हो; या कोई पापी ग्रह चतुर्थ भाव का स्वामी होकर चतुर्थ भाव में ही स्थित हो; या चतुर्थेश द्वितीय भाव में शत्रु या नीच ग्रह के साथ हो; या द्वादशेश पापी होकर चतुर्थ भाव से जुड़ता हो; या चतुर्थेश अष्टम भाव में स्थित हो, तो जातक को वाहन के माध्यम से भारी नुकसान उठाना पड़ता है। आजीवन कारावास: Doctrines of Suka Nadi के अनुसार, यदि छठे भाव में चतुर्थ और अष्टम भाव के स्वामी स्थित हों, और चतुर्थ भाव में राहु छठे भाव के स्वामी के साथ स्थित हो, तो जातक को आजीवन कारावास का सामना करना पड़ता है। घर का नुकसान: K.P. Reader 3: Predictive Stellar Astrology के अनुसार, यदि चतुर्थेश का संबंध द्वादशेश और सूर्य से हो, तो जातक का घर आग या नीलामी के कारण नष्ट हो जाता है। विनाशकारी खर्च: Doctrines of Suka Nadi के अनुसार, यदि सूर्य चतुर्थ भाव में मंगल, लग्न स्वामी और दशमेश के साथ स्थित हो, तो जातक को अत्यधिक विनाशकारी खर्चों का सामना करना पड़ता है।Spirituality and Renunciation
चतुर्थ भाव में केतु (Ketu) की स्थिति जातक को भौतिक संसार से दूर ले जाकर आध्यात्मिक ऊंचाइयों पर ले जा सकती है: आध्यात्मिक साधना: How to Judge a Horoscope के अनुसार, यदि लग्न स्वामी शुक्र चतुर्थ भाव में केतु (Ketu) और बृहस्पति के साथ स्थित हो, और केतु (Ketu) कैवल्यकारक (Kaivalyakaraka [significator of final liberation]) की भूमिका में हो, तो जातक एक महान आध्यात्मिक आकांक्षी बनता है और तपस्या व साधना (Sadhana) का मार्ग अपनाता है। मोक्ष की प्राप्ति: Jaimini Sutras के अनुसार, यदि कोई शुभ ग्रह कारकांश (Karakamsa [the sign occupied by the Atmakaraka in the Navamsha chart]) में स्थित हो, तो जातक को मोक्ष (Moksha) या अंतिम आनंद की प्राप्ति होती है। इसके अतिरिक्त, यदि कारकांश में रवि (सूर्य) और केतु (Ketu) स्थित हों, तो जातक शैव संप्रदाय का अनुयायी बनता है।Aspect and Directional Strength
वैदिक ज्योतिष में केतु (Ketu) को एक क्रूर ग्रह (Krura Graha [fierce planet]) माना गया है। चतुर्थ भाव में स्थित होकर केतु (Ketu) अपनी पूर्ण दृष्टि (Drishti) दशम भाव (Dashama Bhava [tenth house]) पर डालता है। दशम भाव जातक के करियर, व्यवसाय, सामाजिक प्रतिष्ठा और पिता के सुख का प्रतिनिधित्व करता है। चूंकि केतु (Ketu) अलगाव और विरक्ति का कारक है, इसलिए दशम भाव पर इसकी दृष्टि जातक के व्यावसायिक जीवन में निरंतर उतार-चढ़ाव या अचानक बदलाव लाती है। जातक अपने करियर में पारंपरिक सफलता के बजाय कुछ अलग या लीक से हटकर काम करना पसंद कर सकता है। केतु (Ketu) की यह क्रूर दृष्टि जातक को कार्यस्थल पर सहकर्मियों के साथ मतभेद दे सकती है, लेकिन साथ ही यह उसे अपने काम के प्रति एक अनासक्त और निष्पक्ष दृष्टिकोण भी प्रदान करती है। दिशात्मक बल या दिगबल (Digbala [directional strength]) के संदर्भ में, केतु (Ketu) को चतुर्थ भाव में कोई विशेष दिशात्मक बल प्राप्त नहीं होता है। शास्त्रीय नियमों के अनुसार, चतुर्थ भाव में शुक्र और चंद्रमा अत्यंत मजबूत होते हैं और पूर्ण दिगबल प्राप्त करते हैं। इसके विपरीत, केतु (Ketu) इस भाव में सहज महसूस नहीं करता क्योंकि यह भाव आंतरिक सुख और घरेलू स्थिरता का है, जबकि केतु (Ketu) का मूल स्वभाव घुमक्कड़ और विरक्त है। इसलिए, चतुर्थ भाव में केतु (Ketu) जातक को घर के भीतर एक अनजाना सा खालीपन या अशांति महसूस कराता है। नाड़ी ज्योतिष के कुछ विशिष्ट ग्रंथों, जैसे Doctrines of Suka Nadi के अनुसार, राहु और केतु (Ketu) अपनी स्थिति से तीसरे, सातवें और ग्यारहवें भावों को या पांचवें, सातवें और नौवें भावों को प्रभावित करते हैं। यह दृष्टि जातक के सामाजिक संबंधों और भाग्य को प्रभावित करती है।The Placement Across the Twelve Rashis
