Jupiter in the 8th House

42 min read · Drawn from 55 classical and modern works · Updated August 2026

वैदिक ज्योतिष में, देवगुरु बृहस्पति को सबसे शुभ और कल्याणकारी Graha (ग्रह) माना जाता है, जिसे संस्कृत में 'गुरु' या 'बृहस्पति' कहा जाता है। जब गुरु कुंडली के अष्टम भाव में स्थित होते हैं, जिसे Ashtama Bhava (अष्टम भाव) या Randhra Bhava (रंध्र भाव) कहा जाता है, तो यह एक अत्यंत विशिष्ट और जटिल स्थिति का निर्माण करता है। अष्टम भाव मुख्य रूप से जातक की आयु, जीवन में आने वाले अचानक उतार-चढ़ाव, गुप्त विद्याओं, विरासत, और मृत्यु के स्वरूप को नियंत्रित करता है। दूसरी ओर, गुरु ज्ञान, बुद्धि, संतान, धन, और दैवीय कृपा के Karaka (कारक) हैं। अष्टम भाव में गुरु की उपस्थिति सामान्यतः जातक को दीर्घायु, आध्यात्मिक गहराई और गुप्त ज्ञान प्रदान करती है, लेकिन इसके साथ ही यह सांसारिक सुखों, पारिवारिक संबंधों और स्वास्थ्य में कुछ चुनौतियाँ भी उत्पन्न कर सकती है। इस स्थिति का अंतिम परिणाम गुरु की Rashi (राशि) गरिमा, युति और Drishti (दृष्टि) प्रभावों पर निर्भर करता है। वैदिक ज्योतिष के शास्त्रीय ग्रंथों में भविष्यवाणियां अत्यंत स्पष्ट और पूर्ण शब्दों में दी गई हैं, परंतु किसी भी जातक की कुंडली में एक अकेले ग्रह की स्थिति को अंतिम नहीं मानना चाहिए; ऐसे गंभीर परिणाम तभी घटित होते हैं जब संपूर्ण कुंडली में कई अन्य प्रतिकूल प्रभाव भी मौजूद हों।

Classical Position

वैदिक ज्योतिष के प्रामाणिक और सर्वसम्मत सिद्धांतों के अनुसार, अष्टम भाव में गुरु की स्थिति कुछ अत्यंत महत्वपूर्ण और अकाट्य प्रभाव उत्पन्न करती है। शास्त्रीय ग्रंथों में इस बात पर पूर्ण सहमति है कि यदि कुंडली के अष्टम भाव में Mars (मंगल) स्थित हो, तो वह जातक के जीवन में अचानक दुर्घटनाओं और गंभीर चोटों का भय उत्पन्न करता है। हालांकि, यदि शुभ Graha गुरु अपनी अमृतमयी Drishti से अष्टम भाव या मंगल को देखते हैं, तो यह दुर्घटनाओं के इस योग को पूरी तरह से निष्प्रभावी कर देता है। Brihat Parashara Hora Shastra और Hindu Predictive Astrology जैसे प्रामाणिक ग्रंथों में यह स्पष्ट रूप से कहा गया है कि गुरु की दृष्टि के बिना अष्टम का मंगल जातक को गंभीर संकट में डाल सकता है, लेकिन गुरु की सुरक्षात्मक दृष्टि इस नकारात्मक प्रभाव को समाप्त कर देती है। इसके अतिरिक्त, परंपरा में यह भी माना गया है कि यदि द्वितीय भाव का स्वामी अष्टम भाव में गुरु के साथ युति करता है, तो यह जातक के लिए वाणी दोष या मूकता (बोलने में असमर्थता) का कारण बनता है। Sarvartha Chintamani और Jataka Parijata दोनों ही इस बात की पुष्टि करते हैं कि द्वितीयेश और गुरु की अष्टम भाव में यह युति वाणी की शक्ति को गंभीर रूप से बाधित करती है, जिससे जातक को अपने विचारों को व्यक्त करने में कठिनाई होती है।

Variant Readings

विभिन्न शास्त्रीय और नाड़ी ग्रंथों में अष्टम भाव में गुरु की स्थिति को लेकर कई विशिष्ट और भिन्न दृष्टिकोण प्रस्तुत किए गए हैं। इन भिन्न-भिन्न मतों को जातक के जीवन के विभिन्न आयामों के आधार पर वर्गीकृत किया जा सकता है।

Physical Appearance and Health

  • दीर्घायु और मृत्यु का स्वरूप: Saravali के अनुसार, अष्टम भाव में स्थित गुरु जातक को लंबी आयु प्रदान करते हैं। इसके साथ ही, इस ग्रंथ में यह भी उल्लेख है कि अष्टम भाव में स्थित ग्रह मृत्यु के कारण को निर्धारित करता है, और गुरु की स्थिति यह दर्शाती है कि जातक की मृत्यु अपच या पेट की खराबी के कारण हो सकती है। How to Judge a Horoscope के अनुसार, जातक को एक शांतिपूर्ण और दर्द रहित मृत्यु प्राप्त होती है।
  • शारीरिक स्वास्थ्य और विकार: How to Judge a Horoscope के अनुसार, अष्टम भाव का गुरु जातक को कोलाइटिस (आंतों की सूजन) जैसी पेट की बीमारियों से पीड़ित कर सकता है। इसके अलावा, जातक में कुछ अस्वच्छ आदतें भी हो सकती हैं।
  • शारीरिक गठन और प्रवृत्ति: My Experiences in Astrology के अनुसार, यदि Lagna (लग्न) का स्वामी उच्च का होकर अष्टम भाव में स्थित हो, तो जातक का शरीर स्थूल (मोटापे की ओर प्रवृत्त) होता है। ऐसा जातक दार्शनिक और गुप्त विद्याओं के अध्ययन में गहरी रुचि रखता है।
  • स्वास्थ्य और संतान संबंधी समस्याएं: Vrishabha Vijaya Jyothisha Prakaasham के अनुसार, यदि गुरु अष्टम भाव में निर्बल या पीड़ित हो, तो यह महिलाओं में मासिक धर्म की समस्याओं और प्रसव संबंधी कठिनाइयों का कारण बन सकता है।
  • आंतों की बीमारियां: Medical Astrology के अनुसार, यदि पंचमेश अष्टम भाव में हो, तो यह आंतों की गंभीर समस्याओं को जन्म देता है, लेकिन यदि गुरु पंचम भाव पर दृष्टि डालते हैं, तो इस रोग का प्रभाव काफी हद तक कम हो जाता है।

Temperament and Mental State

  • असंतोष और उदारता का मिश्रण: How to Judge a Horoscope के अनुसार, अष्टम भाव में गुरु होने से जातक मन से दुखी या असंतुष्ट रह सकता है, लेकिन उसका स्वभाव अत्यंत उदार होता है। वह गुप्त रूप से दूसरों की सहायता करने में विश्वास रखता है।
  • हीन कर्मों की ओर झुकाव: Phaladeepika और Saravali जैसे ग्रंथों में एक अत्यंत विशिष्ट मत मिलता है कि अष्टम भाव का गुरु जातक को कुछ हीन या समाज विरोधी कार्यों में लिप्त कर सकता है। जातक को अपने जीवन में अपमान का सामना भी करना पड़ सकता है।
  • मानसिक तनाव और भय: The Encyclopedia of Vedic Astrological Dasha Systems के अनुसार, अष्टम भाव में स्थित गुरु की Dasha के दौरान जातक को मानसिक तनाव, पुत्र के कारण दुख, निवास स्थान में परिवर्तन और अज्ञात भय का सामना करना पड़ सकता है।
  • धार्मिक और वैचारिक अतिवाद: Scientific Hindu Astrology के अनुसार, यदि मंगल और गुरु के बीच अष्टम और द्वितीय भाव को लेकर दृष्टि संबंध या विरोध हो, तो जातक धार्मिक मामलों में अत्यंत भावुक और चरमपंथी दृष्टिकोण अपना सकता है।

Wealth, Status and Life Events

  • विदेशी भूमि में भाग्य उदय: Sarvartha Chintamani के अनुसार, अष्टम भाव में गुरु जातक को अपने जन्मस्थान पर रिश्तेदारों से दूर कर सकता है और पद से च्युत कर सकता है, लेकिन सुदूर विदेशी भूमि में जाने पर उसे पत्नी, पुत्र, धन और समाज में उच्च सम्मान प्राप्त होता है।
  • दशा काल के विपरीत परिणाम: The Encyclopedia of Vedic Astrological Dasha Systems के अनुसार, अष्टम भाव में स्थित गुरु की Mahadasa (महादशा) के दौरान यदि शुभ ग्रहों की Antardasa (अंतर्दशा) आती है, तो जातक को देश का शासक बनने या अत्यधिक प्रसिद्धि प्राप्त करने का अवसर मिलता है। इसके विपरीत, यदि पापी ग्रहों की अंतर्दशा आती है, तो जातक को धन हानि, परिवार द्वारा अपमान और सत्ता से हाथ धोना पड़ सकता है।
  • विरासत और गुप्त धन: How to Judge a Horoscope के अनुसार, यदि गुरु द्वितीय और पंचम भाव का स्वामी होकर अष्टम भाव में स्थित हो, तो जातक को वसीयत, बीमा या गुप्त विद्याओं के माध्यम से अचानक धन लाभ होने की प्रबल संभावना होती है।
  • आर्थिक तंगी और दरिद्रता: Jataka Parijata के अनुसार, यदि अष्टम या प्रथम भाव का स्वामी गुरु नवमेश से अधिक बलवान हो, और एकादशेश केंद्र से बाहर सूर्य द्वारा Astangata (अस्तंगत या अस्त) हो, तो जातक अत्यंत निर्धन और दरिद्र जीवन व्यतीत करता है।
  • विवाह में देरी: Doctrines of Suka Nadi के अनुसार, यदि लग्नेश और सप्तमेश दोनों अष्टम भाव में स्थित हों, तो जातक का विवाह तब तक टलता रहता है जब तक कि गुरु की Dasha सक्रिय न हो जाए।