केतु (Ketu) एक छाया ग्रह (Chhaya Graha) होने के कारण किसी भी राशि का स्वामित्व नहीं रखता है। शास्त्रीय ग्रंथों में इसके उच्च या नीच होने को लेकर मतभेद हैं, इसलिए इस प्रविष्टि में केतु (Ketu) की किसी भी राशि में कोई विशिष्ट गरिमा (dignity) नहीं मानी गई है। इसका फलादेश पूरी तरह से इसके राशि स्वामी (dispositor) की स्थिति और उसके संबंधों पर आधारित होता है।Aries (Mesha)
मेष राशि में केतु (Ketu) के होने पर इसका राशि स्वामी मंगल बनता है। यह स्थिति मकर लग्न (Lagna [ascendant]) को दर्शाती है। मकर लग्न के लिए मंगल चतुर्थ और एकादश भाव का स्वामी होता है, जो जातक के जीवन में भूमि और लाभ के संबंधों को मजबूत करता है। केतु इन मेष: Ketu in Aries के होने पर जातक के घरेलू जीवन में मंगल का उग्र प्रभाव देखने को मिलता है। Bhrigu Nandi Nadi के अनुसार, यदि शनि और बुध की युति हो, तो मंगल के घर में केतु (Ketu) के कारण शनि के मार्ग में आने वाली बाधाएं दूर हो जाती हैं। वैवाहिक विवाद: Core of Nadi Astrology के अनुसार, मेष राशि में केतु (Ketu) का गोचर पति-पत्नी के बीच बड़े विवादों का कारण बन सकता है। धन लाभ: Vedic Astro Textbook के अनुसार, मेष राशि में केतु (Ketu) जातक को अचानक धन लाभ और संपत्ति प्रदान करने में सक्षम होता है। निष्कर्ष: मंगल के प्रभाव के कारण जातक के घर का वातावरण अत्यधिक ऊर्जावान लेकिन कभी-कभी तनावपूर्ण रहता है। जातक को अपनी माता के स्वास्थ्य का विशेष ध्यान रखना चाहिए।Taurus (Vrishabha)
वृषभ राशि में केतु (Ketu) के होने पर इसका राशि स्वामी शुक्र बनता है। यह स्थिति कुंभ लग्न को दर्शाती है। कुंभ लग्न के लिए शुक्र चतुर्थ और नवम भाव का स्वामी होकर एक अत्यंत शुभ योगकारक ग्रह बनता है। केतु इन वृषभ: Ketu in Taurus के होने पर जातक को शुक्र के समान परिणाम प्राप्त होते हैं। Notable Horoscopes के अनुसार, केतु (Ketu) यहां पूरी तरह शुक्र के प्रभाव में काम करता है। शनि का प्रभाव: My Experiences in Astrology के अनुसार, यदि शनि भी वृषभ राशि में केतु (Ketu) के साथ स्थित हो, तो वह केतु (Ketu) की वास्तविक उन्नति प्रदान करने की शक्ति को छीन लेता है। धन और सुख: Scientific Hindu Astrology के अनुसार, वृषभ राशि में केतु (Ketu) जातक को भौतिक सुख और वाहन प्रदान करने में सहायक होता है। निष्कर्ष: शुक्र के आधिपत्य के कारण जातक को कलात्मक और सुंदर घर की चाह होती है, लेकिन केतु (Ketu) के कारण वह उन सुखों का पूरी तरह उपभोग नहीं कर पाता।Gemini (Mithuna)
मिथुन राशि में केतु (Ketu) के होने पर इसका राशि स्वामी बुध बनता है। यह स्थिति मीन लग्न को दर्शाती है। मीन लग्न के लिए बुध चतुर्थ और सप्तम भाव का स्वामी होता है, जो जातक की बुद्धि और साझेदारी को प्रभावित करता है। केतु इन मिथुन: Ketu in Gemini के होने पर जातक का झुकाव बौद्धिक कार्यों की ओर होता है। Bhrigu Nandi Nadi के अनुसार, मिथुन राशि में केतु (Ketu) जातक को वैदिक ग्रंथों के प्रचार-प्रसार या लेखन कार्य में संलग्न करता है। शिक्षा और करियर: Bhrigu Nandi Nadi के अनुसार, यदि बृहस्पति और केतु (Ketu) दोनों मिथुन राशि में हों, तो जातक की शिक्षा और करियर अत्यंत शानदार रहता है। धन प्राप्ति: Vedic Astro Textbook के अनुसार, मिथुन राशि में केतु (Ketu) जातक को व्यापारिक गतिविधियों से अच्छा धन दिलाता है। निष्कर्ष: बुध का प्रभाव जातक को एक विश्लेषणात्मक मस्तिष्क प्रदान करता है। जातक अपने घर में पुस्तकों और ज्ञान के साधनों को संचित करना पसंद करता है।Cancer (Karka)
कर्क राशि में केतु (Ketu) के होने पर इसका राशि स्वामी चंद्रमा बनता है। यह स्थिति मेष लग्न को दर्शाती है। मेष लग्न के लिए चंद्रमा चतुर्थ भाव का स्वामी होता है, जिससे यह स्थिति सीधे तौर पर जातक की मानसिक शांति और माता से जुड़ जाती है। केतु इन कर्क: Ketu in Cancer के होने पर जातक को अत्यधिक संवेदनशील और भावुक स्वभाव मिलता है। Bhrigu Nandi Nadi के अनुसार, यदि बुध, शुक्र और केतु (Ketu) कर्क राशि में एक साथ हों, तो जातक अत्यंत बुद्धिमान और मिलनसार होता है। व्यवसाय: Bhrigu Nandi Nadi के अनुसार, कर्क राशि में शुक्र और केतु (Ketu) की उपस्थिति मीठे पेय पदार्थों के निर्माण या व्यापार को दर्शाती है। करियर में निराशा: Core of Nadi Astrology के अनुसार, यदि मंगल कर्क राशि में नीच का होकर केतु (Ketu) के साथ स्थित हो, तो जातक को करियर में बड़ी निराशा और नुकसान का सामना करना पड़ता है। निष्कर्ष: चंद्रमा के प्रभाव के कारण जातक के मन में निरंतर विचारों का उतार-चढ़ाव बना रहता है। जातक को अपनी आंतरिक शांति बनाए रखने के लिए ध्यान का सहारा लेना चाहिए।Leo (Simha)