Aspect and Directional Strength

वैदिक ज्योतिष में ग्रहों की Drishti (दृष्टि) को उनके भौतिक स्थान जितना ही महत्वपूर्ण माना गया है। गुरु अपनी स्थिति से पंचम, सप्तम और नवम भाव पर पूर्ण दृष्टि डालते हैं। जब गुरु अष्टम भाव में स्थित होते हैं, तो वे अपनी अमृतमयी दृष्टि से कुंडली के द्वादश भाव, द्वितीय भाव और चतुर्थ भाव को सक्रिय करते हैं। गुरु की सप्तम दृष्टि द्वितीय भाव पर पड़ती है, जो धन, परिवार और वाणी का भाव है। An Astrobiographical Sketch of Dr BVRaman के अनुसार, जब गुरु द्वितीय भाव पर दृष्टि डालते हैं, तो जातक का आदर्शवाद उसके सार्वजनिक जीवन में प्रकट होता है। वह अपनी वाणी और ज्ञान के माध्यम से समाज को प्रभावित करता है। इसके अतिरिक्त, Notable Horoscopes में यह उल्लेख किया गया है कि यदि द्वितीय भाव पर गुरु की दृष्टि न हो, तो जातक के वित्तीय मामलों और भविष्यवाणियों पर पूरी तरह से भरोसा नहीं किया जा सकता है। गुरु की यह दृष्टि द्वितीय भाव को सुरक्षा प्रदान करती है और जातक को संचित धन का सुख देती है। चूंकि गुरु एक नैसर्गिक शुभ ग्रह हैं, इसलिए उनकी दृष्टि जिन भावों पर पड़ती है, वे उन भावों के शुभ फलों में वृद्धि करते हैं। हालांकि, अष्टम भाव में बैठकर गुरु स्वयं Dusthana (दुस्थान या त्रिक भाव) के प्रभाव में आ जाते हैं। Phaladeepika के अनुसार, यदि गुरु किसी विचाराधीन भाव से छठे, आठवें या बारहवें भाव में स्थित हों, तो वे उस भाव को सीधे तौर पर अपनी सुरक्षात्मक शक्ति प्रदान नहीं कर पाते हैं। दिशात्मक बल या Digbala (दिग्बल) के संदर्भ में, गुरु प्रथम भाव यानी Lagna में सबसे मजबूत होते हैं, जहां उन्हें पूर्ण दिग्बल प्राप्त होता है। अष्टम भाव में गुरु अपने दिग्बल स्थान से अत्यंत दूर होते हैं, जिसके कारण उनकी बाहरी और भौतिक आशीर्वाद देने की क्षमता कुछ हद तक सीमित हो जाती है। हालांकि, यह स्थिति जातक को आंतरिक, आध्यात्मिक और गुप्त ज्ञान के मामलों में अत्यंत शक्तिशाली बनाती है।

The Placement Across the Twelve Rashis

अष्टम भाव में गुरु की स्थिति का परिणाम इस बात पर निर्भर करता है कि वे किस Rashi (राशि) में स्थित हैं। प्रत्येक राशि के स्वामी, गुरु की गरिमा और संबंधित लग्न के आधार पर इसके परिणाम पूरी तरह बदल जाते हैं।

Aries (Mesha)

गुरु मेष राशि में मित्र राशि के होते हैं, जिसके स्वामी मंगल हैं। यह स्थिति कन्या Lagna को दर्शाती है, जहां गुरु चतुर्थ (गृह, सुख) और सप्तम (विवाह, साझेदारी) भाव के स्वामी होते हैं। The Encyclopedia of Vedic Astrological Dasha Systems के अनुसार, यदि जातक का जन्म मेष राशि के गुरु के साथ हुआ है, तो वह अपनी गुरु Dasha के दौरान विवाह बंधन में बंध सकता है या उसे पुत्र रत्न की प्राप्ति हो सकती है। इसके साथ ही उसे व्यावसायिक क्षेत्र में भी उच्च सफलता और प्रसिद्धि मिलती है। चूंकि गुरु यहाँ मित्र राशि में हैं, इसलिए वे अष्टम भाव के नकारात्मक प्रभावों को कम करते हैं और जातक को अचानक आने वाले संकटों से बचाते हैं।

Taurus (Vrishabha)

वृषभ राशि में गुरु शत्रु राशि के होते हैं, जिसके स्वामी शुक्र हैं। यह स्थिति तुला Lagna को दर्शाती है, जहां गुरु तृतीय (साहस, प्रयास) और छठे (रोग, ऋण, शत्रु) भाव के स्वामी होते हैं। Western Astrology - Planets in Signs and Houses के अनुसार, वृषभ राशि का गुरु जातक को अत्यधिक भौतिकवादी बना सकता है, जहां वह हर समस्या का समाधान केवल धन में देखता है। The Encyclopedia of Vedic Astrological Dasha Systems के अनुसार, इस स्थिति में गुरु की दशा जातक को विदेश यात्रा और करियर में सफलता तो देती है, लेकिन प्रेम संबंधों और वैवाहिक जीवन में उसे भारी निराशा और असंतोष का सामना करना पड़ता है।

Gemini (Mithuna)