सिंह राशि में केतु (Ketu) के होने पर इसका राशि स्वामी सूर्य बनता है। यह स्थिति वृषभ लग्न को दर्शाती है। वृषभ लग्न के लिए सूर्य चतुर्थ भाव का स्वामी होता है, जो जातक के पारिवारिक गौरव और भूमि को दर्शाता है। केतु इन सिंह: Ketu in Leo के होने पर जातक को कुछ प्रतिकूल परिणामों का सामना करना पड़ सकता है। Scientific Hindu Astrology के अनुसार, सिंह राशि में केतु (Ketu) आमतौर पर शुभ परिणाम नहीं देता है। आध्यात्मिक जीवन: Bhrigu Nandi Nadi के अनुसार, यदि बृहस्पति और केतु (Ketu) दोनों सिंह राशि में हों, तो जातक का आध्यात्मिक जीवन अत्यंत समृद्ध होता है। सामाजिक प्रतिष्ठा: Bhrigu Nandi Nadi के अनुसार, यदि मंगल, बृहस्पति और केतु (Ketu) सिंह राशि में हों, तो जातक को समाज में उच्च स्थान और बेहतरीन करियर प्राप्त होता है। निष्कर्ष: सूर्य के प्रभाव के कारण जातक के भीतर एक नेतृत्व की भावना होती है, लेकिन घर के भीतर वह खुद को अकेला या अलग-थलग महसूस कर सकता है।Virgo (Kanya)
कन्या राशि में केतु (Ketu) के होने पर इसका राशि स्वामी बुध बनता है। यह स्थिति मिथुन लग्न को दर्शाती है। मिथुन लग्न के लिए बुध प्रथम और चतुर्थ भाव का स्वामी होता है, जिससे जातक का व्यक्तित्व सीधे तौर पर उसके घर और माता से जुड़ जाता है। केतु इन कन्या: Ketu in Virgo के होने पर जातक को बहुभाषी होने का गौरव प्राप्त हो सकता है। Bhrigu Nandi Nadi के अनुसार, कन्या राशि में केतु (Ketu) होने पर जातक तीन भाषाओं में पारंगत होता है। व्यापारिक कौशल: Bhrigu Nandi Nadi के अनुसार, कन्या राशि में मंगल और केतु (Ketu) की उपस्थिति जातक को व्यापार को अपने पेशे के रूप में चुनने के लिए प्रेरित करती है। कृषि और पशुधन: Bhrigu Nandi Nadi के अनुसार, यदि सिंह में शनि और कन्या में मंगल व केतु (Ketu) हों, तो जातक को कृषि और पशुधन से भारी लाभ होता है। निष्कर्ष: बुध का यह प्रभाव जातक को अत्यधिक व्यावहारिक और तार्किक बनाता है। जातक अपने घरेलू मामलों को बहुत ही व्यवस्थित ढंग से संभालता है।Libra (Tula)
तुला राशि में केतु (Ketu) के होने पर इसका राशि स्वामी शुक्र बनता है। यह स्थिति कर्क लग्न को दर्शाती है। कर्क लग्न के लिए शुक्र चतुर्थ और एकादश भाव का स्वामी होता है, जो जातक के सुख और इच्छाओं की पूर्ति को नियंत्रित करता है। केतु इन तुला: Ketu in Libra के होने पर जातक के जीवन में कुछ संघर्ष आ सकते हैं। Bhrigu Nandi Nadi के अनुसार, यदि केतु (Ketu) तुला में हो और बृहस्पति धनु राशि में हो, तो जातक की खेती समृद्ध नहीं होती और वह पुरोहित या धार्मिक कार्यों की ओर मुड़ जाता है। स्वास्थ्य समस्याएं: Core of Nadi Astrology के अनुसार, यदि बुध तुला राशि में केतु (Ketu) के साथ स्थित हो, तो जातक को हकलाने की समस्या या कान से संबंधित रोग हो सकते हैं। निष्कर्ष: शुक्र के प्रभाव के कारण जातक को भौतिक सुखों की इच्छा तो होती है, लेकिन केतु (Ketu) उसे बार-बार इन सुखों से दूर धकेलता है, जिससे जातक में वैराग्य की भावना उत्पन्न होती है।Scorpio (Vrischika)
वृश्चिक राशि में केतु (Ketu) के होने पर इसका राशि स्वामी मंगल बनता है। यह स्थिति सिंह लग्न को दर्शाती है। सिंह लग्न के लिए मंगल चतुर्थ और नवम भाव का स्वामी होकर एक अत्यंत शक्तिशाली योगकारक ग्रह बनता है। केतु इन वृश्चिक: Ketu in Scorpio की स्थिति को केतु (Ketu) के लिए अत्यंत शुभ माना गया है। Scientific Hindu Astrology के अनुसार, वृश्चिक राशि केतु (Ketu) के लिए बहुत अच्छी मानी जाती है और यह जातक को शुभ फल देने में सक्षम है। शारीरिक कष्ट: Bhrigu Nandi Nadi के अनुसार, वृश्चिक राशि में केतु (Ketu) होने पर जातक को वायु विकार (wind troubles) और बवासीर (piles) जैसी समस्याओं का सामना करना पड़ सकता है। अध्यात्म और ज्ञान: Bhrigu Nandi Nadi के अनुसार, यदि शनि वृश्चिक राशि में केतु (Ketu) के साथ स्थित हो, तो जातक को शाश्वत और गूढ़ ज्ञान की प्राप्ति होती है। निष्कर्ष: मंगल के इस प्रभाव के कारण जातक के भीतर एक गहरी खोजी प्रवृत्ति होती है। वह जीवन के रहस्यों को जानने के लिए हमेशा उत्सुक रहता है।Sagittarius (Dhanu)
धनु राशि में केतु (Ketu) के होने पर इसका राशि स्वामी बृहस्पति बनता है। यह स्थिति कन्या लग्न को दर्शाती है। कन्या लग्न के लिए बृहस्पति चतुर्थ और सप्तम भाव का स्वामी होता है, जो जातक के पारिवारिक जीवन और जीवनसाथी के संबंधों को प्रभावित करता है। केतु इन धनु: Ketu in Sagittarius के होने पर जातक को बृहस्पति का शुभ प्रभाव प्राप्त होता है। PAC DARES kn rao के अनुसार, धनु राशि में केतु (Ketu) को शुभ माना जाता है और यदि इस पर बृहस्पति की दृष्टि हो, तो यह अत्यंत परोपकारी बन जाता है। सूर्य का प्रभाव: Scientific Hindu Astrology के अनुसार, धनु राशि में स्थित केतु (Ketu) यदि अपने शत्रु सूर्य द्वारा देखा जा रहा हो, तो इसके शुभ फलों में कमी आती है। पूर्व जन्म का संबंध: book2 for CD के अनुसार, धनु राशि में केतु (Ketu) यह दर्शाता है कि जातक की पूर्व जन्म में मृत्यु किसी ऊंचाई से गलती से गिरने के कारण हुई थी। निष्कर्ष: बृहस्पति के प्रभाव के कारण जातक का घर धार्मिक और आध्यात्मिक गतिविधियों का केंद्र बनता है। जातक के भीतर दान-पुण्य की गहरी भावना होती है।Capricorn (Makara)
मकर राशि में केतु (Ketu) के होने पर इसका राशि स्वामी शनि बनता है। यह स्थिति तुला लग्न को दर्शाती है। तुला लग्न के लिए शनि चतुर्थ और पंचम भाव का स्वामी होकर एक परम योगकारक ग्रह बनता है। केतु इन मकर: Ketu in Capricorn की स्थिति जातक को जीवन में वैराग्य की ओर ले जाती है। Bhrigu Nandi Nadi के अनुसार, मकर राशि में केतु (Ketu) जातक को संन्यास या पूर्ण त्याग का जीवन जीने के लिए प्रेरित करता है। शैव संप्रदाय: Bhrigu Nandi Nadi के अनुसार, यदि बृहस्पति ईश्वर अंश में हो और चंद्रमा व केतु (Ketu) के साथ मकर राशि में स्थित हो, तो जातक कट्टर शैव भक्त होता है। व्यवसाय: Bhrigu Nandi Nadi के अनुसार, यदि शनि मकर राशि में केतु (Ketu) के साथ युति करे, तो जातक शराब या महंगे पेय पदार्थों के व्यापार में संलग्न हो सकता है। निष्कर्ष: शनि के प्रभाव के कारण जातक का जीवन अनुशासन और कठोर परिश्रम से भरा होता है। जातक अपने कर्तव्यों के प्रति अत्यंत गंभीर रहता है।Aquarius (Kumbha)
कुंभ राशि में केतु (Ketu) के होने पर इसका राशि स्वामी शनि बनता है। यह स्थिति वृश्चिक लग्न को दर्शाती है। वृश्चिक लग्न के लिए शनि तृतीय और चतुर्थ भाव का स्वामी होता है, जो जातक के पुरुषार्थ और सुख-साधनों को दर्शाता है। केतु इन कुंभ: Ketu in Aquarius के संबंध में शास्त्रीय ग्रंथों में बहुत अधिक प्रत्यक्ष तथ्य उपलब्ध नहीं हैं, इसलिए इस राशि के लिए फलादेश मुख्य रूप से इसके स्वामी शनि की स्थिति पर आधारित होता है। बधिरता का योग: Doctrines of Suka Nadi के अनुसार, यदि तृतीयेश, चतुर्थेश और षष्ठेश तीनों कुंभ राशि में एक साथ स्थित हों, तो जातक को बधिरता (deafness) का सामना करना पड़ता है। निष्कर्ष: शनि के इस वायु तत्व राशि में होने के कारण जातक का मन हमेशा दार्शनिक विचारों में खोया रहता है। वह समाज कल्याण के कार्यों में रुचि ले सकता है।Pisces (Meena)