मिथुन राशि में गुरु शत्रु राशि के होते हैं, जिसके स्वामी बुध हैं। यह स्थिति वृश्चिक Lagna को दर्शाती है, जहां गुरु द्वितीय (धन, वाणी) और पंचम (बुद्धि, संतान) भाव के स्वामी होते हैं। Bhrighu Nadi Jyotisham के अनुसार, मिथुन राशि में गुरु होने से जातक का मन हमेशा अशांत रहता है और वह अत्यधिक क्रोध करने वाला होता है। The Encyclopedia of Vedic Astrological Dasha Systems के अनुसार, इस स्थिति में गुरु की दशा पारिवारिक जीवन के लिए अत्यंत कष्टकारी सिद्ध होती है, जिससे पत्नी और मित्रों से अलगाव या वैचारिक मतभेद उत्पन्न होते हैं।

Cancer (Karka)

कर्क राशि में गुरु उच्च के होते हैं, जिसके स्वामी चंद्रमा हैं। यह स्थिति धनु Lagna को दर्शाती है, जहां गुरु प्रथम (स्वयं) और चतुर्थ (सुख) भाव के स्वामी होते हैं। Yashodhar Mehta’s Research in Astrology के अनुसार, कर्क राशि का गुरु यदि अष्टम भाव में हो, तो जातक के भीतर Moksha (मोक्ष या अंतिम मुक्ति) प्राप्त करने की तीव्र इच्छा जागृत होती है। वह आध्यात्मिक रूप से अत्यंत उन्नत होता है। हालांकि, Jataka Parijata के अनुसार, इस स्थिति में जातक को संतान प्राप्ति में कठिनाई या संतानहीनता का सामना करना पड़ सकता है, क्योंकि गुरु यहाँ अपनी उच्च अवस्था में होकर भी अष्टम भाव के रहस्यमयी प्रभाव में आ जाते हैं।

Leo (Simha)

सिंह राशि में गुरु मित्र राशि के होते हैं, जिसके स्वामी सूर्य हैं। यह स्थिति मकर Lagna को दर्शाती है, जहां गुरु द्वादश (व्यय, मोक्ष) और तृतीय (साहस) भाव के स्वामी होते हैं। The Encyclopedia of Vedic Astrological Dasha Systems के अनुसार, सिंह राशि में गुरु की उपस्थिति जातक को अत्यंत भाग्यशाली बनाती है। गुरु की दशा के दौरान जातक को समाज में उच्च अधिकार, प्रचुर धन और मान-सम्मान की प्राप्ति होती है। जातक का स्वभाव अत्यंत परोपकारी और उदार होता है, और वह अपने प्रभाव का उपयोग दूसरों के कल्याण के लिए करता है।

Virgo (Kanya)

कन्या राशि में गुरु शत्रु राशि के होते हैं, जिसके स्वामी बुध हैं। यह स्थिति कुंभ Lagna को दर्शाती है, जहां गुरु एकादश (लाभ) और द्वितीय (धन) भाव के स्वामी होते हैं। The Encyclopedia of Vedic Astrological Dasha Systems के अनुसार, कन्या राशि में गुरु की स्थिति जातक को व्यावसायिक समृद्धि, सुख और संतोष प्रदान करती है। हालांकि, जातक अपने अधीनस्थों या कर्मचारियों के प्रति अत्यंत सख्त और कठोर रवैया अपना सकता है। चूंकि गुरु यहाँ शत्रु राशि में हैं, इसलिए जातक को अपने संचित धन की सुरक्षा को लेकर हमेशा सतर्क रहना चाहिए।

Libra (Tula)

तुला राशि में गुरु शत्रु राशि के होते हैं, जिसके स्वामी शुक्र हैं। यह स्थिति मीन Lagna को दर्शाती है, जहां गुरु दशम (करियर) और प्रथम (स्वयं) भाव के स्वामी होते हैं। The Encyclopedia of Vedic Astrological Dasha Systems के अनुसार, तुला राशि में गुरु की स्थिति जातक के लिए अत्यंत कष्टकारी और विनाशकारी सिद्ध हो सकती है। गुरु की दशा के दौरान जातक को अपनी उम्मीदों के टूटने, प्रयासों के विफल होने और करियर में अचानक गिरावट का सामना करना पड़ सकता है। जातक को अपने मान-सम्मान की रक्षा के लिए कड़ा संघर्ष करना पड़ता है।

Scorpio (Vrischika)

वृश्चिक राशि में गुरु मित्र राशि के होते हैं, जिसके स्वामी मंगल हैं। यह स्थिति मेष Lagna को दर्शाती है, जहां गुरु नवम (भाग्य, धर्म) और द्वादश (मोक्ष) भाव के स्वामी होते हैं। The Encyclopedia of Vedic Astrological Dasha Systems के अनुसार, वृश्चिक राशि में गुरु होने से जातक की रुचि खेलकूद, साहसिक गतिविधियों और सैन्य कार्यों में अत्यधिक होती है। जातक का स्वास्थ्य उत्तम रहता है और उसे अपनी गुरु दशा के दौरान भाग्य का पूरा सहयोग मिलता है। वह रहस्यमयी और गुप्त विद्याओं का सफल साधक बन सकता है।

Sagittarius (Dhanu)