मीन राशि में केतु (Ketu) के होने पर इसका राशि स्वामी बृहस्पति बनता है। यह स्थिति धनु लग्न को दर्शाती है। धनु लग्न के लिए बृहस्पति प्रथम और चतुर्थ भाव का स्वामी होता है, जो जातक के स्वयं के अस्तित्व और उसके सुख स्थान को जोड़ता है। केतु इन मीन: Ketu in Pisces की स्थिति जातक को अत्यधिक आध्यात्मिक बनाती है। PAC DARES kn rao के अनुसार, मीन राशि में केतु (Ketu) को अत्यंत शुभ माना गया है और यदि इस पर बृहस्पति की दृष्टि हो, तो यह जातक को मोक्ष की ओर अग्रसर करता है। शिक्षण पेशा: Bhrigu Nandi Nadi के अनुसार, यदि चंद्रमा, शनि और बृहस्पति मेष राशि में हों और केतु (Ketu) उनके पीछे मीन राशि में स्थित हो, तो जातक शिक्षण कार्य (teaching profession) को अपनाता है। निष्कर्ष: बृहस्पति की इस जल तत्व राशि में केतु (Ketu) जातक को असीम कल्पनाशीलता और गहरी ध्यान अवस्था प्रदान करता है। जातक का घर अत्यंत शांत और पवित्र होता है।Conjunctions in This House
चतुर्थ भाव में केतु (Ketu) के साथ अन्य ग्रहों की युति जातक के जीवन की दिशा को पूरी तरह बदल देती है। प्रत्येक ग्रह केतु (Ketu) की ऊर्जा को एक नया रूप प्रदान करता है।Sun (Surya)
चतुर्थ भाव में Sun with Ketu की युति जातक के भीतर एक गहरा आंतरिक संघर्ष पैदा करती है। सूर्य आत्मा और अहंकार का कारक है, जबकि केतु (Ketu) विसर्जन का। यह युति जातक को अपने पारिवारिक गौरव या माता के साथ संबंधों में कुछ दूरी का अनुभव करा सकती है। जातक को अपनी पहचान बनाने के लिए कड़ा संघर्ष करना पड़ता है, लेकिन यह युति उसे एक मजबूत आत्म-निरीक्षण की शक्ति भी देती है।Moon (Chandra)
चतुर्थ भाव में Moon with Ketu की युति जातक के मानसिक स्वास्थ्य को गहराई से प्रभावित करती है। चंद्रमा मन और माता का कारक है। Sarvartha-Chintamani के अनुसार, यदि चंद्रमा चतुर्थ भाव में केतु (Ketu) के साथ स्थित हो, तो जातक को रुक-रुक कर होने वाले बुखार से पीड़ित होना पड़ता है। यह युति जातक को अत्यधिक संवेदनशील, अंतर्मुखी और कभी-कभी मानसिक रूप से अशांत बनाती है, लेकिन यह उसे तीव्र अंतर्ज्ञान (intuition) भी प्रदान करती है।Mars (Mangal)
चतुर्थ भाव में Mars with Ketu की युति एक अत्यंत विस्फोटक ऊर्जा का निर्माण करती है। मंगल भूमि, साहस और क्रोध का कारक है। यह युति जातक के घरेलू जीवन में अचानक विवाद, दुर्घटना या संपत्ति को लेकर झगड़े पैदा कर सकती है। जातक को अपने गुस्से पर नियंत्रण रखने की आवश्यकता होती है। हालांकि, यदि यह युति शुभ प्रभाव में हो, तो जातक भूमि निर्माण या तकनीकी कार्यों में बड़ी सफलता प्राप्त कर सकता है।Mercury (Budha)
चतुर्थ भाव में Mercury with Ketu की युति जातक की बुद्धि को एक विशिष्ट दिशा देती है। बुध संचार और तर्क का कारक है। यह युति जातक को गूढ़ विषयों, ज्योतिष या गुप्त विद्याओं के अध्ययन में गहरी रुचि प्रदान करती है। जातक का सोचने का तरीका दूसरों से काफी अलग हो सकता है। हालांकि, कभी-कभी यह युति जातक को निर्णय लेने में भ्रम या त्वचा से संबंधित कुछ समस्याएं भी दे सकती है।Jupiter (Guru)
चतुर्थ भाव में Jupiter with Ketu की युति को एक अत्यंत पवित्र और आध्यात्मिक योग माना जाता है। बृहस्पति ज्ञान, धर्म और गुरु का कारक है। यह युति जातक के भीतर वैराग्य और ईश्वर के प्रति गहरी भक्ति पैदा करती है। जातक का घर किसी मंदिर के समान पवित्र होता है और वह हमेशा धर्म के मार्ग पर चलता है। यह युति जातक को जीवन के अंतिम समय में मोक्ष की ओर ले जाने में सहायक होती है।Venus (Shukra)
चतुर्थ भाव में Venus with Ketu की युति जातक के भौतिक सुखों और संबंधों को प्रभावित करती है। शुक्र विलासिता और विवाह का कारक है। How to Judge a Horoscope के अनुसार, यदि लग्न स्वामी शुक्र चतुर्थ भाव में केतु (Ketu) और बृहस्पति के साथ स्थित हो, तो जातक एक महान आध्यात्मिक साधक बनता है। यह युति जातक को सांसारिक सुखों के प्रति उदासीन बनाकर कलात्मक या आध्यात्मिक कार्यों में आनंद खोजने की प्रवृत्ति देती है।Saturn (Shani)
चतुर्थ भाव में Saturn with Ketu की युति जातक को जीवन के कठिन और व्यावहारिक सबक सिखाती है। शनि कर्म और अनुशासन का कारक है। यह युति जातक के घरेलू जीवन में लंबे समय तक चलने वाली नीरसता, माता के स्वास्थ्य में गिरावट या संपत्ति प्राप्त करने में अत्यधिक देरी को दर्शाती है। जातक को अपने जीवन के शुरुआती वर्षों में बहुत संघर्ष करना पड़ता है, लेकिन यह उसे अत्यंत धैर्यवान और परिपक्व बनाती है।Rahu (Rahu)
चतुर्थ भाव में राहु और केतु (Ketu) की युति खगोलीय रूप से असंभव है, क्योंकि ये दोनों हमेशा एक-दूसरे से 180 डिग्री की दूरी पर स्थित होते हैं। इसलिए, जब केतु (Ketu) चतुर्थ भाव में होता है, तो राहु अनिवार्य रूप से दशम भाव में स्थित होता है।Ketu (Ketu)
केतु (Ketu) की स्वयं के साथ युति का कोई शास्त्रीय आधार नहीं है, क्योंकि यह एक एकल बिंदु है जो कुंडली के विशिष्ट भाव में स्थित होकर अपना प्रभाव प्रकट करता है। तीन या अधिक ग्रहों की युति (Stellium) जब चतुर्थ भाव में केतु (Ketu) के साथ होती है, तो यह जातक के पूरे जीवन का ध्यान घरेलू और आंतरिक मामलों पर केंद्रित कर देती है। ऐसी स्थिति में जातक के भीतर संन्यास (Sanyasa [asceticism]) की भावना अत्यंत प्रबल हो जाती है, और वह सांसारिक जिम्मेदारियों को निभाते हुए भी भीतर से पूरी तरह मुक्त रहता है।Aspects Received
चतुर्थ भाव में स्थित केतु (Ketu) पर जब अन्य ग्रहों की दृष्टि पड़ती है, तो इसके परिणामों में भारी बदलाव आता है। शुभ ग्रहों की दृष्टि इसके पापी प्रभावों को शांत करती है, जबकि पापी ग्रहों की दृष्टि इसके संघर्षों को बढ़ा देती है।Jupiter (Guru)
बृहस्पति की दृष्टि को ज्योतिष में अमृत के समान माना गया है। जब बृहस्पति चतुर्थ भाव में स्थित केतु (Ketu) को अपनी शुभ दृष्टि से देखता है, तो यह जातक के जीवन की सभी नकारात्मकताओं को दूर कर देता है। जातक को माता का पूर्ण सुख मिलता है, घर में शांति बनी रहती है, और जातक की आध्यात्मिक प्रगति अत्यंत तीव्र होती है। यह दृष्टि केतु (Ketu) को पूरी तरह से शुभ और परोपकारी बना देती है।Saturn (Shani)
शनि की दृष्टि जब चतुर्थ भाव में स्थित केतु (Ketu) पर पड़ती है, तो यह जातक के जीवन में संघर्ष और अलगाव को बढ़ा देती है। जातक को अपनी माता से दूर रहना पड़ सकता है या माता के स्वास्थ्य को लेकर निरंतर चिंता बनी रहती है। घर का वातावरण काफी तनावपूर्ण या अनुशासित हो सकता है। यह दृष्टि जातक को भौतिक सुखों से पूरी तरह विमुख कर वैराग्य की ओर धकेलती है।Mars (Mangal)
मंगल की उग्र दृष्टि जब चतुर्थ भाव में स्थित केतु (Ketu) पर पड़ती है, तो यह जातक के भीतर अत्यधिक क्रोध और आक्रामकता पैदा करती है। घर में अचानक कलह, आगजनी या वाहन दुर्घटना के योग बन सकते हैं। जातक को अपनी वाणी और व्यवहार पर बहुत नियंत्रण रखना पड़ता है। भूमि या संपत्ति को लेकर अदालती मामलों का सामना भी करना पड़ सकता है।Rahu (Rahu)
राहु दशम भाव से अपनी पूर्ण सातवीं दृष्टि चतुर्थ भाव में स्थित केतु (Ketu) पर डालता है। यह दृष्टि जातक के भीतर एक अजीब सा असंतुलन पैदा करती है। जातक का बाहरी जीवन (करियर) अत्यंत सक्रिय और महत्वाकांक्षी होता है, लेकिन उसका आंतरिक जीवन (घर) पूरी तरह से अशांत और असंतुष्ट रहता है। जातक हमेशा इन दोनों के बीच संतुलन बनाने का प्रयास करता रहता है।Strength and Condition
चतुर्थ भाव में केतु (Ketu) की ताकत और उसकी स्थिति का आकलन करने के लिए जातक को कई महत्वपूर्ण ज्योतिषीय घटकों की जांच करनी चाहिए। ये घटक यह तय करते हैं कि केतु (Ketu) अपने गोचर और दशा के दौरान कैसा व्यवहार करेगा।Baladi Avastha
ग्रहों की बाल्यादि अवस्था (Baladi Avastha [state of age]) उनके अंशों (degrees) के आधार पर उनकी कार्यक्षमता को दर्शाती है। इसके नियम विषम और सम राशियों में पूरी तरह से विपरीत होते हैं: विषम राशियां (Aries, Gemini, Leo, Libra, Sagittarius, Aquarius): 0-6 अंश: बाल अवस्था (Bala [infant]) - कमजोर परिणाम। 6-12 अंश: कुमार अवस्था - मध्यम परिणाम। 12-18 अंश: युवा अवस्था - पूर्ण और शक्तिशाली परिणाम। 18-24 अंश: वृद्ध अवस्था - न्यूनतम परिणाम। 24-30 अंश: मृत अवस्था (Mrita [dead]) - कोई परिणाम नहीं। सम राशियां (Taurus, Cancer, Virgo, Scorpio, Capricorn, Pisces): 0-6 अंश: मृत अवस्था (Mrita) - कोई परिणाम नहीं। 6-12 अंश: वृद्ध अवस्था - न्यूनतम परिणाम। 12-18 अंश: युवा अवस्था - पूर्ण और शक्तिशाली परिणाम। 18-24 अंश: कुमार अवस्था - मध्यम परिणाम। 24-30 अंश: बाल अवस्था (Bala) - कमजोर परिणाम।Ashtakavarga