धनु राशि में गुरु अपनी Moolatrikona (मूलत्रिकोण) राशि में होते हैं, जिसके स्वामी वे स्वयं हैं। यह स्थिति वृषभ Lagna को दर्शाती है, जहां गुरु अष्टम (आयु, मृत्यु) और एकादश (लाभ) भाव के स्वामी होते हैं। Vedic Astro Textbook के अनुसार, गुरु धनु राशि के शुरुआती 10 अंशों में मूलत्रिकोण के फल देते हैं और शेष 20 अंशों में अपनी स्वराशि के फल देते हैं। Brihat Parashara Hora Shastra के अनुसार, धनु राशि में गुरु की अंतर्दशा जातक को दान-पुण्य करने की प्रवृत्ति, समाज में उच्च सम्मान, धार्मिक झुकाव और अचानक प्रचुर धन लाभ प्रदान करती है।

Capricorn (Makara)

मकर राशि में गुरु नीच के यानी दुर्बल होते हैं, जिसके स्वामी शनि हैं। यह स्थिति मिथुन Lagna को दर्शाती है, जहां गुरु सप्तम (विवाह) और दशम (करियर) भाव के स्वामी होते हैं। Debilitated Neecha Planets के अनुसार, मकर राशि का गुरु जातक के भीतर शनि के धीमे और अनुशासित गुणों को प्रकट करता है। Roots of Nadi के अनुसार, ऐसा जातक शारीरिक रूप से दुबला-पतला होता है। Western Astrology के अनुसार, जातक के भीतर गजब की व्यावसायिक समझ होती है, लेकिन उसका धन खर्च करने का तरीका अत्यंत विरोधाभासी और अनियंत्रित हो सकता है।

Aquarius (Kumbha)

कुंभ राशि में गुरु सम या तटस्थ राशि के होते हैं, जिसके स्वामी शनि हैं। यह स्थिति कर्क Lagna को दर्शाती है, जहां गुरु छठे (शत्रु, रोग) और नवम (भाग्य) भाव के स्वामी होते हैं। Predictive Jyotish के अनुसार, कुंभ राशि का गुरु जातक को अत्यधिक विद्वान तो बनाता है, लेकिन वह हमेशा विवादों से घिरा रहता है। जातक को पेट और दांतों की बीमारियों का सामना करना पड़ सकता है। शनि के प्रभाव के कारण जातक के भीतर कुछ अनैतिक या गुप्त प्रवृत्तियां भी जन्म ले सकती हैं, जिससे धन की हानि हो सकती है।

Pisces (Meena)

मीन राशि में गुरु अपनी स्वराशि के होते हैं, जिसके स्वामी वे स्वयं हैं। यह स्थिति सिंह Lagna को दर्शाती है, जहां गुरु पंचम (बुद्धि, संतान) और अष्टम (आयु) भाव के स्वामी होते हैं। Roots of Nadi के अनुसार, मीन राशि में गुरु जातक को अगाध ज्ञान, शांति, सदाचार और समाज में उपदेशक या आध्यात्मिक गुरु बनने की क्षमता प्रदान करते हैं। जातक का स्वभाव पूरी तरह से गैर-भौतिकवादी होता है, और वह सांसारिक सुखों की तुलना में मानसिक शांति और आध्यात्मिक उन्नति को अधिक महत्व देता है।

Conjunctions in This House

अष्टम भाव में गुरु के साथ अन्य ग्रहों की युति जातक के जीवन में अत्यंत गहरे और दूरगामी प्रभाव उत्पन्न करती है।

Sun

सूर्य के साथ गुरु: यदि अष्टम भाव में सूर्य और गुरु की युति हो, और कुंडली का लग्नेश अत्यंत कमजोर हो तथा अष्टमेश द्वारा देखा जा रहा हो, तो Jataka Parijata के अनुसार Reka Yoga (रेखा योग) का निर्माण होता है। इस योग के प्रभाव से जातक ज्ञान और धन से हीन हो जाता है, और उसका जीवन अत्यंत दरिद्र और कष्टकारी हो सकता है।

Moon

चंद्रमा के साथ गुरु: यदि अष्टम भाव में चंद्रमा और गुरु की युति हो, और लग्नेश द्वितीय भाव में स्थित हो, तो PAC DARES के अनुसार जातक को अपने जीवन में अचानक और अप्रत्याशित रूप से भारी धन लाभ (विंडफॉल गेन्स) प्राप्त होता है। यह युति जातक को गुप्त स्रोतों या वसीयत के माध्यम से अमीर बना सकती है।

Mars

मंगल के साथ गुरु: अष्टम भाव में मंगल और गुरु की युति जातक को दुर्घटनाओं से बचाती है। हालांकि, Scientific Hindu Astrology के अनुसार, यदि अष्टम भाव में मंगल और गुरु की युति हो और साथ में योगकारक शनि भी अष्टम भाव में स्थित हो, तो यह जातक के भीतर अत्यधिक मानसिक अवसाद और आत्महत्या करने की प्रवृत्ति को जन्म दे सकती है।

Mercury

बुध के साथ गुरु: यदि अष्टम भाव में बुध और गुरु की युति हो, और साथ में द्वितीय भाव का स्वामी भी यहीं स्थित हो, तो Sarvartha Chintamani के अनुसार जातक मूक (गूंगा) हो सकता है या उसे वाणी से जुड़े गंभीर विकारों का सामना करना पड़ सकता है।