अष्टकवर्ग (Ashtakavarga) प्रणाली में चतुर्थ भाव को मिलने वाले बिंदु (Bindu [points]) केतु (Ketu) के फलों को बहुत प्रभावित करते हैं। यदि चतुर्थ भाव में 28 से अधिक बिंदु हैं, तो केतु (Ketu) के अशुभ प्रभावों में भारी कमी आती है और जातक को भूमि व वाहन का सुख प्राप्त होता है। इसके विपरीत, यदि बिंदु 20 से कम हैं, तो जातक को निरंतर घरेलू अशांति और संपत्ति के नुकसान का सामना करना पड़ता है।Nakshatra
केतु (Ketu) जिस नक्षत्र में स्थित होता है, उसका स्वामी (constellation lord) केतु (Ketu) के परिणामों को बहुत हद तक नियंत्रित करता है। उदाहरण के लिए, यदि केतु (Ketu) केतु के अपने ही नक्षत्रों (अश्विनी, मघा, मूल) में हो, तो यह अत्यंत शक्तिशाली हो जाता है। यदि यह किसी शुभ ग्रह जैसे बृहस्पति या शुक्र के नक्षत्र में हो, तो यह जातक को सुख और समृद्धि प्रदान करता है, जबकि पापी ग्रहों के नक्षत्र में होने पर यह कष्टकारी साबित होता है।Navamsha (D9)
नवांश कुंडली (Navamsha [D9 chart]) मुख्य कुंडली (D1) के वादों की पुष्टि या उन्हें रद्द करने का काम करती है। यदि केतु (Ketu) जन्म कुंडली के चतुर्थ भाव में पीड़ित है, लेकिन नवांश कुंडली में वह किसी शुभ ग्रह की राशि में या वर्गोत्तम (vargottama) होकर स्थित है, तो जातक को जीवन के उत्तरार्ध में सभी सुख प्राप्त हो जाते हैं। इसके विपरीत, यदि वह नवांश में भी पीड़ित हो, तो कष्ट स्थायी हो जाते हैं।Condition of the 4th House Lord
चतुर्थ भाव के स्वामी (चतुर्थेश) की स्थिति सबसे महत्वपूर्ण कारक है। यदि चतुर्थेश अपनी स्वराशि, उच्च राशि या मित्र राशि में मजबूत होकर केंद्र या त्रिकोण में स्थित है, तो चतुर्थ भाव में बैठा केतु (Ketu) जातक को कोई बड़ा नुकसान नहीं पहुंचा पाता। लेकिन यदि चतुर्थेश स्वयं नीच का हो, अस्त हो या छठे, आठवें या बारहवें भाव में पीड़ित हो, तो केतु (Ketu) के पापी प्रभाव अत्यंत तीव्र हो जाते हैं।Practical Significations
चतुर्थ भाव में केतु (Ketu) की स्थिति जातक के दैनिक जीवन और व्यावहारिक अनुभवों को कई तरह से प्रभावित करती है। इसे हम निम्नलिखित श्रेणियों में समझ सकते हैं:Domestic Environment and Home
घर में अलगाव की भावना: जातक अपने ही घर में खुद को एक अजनबी की तरह महसूस कर सकता है। उसे घरेलू सुख-सुविधाओं के बीच भी एक खालीपन का अहसास होता है। बार-बार स्थान परिवर्तन: केतु (Ketu) के प्रभाव के कारण जातक को अपने जीवन में कई बार घर बदलना पड़ता है या वह अपने जन्मस्थान से बहुत दूर जाकर बस जाता है। अपरंपरागत गृह सज्जा: जातक का घर बहुत ही साधारण या आध्यात्मिक वातावरण वाला हो सकता है, जहां तड़क-भड़क के स्थान पर सादगी को प्राथमिकता दी जाती है।Mother and Maternal Relations
माता के साथ वैचारिक मतभेद: जातक और उसकी माता के बीच विचारों का बड़ा अंतर हो सकता है, जिससे उनके संबंधों में एक दूरी बनी रहती है। माता का आध्यात्मिक होना: जातक की माता अक्सर बहुत ही धार्मिक, शांत और सांसारिक मामलों से दूर रहने वाली महिला होती हैं। माता के स्वास्थ्य की चिंता: जातक को अपनी माता के स्वास्थ्य को लेकर हमेशा एक अनजाना डर या चिंता बनी रहती है।Frequently Asked Questions
क्या चतुर्थ भाव में केतु हमेशा बुरा फल देता है?
क्या चतुर्थ भाव का केतु माता के लिए हानिकारक है?
क्या इस स्थान के कारण जातक को अपना घर छोड़ना पड़ता है?
चतुर्थ भाव में केतु के लिए कौन सी राशि सबसे अच्छी मानी जाती है?
क्या चतुर्थ भाव का केतु शिक्षा में बाधा डालता है?
क्या चतुर्थ भाव में केतु होने पर वाहन दुर्घटना का भय रहता है?