Venus

शुक्र के साथ गुरु: यदि अष्टम भाव में शुक्र और गुरु की युति हो और वे पापी ग्रहों से पीड़ित हों, तो Jatak Alankaar के अनुसार यह जातक की माता के चरित्र या स्वास्थ्य पर प्रतिकूल प्रभाव डाल सकता है। पारिवारिक सुखों में कमी आती है।

Saturn

शनि के साथ गुरु: यदि अष्टम भाव में शनि और गुरु की युति हो, और उस पर मंगल का भी प्रभाव हो, तो How to Judge a Horoscope के अनुसार यह जातक की आयु और जीवन में आने वाले बड़े बदलावों को गहराई से प्रभावित करता है। जातक का जीवन रहस्यों से भरा होता है।

Rahu

राहु के साथ गुरु: यदि अष्टम भाव में गुरु, राहु और नीच के मंगल की युति हो, तो Timing of Events के अनुसार जातक की मृत्यु किसी तांत्रिक क्रिया, काले जादू या शत्रुतापूर्ण मंत्रों के प्रयोग के कारण होने की आशंका रहती है।

Ketu

केतु के साथ गुरु: यदि अष्टम भाव में केतु स्थित हो और उसे शुभ ग्रह गुरु का साथ या दृष्टि प्राप्त हो, तो Scientific Hindu Astrology के अनुसार जातक अत्यधिक दीर्घायु होता है और वह अपने जीवन में प्रचुर धन और आध्यात्मिक ऊंचाइयों को प्राप्त करता है। अष्टम भाव में तीन या अधिक ग्रहों की युति (स्टेलियम) जातक के पूरे जीवन को पूरी तरह से बदल देती है। ऐसा जातक सांसारिक सुखों से पूरी तरह विमुख होकर Sanyasa (संन्यास) की ओर प्रवृत्त हो सकता है। उसका पूरा ध्यान जीवन और मृत्यु के रहस्यों को सुलझाने में लग जाता है।

Aspects Received

जब अन्य ग्रह अष्टम भाव में स्थित गुरु पर अपनी दृष्टि डालते हैं, तो गुरु के शुभ फलों में भारी बदलाव आता है।

Saturn

शनि की दृष्टि: शनि की दृष्टि गुरु पर होने से जातक के जीवन में हर कार्य में देरी और रुकावटें आती हैं। Notable Horoscopes के अनुसार, यदि शनि और मंगल दोनों एक साथ गुरु पर दृष्टि डालते हैं, तो गुरु का शुभ प्रभाव पूरी तरह से समाप्त हो जाता है, जिससे जातक को कड़ा संघर्ष करना पड़ता है।

Mars

मंगल की दृष्टि: मंगल की क्रूर दृष्टि गुरु पर होने से जातक के जीवन में अचानक दुर्घटनाओं, सर्जरी और रक्त संबंधी विकारों का खतरा बढ़ जाता है। हालांकि, यदि गुरु स्वयं बलवान हों, तो वे इस नकारात्मक प्रभाव को काफी हद तक नियंत्रित कर लेते हैं।

Rahu

राहु की दृष्टि: राहु की दृष्टि गुरु पर होने से Secrets of Shastiamsa के अनुसार जातक के साथ धोखा होने, समाज में उसकी बदनामी होने या झूठे आरोपों में फंसने का गंभीर खतरा रहता है। जातक को अपने गुप्त शत्रुओं से हमेशा सावधान रहना चाहिए।

Ketu

केतु की दृष्टि: केतु की दृष्टि गुरु पर होने से जातक के भीतर वैराग्य की भावना अत्यंत प्रबल हो जाती है। वह भौतिक संसार को छोड़कर एकांतवास, ध्यान और योग की ओर आकर्षित होता है।

Strength and Condition

अष्टम भाव में बैठा गुरु वास्तव में कैसा परिणाम देगा, यह केवल उसकी स्थिति से नहीं बल्कि उसकी वास्तविक शक्ति और अवस्था से तय होता है।

Baladi Avastha

जातक को गुरु के अंशों (डिग्री) की जांच करनी चाहिए:
  • 0-6 अंश: Bala (बाल्यावस्था)
  • 6-12 अंश: Kumara (कुमार अवस्था)
  • 12-18 अंश: Yuva (युवावस्था)
  • 18-24 अंश: Vridha (वृद्धावस्था)
  • 24-30 अंश: Mrita (मृतावस्था)
यह क्रम विषम राशियों (मेष, मिथुन, सिंह, तुला, धनु, कुंभ) में सीधा चलता है, लेकिन सम राशियों (वृषभ, कर्क, कन्या, वृश्चिक, मकर, मीन) में यह क्रम पूरी तरह से उलट जाता है, जहां 0-6 अंश Mrita और 24-30 अंश Bala अवस्था होती है। गुरु की अपनी राशियां धनु (विषम) और मीन (सम) हैं। एक युवा (Yuva) गुरु अपने पूर्ण परिणाम देता है, जबकि मृत (Mrita) या बाल (Bala) अवस्था का गुरु अत्यंत कमजोर परिणाम देता है।

Ashtakavarga

Ashtakavarga (अष्टकवर्ग) में अष्टम भाव को मिलने वाले Bindu (बिंदु) अत्यंत महत्वपूर्ण हैं। यदि अष्टम भाव में 30 से अधिक बिंदु हों, तो गुरु जातक को दीर्घायु और अचानक धन लाभ प्रदान करते हैं। इसके विपरीत, यदि बिंदु 25 से कम हों, तो गुरु की सुरक्षात्मक शक्ति अत्यंत कमजोर हो जाती है।

Nakshatra

गुरु किस Nakshatra (नक्षत्र) में बैठे हैं और उस नक्षत्र का स्वामी कौन है, यह परिणाम को पूरी तरह बदल देता है। Predicting with KP Horary के अनुसार, कोई भी ग्रह जिस राशि में बैठता है, वह सबसे पहले अपने नक्षत्र स्वामी के फलों को प्रकट करता है।

Navamsa (D9)

Navamsha (नवांश) चक्र जन्म कुंडली के वादों की पुष्टि या उन्हें रद्द करता है। My Experiences in Astrology के अनुसार, यदि गुरु नवांश कुंडली में अपनी स्वराशि में होकर अष्टम भाव में मजबूत स्थिति में बैठे हों, तो यह जातक की दीर्घायु का सबसे बड़ा प्रमाण माना जाता है। इसके विपरीत, यदि दो ग्रहों के स्वामी नवांश में परस्पर छठे, आठवें या बारहवें भाव में चले जाएं, तो शुभ फल अत्यंत कमजोर हो जाते हैं।

Lord of the 8th House

अष्टम भाव के स्वामी (अष्टमेश) की स्थिति सबसे महत्वपूर्ण है। यदि अष्टमेश स्वयं निर्बल, शत्रु राशि में या पीड़ित हो, तो अष्टम भाव में बैठा गुरु चाहे कितना भी मजबूत क्यों न हो, वह अपने शुभ फल पूरी तरह से नहीं दे पाता है।

In the KP System

कृष्णमूर्ति पद्धति (KP System) में ग्रहों के नक्षत्र और उप-स्वामी (Sub-lord) को सबसे अधिक महत्व दिया जाता है। Key to Learn K.P. Cuspal System के अनुसार, यदि किसी ग्रह के उप-स्वामी की स्थिति उस ग्रह द्वारा दर्शाए गए भावों की तुलना में चौथे, सातवें, आठवें या बारहवें भाव में हो, तो परिणाम अत्यंत प्रतिकूल और अशुभ प्राप्त होते हैं। इसके अतिरिक्त, Kalamsa and Cuspal Interlinks के अनुसार, यदि नवम भाव के उप-उप-स्वामी (Sub-sub lord) का संबंध चौथे, आठवें या बारहवें भाव से बनता है, तो इसे जातक के भाग्य और समृद्धि के लिए शुभ नहीं माना जाता है। यह जातक के जीवन में अचानक आने वाले संकटों और रुकावटों को दर्शाता है।

Practical Significations

अष्टम भाव में गुरु की स्थिति को व्यावहारिक रूप से समझने के लिए इसे दो मुख्य श्रेणियों में विभाजित किया जा सकता है।

Longevity and Death

  • दीर्घायु का वरदान: गुरु की अष्टम भाव में उपस्थिति जातक को अकाल मृत्यु से बचाती है और उसे लंबी आयु प्रदान करती है।
  • शांतिपूर्ण अंत: जातक को अपने जीवन के अंतिम समय में अत्यधिक शारीरिक कष्ट नहीं झेलना पड़ता और उसे एक painless (दर्द रहित) मृत्यु प्राप्त होती है।
  • स्वास्थ्य के प्रति सावधानी: जातक को अपने पाचन तंत्र और खान-पान का विशेष ध्यान रखना चाहिए, क्योंकि अपच ही उसकी मुख्य बीमारी का कारण बन सकता है।

Occult and Spirituality

  • रहस्यमयी विद्याओं में रुचि: जातक ज्योतिष, तंत्र-मंत्र, टैरो और अन्य गुप्त विज्ञानों का एक सफल और गहरा जानकार बन सकता है।
  • आध्यात्मिक झुकाव: जातक का मन हमेशा ईश्वर की खोज और मोक्ष प्राप्ति के साधनों में लगा रहता है। वह एक अच्छा दार्शनिक हो सकता है।