Remedial Measures
चतुर्थ भाव में स्थित केतु (Ketu) के अशुभ प्रभावों को कम करने और इसके शुभ फलों को बढ़ाने के लिए जातक को विशिष्ट शास्त्रीय और व्यावहारिक उपायों (Upaya [remedies]) का सहारा लेना चाहिए। कुलदेवता की पूजा: Jatak Alankaar के अनुसार, यदि शनि, मंगल, राहु या केतु (Ketu) के कारण संतान या सुख प्राप्ति में कोई बाधा आ रही हो, तो जातक को अपने वंश-इष्ट या कुलदेवता की पूजा (Kuladevata Puja) अवश्य करनी चाहिए। गोचर जनित कष्टों के उपाय: Significance of Nakshatras के अनुसार, यदि राहु या केतु (Ketu) के गोचर के कारण जीवन में नकारात्मक प्रभाव आ रहे हों, तो जातक को सुदर्शन होम (Sudarshana Homam), कुज स्तोत्र (Kuja Stotram), मंत्रमाला स्तोत्र (Mantramala Stotram), या श्री हयग्रीव स्तोत्र (Sri Hayagriva Stotram) का पाठ करना चाहिए। श्री हयग्रीव स्तोत्र का पाठ: Significance of Nakshatras में विशेष रूप से केतु (Ketu) की शांति के लिए श्री हयग्रीव स्तोत्र के नियमित पाठ की अनुशंसा की गई है।Standard Remedies for Ketu
आध्यात्मिक उपाय: जातक को प्रतिदिन केतु (Ketu) के बीज मंत्र "ॐ स्रां स्रीं स्रौं सः केतवे नमः" का जाप करना चाहिए। भगवान गणेश की आराधना करना केतु (Ketu) के दोषों को शांत करने का सबसे अचूक उपाय है। व्यवहारिक उपाय: जातक को अपने नाना, बुजुर्गों और आध्यात्मिक साधकों का हमेशा सम्मान करना चाहिए। घर में कभी भी कबाड़ या जंग लगा हुआ लोहा इकट्ठा न होने दें। दान-पुण्य: शनिवार या गुरुवार के दिन काले और सफेद रंग के कंबल, तिल, उड़द की दाल, या बहुरंगी कपड़ों का दान किसी जरूरतमंद या मंदिर में करना चाहिए। पक्षियों को नियमित रूप से बाजरा खिलाना भी शुभ होता है। रत्न धारण: केतु (Ketu) का मुख्य रत्न लहसुनिया (Cat's Eye) है। चेतावनी: लहसुनिया रत्न केवल तभी धारण करना चाहिए जब केतु (Ketu) का राशि स्वामी जातक की कुंडली के लिए एक कार्यात्मक शुभ ग्रह (functional benefic) हो (जैसे वृषभ, तुला, मकर या कुंभ लग्न)। यदि केतु (Ketu) का राशि स्वामी कुंडली के लिए एक कार्यात्मक पापी ग्रह (functional malefic) है (जैसे मेष, कर्क, सिंह या वृश्चिक लग्न), तो इस रत्न को कभी भी धारण नहीं करना चाहिए, क्योंकि यह केतु (Ketu) के पापी प्रभावों को और अधिक बढ़ा सकता है। जातक को अपनी कुंडली में इस स्थान का अध्ययन करते समय सबसे पहले केतु (Ketu) के राशि स्वामी (चतुर्थेश) की स्थिति, उस पर पड़ने वाले शुभ व अशुभ ग्रहों के पहलुओं, और नवांश कुंडली में उसकी स्थिति का अत्यंत सूक्ष्मता से विश्लेषण करना चाहिए, क्योंकि ये सभी कारक मिलकर ही अंतिम परिणाम को तय करते हैं।See this in your own chart
Rajvidya calculates this placement from your birth details and reads it alongside the rest of your chart.
Create your free kundliFree to start — no card required.
Sources consulted
The 55 classical and modern works consulted while compiling this entry. Statements held by a single text are attributed to that text in the body above.
These works are listed as sources consulted, not as material reproduced. Positions are summarised in our own words; no passage is quoted from a work still in copyright, and no translation is reproduced. Titles name the work a position is drawn from and imply no endorsement by its author or publisher. Where a reading rests on one text alone, treat it as that text's position rather than settled doctrine.
- (I)Timing of Events Crux of Vedic Astrology 1
- 4 Step Theory
- A Philosophy of Astrology
- arudha pada
- asthamangal prashnam
- Astrology KP System
- Bhrigu Nadi Jyotisham
- Book. Encyclopedia of vedic astro dasha systems
- book2 for CD
- Brihat Parashara Hora Shastra
- BV Raman Notable Horoscopes
- Cancellation of Manglik Dosh
- Chara Dasha Part 1
- Debilitated Neecha Planets Lifes Interesting Challenge
- Dhanu Vijaya- Jyothisha Prakaasham
- Doctrines of Suka Nadi(1)
- Essence of Prashna Techniques
- Fateand Fortune Part II
- foreign travel
- Gandantha Casestudies
- Graha Yuddha
- How to Judge a Horoscope
- How to judge horoscope 1
- How to judge horoscope 2
- Jaimini Astrology
- Jaimini Sutras
- Jatak Alankaar (Sanskrit)
- Jataka Parijata
- Jyotisha Chandrika
- K.P reader 3
- Kalamsa and Cuspal Interlinks
- karmic astrology
- Key to Learn K.P. cuspal system S.P. Khullar
- Krishnamurti Padhdhati
- Lessons In Chara Dasha- Part 1
- medical astrology horoscop of sthethoscop
- My Experiences in Astrology B.V Raman
- Navamsa by C.S. Patel
- New Techniques of Prediction
- Notable Horoscopes
- Phaladeepika
- philosophy astrology
- Prasana A Contemporary Treatise
- Prashna Tantra
- Predictive Jyotish by m n kedaar
- Predictive Stellar Astrology
- Rasi Characteristics
- Roots of Nadi
- Saravali
- Sarvartha Chintamani
- Satyajatakam Dhruva Nadi
- Scientific hindu astrology
- Shastyamsa D60
- Vriddha Karika
- Vrishabha Vijaya Jyothisha Prakaasham
Community
No community activity yet. Be the first to leave a comment, review, or question!
Sign in to leave a comment, review, question, or suggestion.
Sign In to Contribute