Frequently Asked Questions

क्या अष्टम भाव में गुरु (Jupiter) हमेशा शुभ फल देता है?
नहीं, अष्टम भाव में गुरु के फल मिश्रित होते हैं। यह जातक को दीर्घायु और आध्यात्मिक ज्ञान तो देता है, लेकिन सांसारिक सुखों, पारिवारिक संबंधों और स्वास्थ्य में कुछ चुनौतियाँ भी उत्पन्न कर सकता है। अंतिम परिणाम गुरु की राशि और युति पर निर्भर करता है।
क्या अष्टम भाव का गुरु जातक को लंबी आयु प्रदान करता है?
हां, शास्त्रीय ग्रंथों के अनुसार अष्टम भाव में गुरु की उपस्थिति जातक को दीर्घायु बनाती है। यह जातक को अचानक आने वाले संकटों और अकाल मृत्यु से बचाता है, बशर्ते गुरु अत्यधिक पीड़ित न हो।
क्या अष्टम भाव में गुरु होने से धन की हानि होती है?
यह इस बात पर निर्भर करता है कि गुरु किस राशि में है। यदि गुरु शत्रु राशि में या पीड़ित हो, तो धन हानि हो सकती है। लेकिन यदि गुरु स्वराशि या उच्च का हो, तो जातक को वसीयत या गुप्त स्रोतों से अचानक धन लाभ होता है।
अष्टम भाव में गुरु होने पर मृत्यु का क्या कारण हो सकता है?
Saravali के अनुसार, अष्टम भाव में स्थित गुरु यह दर्शाता है कि जातक की मृत्यु का कारण अपच, पेट की खराबी या आंतों से जुड़ा कोई विकार हो सकता है। हालांकि, मृत्यु अत्यंत शांतिपूर्ण और दर्द रहित होती है।
क्या अष्टम भाव में गुरु विवाह में देरी का कारण बनता है?
हां, यदि सप्तमेश और लग्नेश दोनों अष्टम भाव में गुरु के साथ पीड़ित हों, तो विवाह में देरी होती है। ऐसी स्थिति में विवाह का योग जातक की गुरु Dasha के आने पर ही बनता है।
अष्टम भाव में गुरु के लिए कौन सी राशि सबसे सर्वोत्तम मानी जाती है?
कर्क राशि (जहां गुरु उच्च के होते हैं) और धनु या मीन राशि (जो गुरु की अपनी राशियां हैं) अष्टम भाव में सबसे सर्वोत्तम मानी जाती हैं। ये राशियां जातक को अत्यधिक आध्यात्मिक और दीर्घायु बनाती हैं।
क्या अष्टम भाव का गुरु जातक को नास्तिक बनाता है?
बिल्कुल नहीं। इसके विपरीत, अष्टम भाव का गुरु जातक के भीतर धर्म, दर्शन और ईश्वर के प्रति गहरी आस्था जगाता है। जातक के भीतर मोक्ष प्राप्त करने की तीव्र इच्छा होती है।

Remedial Measures

यदि कुंडली के अष्टम भाव में गुरु पीड़ित अवस्था में हों या अशुभ फल दे रहे हों, तो वैदिक ज्योतिष में इसके निवारण के लिए कई प्रभावी Upayas (उपाय) बताए गए हैं। Asthamangal Prashnam के अनुसार, यदि गुरु Arudha Lagna (आरूढ़ लग्न) से किसी विशेष शुभ स्थिति में हों, तो किए गए उपाय अत्यंत शीघ्र और चमत्कारी परिणाम देते हैं।

Standard Remedies for Jupiter

  • आध्यात्मिक उपाय: जातक को प्रतिदिन 'ॐ बृं बृहस्पतये नमः' Mantra (मंत्र) का कम से कम 108 बार जाप करना चाहिए। इसके अतिरिक्त, प्रत्येक गुरुवार को भगवान विष्णु की पूजा करनी चाहिए और विष्णु सहस्रनाम का पाठ करना चाहिए। अपने गुरुओं और माता-पिता को Arghya (अर्घ्य) देकर उनका आशीर्वाद लें।
  • व्यवहारिक उपाय: जातक को हमेशा अपने शिक्षकों, बुजुर्गों, साधु-संतों और पुजारियों का सम्मान करना चाहिए। कभी भी किसी धार्मिक ग्रंथ या मंदिर का अपमान न करें। अपने आचरण को शुद्ध और सात्विक बनाए रखें।
  • दान-पुण्य: गुरुवार के दिन पीले रंग की वस्तुओं जैसे- चने की दाल, केले, केसर, हल्दी और पीले वस्त्रों का दान किसी गरीब ब्राह्मण या मंदिर में करना चाहिए। गुरुवार के दिन गाय को मीठी रोटी या चने की दाल खिलाना अत्यंत शुभ होता है।
  • रत्न धारण (चेतावनी): गुरु की शक्ति को बढ़ाने के लिए पीला पुखराज (Yellow Sapphire) धारण किया जाता है। विशेष चेतावनी: पुखराज केवल तभी धारण करना चाहिए जब गुरु जातक की कुंडली के लिए एक कार्यात्मक शुभ ग्रह (Functional Benefic) हो, जैसे मेष, कर्क, सिंह, वृश्चिक, धनु और मीन Lagna के जातकों के लिए। यदि गुरु कुंडली में कार्यात्मक पापी ग्रह (Functional Malefic) हो, जैसे वृषभ, मिथुन, कन्या, तुला, मकर और कुंभ लग्न में, तो पुखराज कभी धारण नहीं करना चाहिए, क्योंकि इससे गुरु का अशुभ प्रभाव और अधिक बढ़ जाएगा।
जातक को अपनी कुंडली में अष्टम भाव में स्थित गुरु की स्थिति का विश्लेषण करते समय सबसे पहले गुरु की राशि, उसके अंश, नक्षत्र स्वामी और अष्टमेश की स्थिति का सूक्ष्मता से अध्ययन करना चाहिए। किसी योग्य ज्योतिषी की सलाह के बिना कोई भी रत्न या गंभीर उपाय शुरू नहीं करना चाहिए।

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Sources consulted

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